--Advertisement--

कैंपेन / मी टू पर हर दो सेकंड में हो रहा है एक नया ट्वीट



X
  • भारत में भी ये कैंपेन जोर पकड़ चुका है, पढ़िए रिपोर्ट
  • इसके 91% मामले सोशल मीडिया से आगे ही नहीं बढ़े
  • कंपनियों की बात करें तो सबसे अधिक मामले आईटी में
     

Dainik Bhaskar

Oct 14, 2018, 12:00 AM IST

नई दिल्ली, मुंबई. सोशल मीडिया पर चल रहे कैंपेन ‘मी टू’ में शिकायतों की फेहरिस्त में रोज नए नाम जुड़ रहे हैं। अक्टूबर माह में ही देश में करीब 100 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं। हालांकि इनके अधिकांश मामले सोशल मीडिया तक ही सीमित हैं।

 

भास्कर ने हाल ही में आए ऐसे 75 चर्चित मामलों की पड़ताल की। इसमें सामने आया है कि लगभग 9 प्रतिशत केस ही ऐसे हैं, जिनमें या तो शिकायत दर्ज की गई है या आगे कोई कार्रवाई-जांच हो रही है। 91 प्रतिशत मामलों में पीड़ित सोशल मीडिया पर ही अपनी व्यथा बता रहे हैं। कार्यस्थल पर महिलाओं का उत्पीड़न रोकने के  लिए वर्ष 2013 में कानून बना था।

 

इस कानून के तहत सभी जिलों में स्थानीय शिकायत समिति बनाने की बात कही गई थी। अब जब हाल ही  में बॉलीवुड से रोज नए मामले सामने आ रहे हैं तब ये बात चौंकाती है कि मुंबई में इस समिति में किसी ने एक भी शिकायत नहीं की है। वर्ष 2015 से मुंबई में यह समिति काम कर रही है लेकिन इतने सालों में भी यहां सिर्फ 6 शिकायतें दर्ज कराई गई हैं। 

 

दूसरी तरफ हमने जब मी टू को लेकर हैशटैग एनालिटिक्स टूल चेक किया तो पता चला कि दुनियाभर में अभी हर दो सेकंड में मी टू पर एक नया ट्वीट हो रहा है। इसके अलावा रीट्वीट तो अलग हैं। हैशटैग एनालिटिक्स टूल से पता चलता है कि किसी हैशटैग के साथ कितने अधिक ट्वीट किए जा रहे हैं। इससे यह बात साफ है कि मी टू की बात तो हो रही है लेकिन कोई शिकायत नहीं कर रहा है। 

 

 

विशेषज्ञों का मानना है कि मी टू में सामने आ रहे अधिकांश मामले इतने पुराने हैं कि इसमें सच-झूठ की पड़ताल करना मुश्किल है। सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि क्रिमिनल लॉ में समय की कोई सीमा नहीं है, जैसा सिविल मामलों में होता है। लेकिन फाइनल ट्रायल सुबूत और गवाह पर ही चलते हैं, बहुत पुराने मामलों में यह मिल पाना मुश्किल होता है।

 

इसीलिए कोर्ट में ऐसे मामले साबित करना बहुत मुश्किल है। हालांकि यह अवश्य है कि जिस व्यक्ति पर आरोप लग रहे हैं और वह निर्दोष है तो मानहानी की कार्यवाही कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील गीता लूथरा भी कहती हैं कि इसमें आ रहे मामले बहुत पुराने हैं।

 

इसलिए इन्हें कोर्ट में साबित कर पाना मुश्किल है। ऑफिस स्पेस और कमरे आदि सब बदल जाते हैं इसलिए मामलों को साबित करने में मुश्किल होती है। उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह कहते हैं कि इतने समय बाद आरोप के बाद यह सही है कि फॉरेंसिक और बायोकेमिकल सुबूत नहीं मिल पाएंगे।

 

महिला द्वारा दिए गए विवरण और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को सबूत के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही आरोपी और अारोप लगाने वाले का पॉलीग्राफी टेस्ट होना चाहिए। इस तरह इतने वर्षों बाद भी सजा दिलाई जा सकती है। उप्र के ही पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह बताते हैं कि उस समय के गवाह, फोटो और रिकॉर्डिंग आदि अगर आरोप लगाने वाले के पास हैं तो सजा संभव है।

 

लेकिन अकेले में घर पर, कार में या ऐसे ही किसी स्थान पर घटना को अंजाम दिया है, तो कार्रवाई कैसे होगी? मेरे ख्याल से तो अधिकतम 15 से 20 फीसदी मामलों में ही कार्रवाई हो सकती है। महिला आयोग की पूर्व चेयरपर्सन गिरिजा व्यास का कहना है कि मी टू कैंपेन में जो महिलाएं अपनी बात रख रही हैं, महिला आयोग उनपर स्वत: संज्ञान लेकर आरोपियों को समन जारी कर पूछताछ कर सकता है। 20 वर्ष पहले अगर कोई वाक्या हुआ है तो उस समय वो नहीं कह पाईं, लेकिन अभी महिलाएं लिखित में आयोग को शिकायत कर सकती हैं, जिसके बाद अायोग आगे की कार्रवाई के लिए उसे संज्ञान में ले सकता है।

 

मी टू अभियान 12 साल पुराना है, जिसकी शुरुआत सोशल एक्टिविस्ट टैराना बर्क ने की थी। इसकी चर्चा तब से ज्यादा है, जब पिछले साल 15 अक्टूबर को हॉलीवुड अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने फिल्म प्रोड्यूसर हार्वी विंस्टीन पर यौन शोषण का आरोप ट्विटर के माध्यम से लगाया था।

 

 

इन 3 बातों से जानें मी टू से कहीं ज्यादा बड़ी है ये परेशानी-

 

एक दुविधा- 70% महिलाएं शिकायत ही नहीं करतीं : भले ही मी टू के खूब मामले आ रहे हों लेकिन सच्चाई यह है कि 70 फीसदी महिलाएं अपने साथ हुए बुरे व्यवहार की शिकायत ही नहीं करती हैं। इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन (आईएनबीए) द्वारा किए गए एक सर्वे में सामने आया कि वर्कप्लेस पर यौन शोषण की शिकार लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं अपने अधिकारियों से इसकी शिकायत ही नहीं करतीं। वहीं महिला आयोग में भी पहुंचने वाली शिकायतों का आंकड़ा बहुत कम है। मी टू कैंपन के इतने असर के बावजूद, आयोग में इस साल 10 महीनों में केवल 718 शिकायतें पहुंची हैं।

 

एक रिपोर्ट - सबसे ज्यादा आईटी कंपनियों में शिकायतें : देश की 100 बड़ी कंपनियों पर किए गए सर्वे में यह सामने आया है कि आईटी कंपनीज़ में यौन शोषण के सबसे ज्यादा मामले सामने आते हैं। 2017 में कुल मामलों में से 65 फीसदी मामले आईटी और कम्प्यूटर सर्विसेस कंपनी के थे। इसके बाद बैंक और फायनेंस कंपनियां (11.91%) थीं। अर्नेस्ट एंड यंग द्वारा तैयार की गई एक अन्य रिपोर्ट बताती है कि 40 फीसदी आईटी कंपनियों में शिकायत करने के लिए इंटरनल कंपलेंट कमेटी ही नहीं है। इस कारण जो महिलाएं शिकायत करना भी चाहती हैं तो वे नहीं कर पा रही हैं। 

 

 

एक सवाल- 60 वर्ष तक पुराने मामले अब आ रहे हैं सामने : मी टू के तहत जिन मामलों की चर्चा हो रही है, उनमें एक-दो सालों से लेकर 60 वर्ष तक पुराने हैं। अभिनेत्री हनी ईरानी का मामला करीब 60 वर्ष पुराना है। ऐसे में सवाल यह भी है कि अपनी बात रखने के लिए इतने वर्षों का इंतजार क्यों? साइकोलॉजिस्ट प्रो. अरुणा ब्रूटा कहती हैं कि किसी के साथ भी शारीरिक शोषण होता है तो यह मानसिक रूप से बहुत ही पीड़ादायक होता है।

 

इसे दुनिया के सामने लाने के लिए मानसिक परिपक्वता की आवश्यकता होती है। माहौल का भी फर्क पड़ता है। चूंकि अभी एक माहौल बन गया है इसलिए प्रभावित महिलाएं निडरता से बात रख पा रहीं हैं। साइकेट्रिस्ट और द होप फाउंडेशन के संस्थापक दीपक रहेजा कहते हैं कि सामाजिक दबाव, सामाजिक स्वीकार्यता और शक्तिशाली लोगों के खिलाफ बोलने की हिम्मत न होने के कारण कई बार इतना समय लग जाता है।
 

Bhaskar Whatsapp

Recommended

Click to listen..