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सबरीमाला पर पुनर्विचार नहीं, धार्मिक आस्था व मौलिक अधिकारों से जुड़े 7 मुद्दाें पर होगी सुनवाई

एक वर्ष पहले
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  • अयोध्या मामले की तरह सुनवाई कर सकती है 9 जजाें की संविधान पीठ

नई दिल्ली . सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि वह सबरीमाला मंदिर मामले में पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई नहीं करेगी। वह केवल धार्मिक आस्था और मौलिक अधिकारों से जुड़े उन 7 मुद्दों पर सुनवाई करेगी, जो 5 जजाें की पीठ ने सबरीमाला मंदिर मामले में सुनवाई के दौरान तय किए थे। संविधान पीठ ने वकीलों को कहा है कि वे सभी सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल से बैठक कर तय कर लें कि किस मुद्दे पर, कौन सा वकील कितनी देर दलीलें देगा। अगली सुनवाई 3 सप्ताह बाद होगी। संविधान पीठ में चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस आर भानुमति, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस एम शांतनागौदार, जस्टिस एस अब्दुल नजीर, जस्टिस आर सुभाष रेड्‌डी, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत शामिल हैं। 

काेर्ट में यूं चली जिरह: चीफ जस्टिस बाेले- राजीव धवन और सीएस वैद्यनाथन ने अयोध्या मामले में टाइमलाइन तय करते हुए बेहतरीन काम किया। एेसा ही इस मामले में हाे।

सबरीमाला मंदिर काेर कमेटी सदस्य: पीठ काे पहले कमेटी के प्रमुख द्वारा उठाए मुद्दे पर सुनवाई करनी चाहिए।

सीजेअाई बोबडे: हम पुनर्विचार याचिका नहीं सुन रहे हैं। केवल वे 7 मुद्दे तय कर रहे हैं, जो सबरीमाला मंंदिर की सुनवाई के दौरान 5 जजों की संविधान पीठ ने तय किए थे।

इंडियन लायर्स एसोसिएशन: मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी, मस्जिदों-दरगाहों में दाऊदी बोहरा समाज की महिलाओं में खतना प्रथा और पारसी महिलाओं के फायर टेंपल में प्रवेश पर पाबंदी जैसे महिलाओं के अधिकारों संबंधी याचिकाएं सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओंं के प्रवेश पर पाबंदी संबंधी मामले से जुड़ी हैं।

सीजेअाई बोबडे: अन्य समुदायों के विषय में ये सवाल अलग हैं या नहीं? यह उन्हें देखना है।

वकील इंदिरा जयसिंह: पुनर्विचार पर निर्णय वर्तमान मुद्दों को तय करने के लिए प्रारंभिक शर्त है। इस तरह के मुद्दे विशुद्ध रूप से अकादमिक प्रकृति के हैं और न्यायिक रूप से असंवेदनशील। हिंदू धर्म, इस्लाम और पारसी धर्म संबंधी सभी मुद्दे अलग-अलग प्रकृति के हैं। एक साथ तय नहीं किए जा सकते।

सीजेअाई बोबडे : वकील सबरीमाला मुद्दे से जुड़े किसी भी तथ्य का उल्लेख कर सकते हैं। हालांकि 9 जजों की पीठ के लिए हर तथ्य सुनना संभव नहीं होगा।

इंदिरा जयसिंह: फिर कोर्ट को यह बताना होगा कि 5 जजों की बेंच का फैसला गलत है। इस गलत ढंग से तय किए फैसले को किसी को सुनकर तय करना है कि हमें किस अधिकार पर जाना चाहिए।

वकील राजीव धवन: धार्मिक संस्थानों के मुद्दे पर इस अदालत का सुनवाई करना उचित नहीं होगा।

सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता: 5 जजों की बेंच के फैसले में कुछ भी गलत नहीं है और कोर्ट का इरादा स्पष्ट है। कोर्ट ने 7 मुद्दे तय किए थे, जिन पर 9 जजों की पीठ सुनवाई करेगी। 

सीजेअाई बोबडे : मि. साॅलीसिटर जनरल, हम इन आपत्तियों को नहीं देख रहे हैं। हम मुद्दों पर सुनवाई करेंगे।

वकील अभिषेक मनु सिंघवी: 5 जजों की संविधान पीठ ने जो 7 मुद्दे उठाए हैं, उन पर सुनवाई के लिए अधिक विशिष्ट होने की जरूरत है, ताकि उन्हें सही ढंग से तय किया जा सके।

सीजेअाई बोबडे : क्यों न दोनों पक्षों के बीच बैठक करवाकर मुद्दों को सही से स्थापित किया जाए? वकीलों को आपस में तय करना होगा कि किस मुद्दे पर कौन सा वकील कितने समय तक दलील देगा और जिरह करेगा। हमें याद है कि वकील राजीव धवन और वकील सीएस वैद्यनाथन ने अयोध्या मामले में टाइमलाइन तय करते हुए किस तरह बेहतरीन काम किया था। उसी तरह की एक टाइमलाइन इस मामले में भी तय की जा सकती है।

(इस पर कई वकील आपत्ति जताने लगे। तब चीफ जस्टिस ने आश्वासन दिया कि सभी वकीलों को सुना जाएगा। उन्हें सुने बिना बेंच उठने वाली नहीं है।)

वकील आर्यमा सुंदरम : अलग-अलग मुद्दों का उल्लेख करने के असंभव कार्य से गुजरने की बजाए पुनर्विचार पर भी सुनवाई करने की आवश्यकता है। सीजेअाई बोबडे (अपनी बात पर अड़े रहे): हम एेसे किसी भी मुद्दे पर सुनवाई नहीं करेंगे, जिसका जिक्र 5 जजों की बेंच ने फैसले में नहीं किया है। सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल 17 जनवरी को अभिषेक मनु सिंघवी, इंदिरा जयसिंह, राजीव धवन और अन्य सभी पक्षों के वकीलों के साथ बैठक करें। इसमें वकील तय करें कि कौन-किस मुद्दे पर कितने दिन दलील देगा। इस कार्य के लिए कोर्ट वकीलों को तीन सप्ताह का समय देती है। इसके बाद कोर्ट सुनवाई शुरू करेगी।
 

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