दिल्ली / मस्जिदों में महिलाओं को नमाज का हक मिले जैसे सबरीमाला में दिया गया: याचिकाकर्ता

Dainik Bhaskar

Apr 17, 2019, 03:17 AM IST



The women in mosques deserve the right of Namaz as given in Sabarimala
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The women in mosques deserve the right of Namaz as given in Sabarimala
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  • उसी फैसले की वजह से ही हम सुनवाई कर रहे हैं: सुप्रीम काेर्ट
  • मस्जिद में महिलाओं को इबादत संबंधी याचिका पर सुनवाई के बाद केंद्र को शीर्ष कोर्ट का नोटिस 

नई दिल्ली. सबरीमाला मंदिर की तर्ज पर मुस्लिम महिलाओं को भी देशभर की मस्जिदाें में जाकर नमाज पढ़ने देने की मांग पर सुप्रीम काेर्ट ने मंगलवार काे केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। केंद्र के अलावा राष्ट्रीय महिला आयोग, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और वक्फ बोर्ड से भी चार सप्ताह में जवाब मांगा गया है। काेर्ट ने कहा कि सिर्फ सबरीमाला मंदिर पर सुप्रीम काेर्ट के फैसले की वजह से ही इस मांग पर सुनवाई की जा रही है।

 

सुप्रीम काेर्ट के 5 जजाें की संविधान पीठ ने 28 सितंबर 2018 काे 4:1 के बहुमत से दिए फैसले में हर आयु वर्ग की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश का रास्ता खाेला था। 10 से 50 साल तक की महिलाअाें के मंदिर में प्रवेश पर लगी पाबंदी काे काेर्ट ने लैंगिक भेदभाव करार दिया था। महाराष्ट्र के दंपती यास्मीन और जुबेर अहमद पीरजादा ने इसी फैसले के अाधार पर सुप्रीम काेर्ट में याचिका दायर कर मांग की है कि मुस्लिम महिलाओं काे मस्जिदों में जाकर नमाज पढ़ने की इजाजत दी जाए। याचिका के अनुसार अभी भारत में जमात-ए-इस्लामी के तहत आती मस्जिदों में महिलाएं प्रवेश कर सकती हैं। लेकिन सुन्नी o अन्य पंथों की मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी है। 

 

कोर्ट रूम लाइव : जस्टिस एसए बोबडे और अब्दुल नजीर की बेंच के सामने याचिकाकर्ता मुस्लिम दंपती के वकील आशुुतोष दुबे ने दलीलें रखीं। पढ़िए सुप्रीम काेर्ट की कार्यवाही लाइव...
 

आशुताेष दुबे: देश में मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़नेे की इजाजत नहीं है। यह उनके समानता के अधिकार का हनन है। महिलाओं के समानता के मौलिक अधिकार की रक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हर अायु वर्ग की महिला काे सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की इजाजत दी थी।
जस्टिस एसए बोबडे: आपने अपनी मांग के लिए सिर्फ सबरीमाला फैसले काे ही अाधार बताया है। क्या समानता का अधिकार नॉन स्टेट एक्टर यानी सरकार के इतर लोगों से भी ले सकते हैं? 
 

आशुताेष: नहीं। लेकिन मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में जाने से रोका जाता है। पुलिस भी मस्जिद में नमाज पढ़ने में उनकी मदद नहीं करती।
जस्टिस अब्दुल नजीर: मुंबई की हाजी अली दरगाह में तो महिला जा सकती हैं।
 

आशुताेष: वहां इजाजत है, लेकिन बहुत सी मस्जिदों में महिलाओं के जाने पर पाबंदी है। 
जस्टिस नजीर: क्या मक्का-मदीना में महिला नमाज पढ़ सकती हैं?
 

आशुताेष: महिलाअाें काे मक्का की एक मस्जिद में प्रवेश की इजाजत है। कनाडा में भी महिलाओं को मस्जिदों में नमाज पढ़ने की इजाजत दी गई है।
जस्टिस बोबडे: मंदिर अाैर मस्जिद काे थर्ड पार्टी चलाती है। इसमें सरकार कहां से आ गई?
 

आशुताेष: भले ही मंदिर-मस्जिद सरकार के नहीं होते, लेकिन महिलाओं को इनमें जाने से नहीं राेकना चाहिए। पुलिस काे उनकी मदद करनी चाहिए।
जस्टिस नजीर: अगर काेई आपके घर में आना चाहे तो इसके लिए आपकी अनुमति जरूरी है। क्या कोई व्यक्ति पुलिस की मदद से आपके घर में घुस सकता है? इसमें सरकार कहां से आ गई?
जस्टिस बोबडे: अगर मस्जिद में मौजूद व्यक्ति नहीं चाहता कि महिला वहां प्रवेश करें तो क्या आप समानता के अधिकार को लेकर उसके खिलाफ प्रदर्शन करेंगे? अनुच्छेद 21 के तहत समानता का मौलिक अधिकार सिर्फ सरकार से मांग सकते हैं, नॉन स्टेट एक्टर से नहीं।


आशुताेष: मस्जिदें सरकाराें से अनुदान और अन्य लाभ प्राप्त करती रहती हैं।
इसके बाद कोर्ट ने सभी पक्षकारों को नोटिस जारी कर दिया।

 

इस्लाम की पहली मस्जिद काबा में भी जा सकती हैं महिलाएं

"इस्लाम की पहली मस्जिद काबा है। यहां पर पुरुष और महिलाएं साथ में नमाज पढ़ते हैं। दुनिया के सबसे कट्‌टर माने जाने वाले इस्लामी देश सऊदी अरब में मस्जिदों से लेकर शॉपिंग मॉल तक में महिलाओं के लिए नमाज की व्यवस्था होती है। मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे मुस्लिम देशों की अधिकांश मस्जिदों में औरतों के लिए अलग से नमाज की व्यवस्था होती है। मदीना शहर में स्थित मस्जिद-ए-नबवी को पैगंबर माेहम्मद की मस्जिद कहा जाता है। यहां पर भी औरतों की एंट्री है और वे यहां नमाज पढ़ सकती हैं।" -जीनत शौकत अली, डायरेक्टर जनरल, वर्ल्ड इंस्टीट्यूट ऑफ इस्लामिक स्टडीज फॉर डायलॉग, पीस एंड जेंडर जस्टिस

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