एनालिसिस / खुद का अस्तित्व बचाने के लिए आप को गठबंधन की जरूरत ज्यादा

Dainik Bhaskar

Apr 16, 2019, 03:03 AM IST



To save yourself, AAP need to alliance
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  • राहुल गांधी ने कहा- दिल्ली में 4 सीट देने को राजी, केजरीवाल ही ले रहे हैं यूटर्न
  • केजरीवाल का जवाब- बात चल रही थी, यूटर्न कैसा, गठबंधन कांग्रेस का दिखावा

नई दिल्ली. नामांकन शुरू होने के ठीक एक दिन पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल के ट्वीट ने गठबंधन के रास्ते लगभग बंद कर दिए हैं। दोनों के ट्वीट से जाहिर हो रहा है कि शायद गठबंधन की मंशा दोनों में से किसी की थी ही नहीं बल्कि वे दिखावा और पेंतरेबाजी ही कर रहे थे। राहुल के ट्वीट से साफ हो गया कि दोनों दलों के बीच शायद 4-3 सीटों पर गठबंधन पर सहमति लगभग बन गई थी लेकिन जब आप को कांग्रेस से सकारात्मक संकेत मिलने लगे तो दिल्ली से बाहर पांव पसारने की उसकी लालसा बढ़ गई।

 

हालांकि आप ने इस दिशा में हरियाणा में दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी से गठबंधन कर लिया था। इधर, दिल्ली में 67 सीटों के साथ 2015 में विधानसभा जीतने वाली आप को 54 फीसदी से भी ज्यादा वोट मिले थे और महज दो साल बाद ही निगम के चुनावों में आप का वोट प्रतिशत महज 26 फीसदी रह गया जबकि कांग्रेस को जहां विधानसभा चुनाव में महज 9.7 फीसदी वोट मिला था, निगम चुनाव में उसका वोट प्रतिशत 21 फीसदी पहुंच गया। 2014 के चुनाव में आप को करीब 33 फीसदी वोट मिले थे। दोनों पार्टियों के इस वोट प्रतिशत के विश्लेषण के आधार पर ही कांग्रेस व आप के बीच 4-3 वाला फार्म्यूला बना था।

 

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि वोट प्रतिशत ज्यादा होने के बावजूद कांग्रेस से बार-बार गठबंधन के लिए आप के आतुर होने से यह संकेत भी मिल रहा था कि आप को यह अंदाजा होने लगा था कि यदि लोकसभा चुनाव में उसका प्रदर्शन बेहतर नहीं रहा तो अगले साल 2020 में होने वाले विधानसभा चुनाव में उसकी हालत और खराब हो सकती है। इसलिए भाजपा को हराने से कहीं ज्यादा आप को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए गठबंधन की जरुरत थी। हालांकि आप के सामने यह चुनौती भी थी जिस जनता ने कांग्रेस से तंग आकर उन्हें नया विकल्प चुनकर सत्ता सौंपी थी, उसी वोटर के सामने कांग्रेस के साथ गठबंधन करने पर क्या सफाई देते?

 

बहरहाल, आप ने सातों सीटों पर अपने उम्मीदवार काफी पहले से ही घोषित करके अपना प्रचार शुरू करके एक बढ़त बना ली थी, लेकिन उसे पूर्वी दिल्ली और उत्तर पूर्व दिल्ली सीट पर ही इसका कुछ फायदा मिलता दिखा। लेकिन दिल्ली से बाहर भी कांग्रेस के साथ गठबंधन करने की आप की जिद ही इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा बन गई। जैसा कि कहा जाता है राजनीति में कोई किसी का स्थाई शत्रु या मित्र नहीं होता। विश्लेषक तो यहां तक मानते हैं कि यदि नाम वापसी के आखिर दिन तक भी दोनों में सहमति बन जाती है तो गठबंधन हो सकता है।

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