निर्भया केस: जिन दुष्कर्मियों की सजा मौत ही है, उन्हें वक्त देकर इंसाफ का दम क्यों घोट रहे?

2 वर्ष पहले
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  • निर्भया के दरिंदों का डेथ वॉरंट दोबारा टलने की आशंका है, इसकी वजह कानून के ही कुछ प्रावधान हैं
  • फांसी से बचने की सबसे बड़ी वजह- फैसले के बाद उसके अमल के लिए समयबद्ध प्रक्रिया का न होना

नई दिल्ली. निर्भया के दरिंदों का डेथ वॉरंट दोबारा टलने की आशंका है। इसकी वजह कानून के ही कुछ प्रावधान हैं, जिन्हें लेकर भास्कर ने पूर्व जजों से बात की। फांसी से बार-बार बचने की सबसे बड़ी वजह सामने आई- फांसी का फैसला हो जाने के बाद उसके अमल के लिए समयबद्ध प्रक्रिया का न होना। निर्भया केस समेत ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज एसएन ढींगरा और जस्टिस आरएस सोढ़ी का मानना है- ‘‘इस प्रकिया को समयबद्ध करना होगा, तभी समय पर सजा मिलेगी और न्यायिक तंत्र का मजाक नहीं बनेगा।’’ ऐसी ही कानूनी पेचीदगियों को दूर करने के लिए पूर्व जजों ने कानून में संशोधन की वकालत भी की।

सिस्टम में दो खमियां

1. फैसले से फांसी तक की सभी प्रक्रियाएं समयबद्ध नहीं, इसलिए बच रहे दोषी

नतीजा: क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 18 साल में 2,328 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई, पर फंदे पर सिर्फ 4 लटकाए जा सके हैं।

2. किसी एक दोषी को राहत मिले तो सबको मिलती है, ये प्रावधान भी आड़े आ रहा है

नतीजा: इस प्रावधान की वजह से निर्भया के चारों दोषी एक-एक कर याचिकाएं दाखिल कर रहे हैं। इसीलिए मामला खिंचता जा रहा है।

रिव्यू, क्यूरेटिव और दया याचिका दायर करने का समय तय करना होगा
जस्टिस ढींगरा ने कहा- ‘‘फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद रिव्यू पिटिशन, क्यूरेटिव और दया याचिका दायर करने के लिए निश्चित समय तय करना होगा। निर्भया के मामले में यही हुआ कि फांसी सुनाए जाने के बाद न दोषियों ने याचिकाएं दीं, न जेल ने डेथ वॉरंट की प्रक्रिया शुरू की। ढाई साल बाद निर्भया की मां कोर्ट पहुंचीं तो फांसी की प्रक्रिया शुरू हुई। इसलिए कानून में स्पष्ट करना होगा कि जेल समयबद्ध तरीके से प्रक्रिया पूरी नहीं करता तो क्या कार्रवाई होगी।’’

आर्टिकल- 72 और आर्टिकल- 161 में समय का जिक्र जरूरी
संविधान के आर्टिकल-72 के तहत राष्ट्रपति और आर्टिकल-161 के तहत राज्यपाल को अपराधी को माफ करने या उसकी सजा घटाने का हक है। लेकिन, फैसला लेने के लिए कोई समय सीमा तय नहीं है।
(दया याचिकाएं लंबित रहने की वजह से सुप्रीम कोर्ट 7 साल में 7 दोषियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर चुका है।)

संशोधन इसलिए जरूरी
क्योंकि देविंदरपाल भुल्लर जैसे आतंकी की दया याचिका लंबे समय तक लंबित रहने को आधार मानकर सुप्रीम कोर्ट उसकी सजा फांसी से उम्रकैद में तब्दील कर चुका है। दो दशकों में ऐसे 40 से ज्यादा मामले सामने आए हैं।

पक्ष या विपक्ष में फैसला आने पर एक समान प्रभाव हों, तब केस नहीं खिंचेंगे
जस्टिस सोढ़ी ने बताया- ‘एक अपराध से जुड़े दो से अधिक अपराधी एक-एक कर याचिकाएं दायर करते हैं। निर्भया के दोषी भी यही कर रहे हैं। पहले एक ने याचिका दी। उसके आधार पर फांसी की तारीख 22 जनवरी से बदलकर 1 फरवरी हो गई। यही बड़ी खामी है। मसलन- जब एक दोषी की फांसी उम्रकैद में बदली जाती है तो उस केस के बाकी दोषियों की सजा भी बदल जाती है। लेकिन, अगर याचिका खारिज हो जाती है तो अन्य दोषियों के पास याचिका का विकल्प बचा रहता है। इस प्रावधान को बदलना होगा।

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