दिल्ली / काम का बोझ और मोटापा कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स को बना रहा मानसिक रोगी, 62%डिप्रेशन की मरीज, 65 % को एन्जायटी



Workload and obesity make mental health community health workers, 62% depression patients, 65%
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Workload and obesity make mental health community health workers, 62% depression patients, 65%

  • वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे आज : साउथ वेस्ट दिल्ली के 11 गांव में काम करने वाली हेल्थ वर्कर्स पर की गई स्टडी 

Dainik Bhaskar

Oct 10, 2019, 07:55 AM IST

तरुण सिसोदिया | नई दिल्ली . काम का बोझ और मोटापा कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स को मानसिक रोगी बना रहा है। यह खुलासा केंद्र सरकार के सफदरजंग अस्पताल में हुई स्टडी के जरिए हुआ है। स्टडी के मुताबिक 61 फीसदी हेल्थ वर्कर्स डिप्रेशन में हैं। डिप्रेशन के अलावा एन्जायटी और स्ट्रेस से भी ये पीड़ित हैं। जल्द ही यह स्टडी रिसर्च मैग्जीन में भी प्रकाशित होने जा रही है। सफदरजंग अस्पताल के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग ने कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स की मानसिक स्थिति जानने के लिए जून, 2019 में एक स्टडी की।

 

इसमें साउथ वेस्ट दिल्ली के 11 गांव में काम करने वाली कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स को शामिल किया गया। हेल्थ वर्कर्स में एएनएम और आशा शामिल हैं। 55 हेल्थ वर्कर्स पर की गई स्टडी में सामने आया कि 61.6 फीसदी डिप्रेशन, 65.4 फीसदी एन्जायटी (चिंता) और 40.4 फीसदी स्ट्रेस (तनाव) में हैं। 40.4 फीसदी तीनों तरह यानी डिप्रेशन, एन्जायटी और स्ट्रेस से पीड़ित हैं। डिप्रेशन व एन्जायटी से पीड़ित 21.2 और 34.5 यानी 18 किसी भी तरह की मानसिक बीमारी से पीड़ित नहीं दिखे।

 

ये भी है वजह...घर की आर्थिक स्थिति, सामूहिक परिवार, पांच से छोटा बच्चा भी मानसिक रोग के कारण : स्टडी में सामने आया है कि हेल्थ वर्कर्स को मानसिक रोग काम के बढ़ते बोझ, मोटापा एवं कारणों की वजह से है। इसके अलावा घर की आर्थिक स्थिति, सामूहिक परिवार, पांच से छोटा बच्चा भी मानसिक रोग के कारण बताए गए हैं। स्टडी में शामिल कम्युनिटी विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. वेंकटेश ने कहा कि कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स की मानसिक स्थिति जानने के बारे में इस तरह की स्टडी पहली बार हुई है। गांव की कम्युनिटी वर्कर्स पर की गई स्टडी में सामने आया है कि इन्हें काफी दूर तक सेवाएं देने के लिए जाना होता है, जिसकी वजह से इन्हें कई-कई घंटे बाहर रहना पड़ता है। अभी 1000 पर एक हेल्थ वर्कर है। मगर हाई लेवल एक्सपर्ट की रिपोर्ट में 1000 पर दो हेल्थ वर्कर्स की सिफारिश की गई है। इसके बारे में सरकार को सोचने की जरूरत है।

 

बाबाओं के चक्कर में पड़े हैं मानसिक रोगी के परिजन : मानसिक रोगी के इलाज के लिए अभी भी परिजन तांत्रिक-बाबाओं का सहारा ले रहे हैं। इनकी तादाद थोड़ी नहीं, बल्कि 44 फीसदी है। ये खुलासा विश्व मानसिक स्वास्थ्य फेडरेशन के सहयोग से नई दिल्ली स्थित कासमोस इंस्टीट़्यूट आफ मेंटल हेल्थ एंड बिहेवियरल साइंसेस (सीआईएमबीएस) के एक अध्ययन से हुआ है। दिल्ली, यूपी, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और हरियाणा के करीब 10,233 लोगों को इस अध्ययन में शामिल किया गया था। 44 फीसदी मानते हैं कि इलाज के लिए तांत्रिक, बाबा या फिर अन्य का सहारा ले रहे हैं। मानसिक रोग का असर हार्ट और किडनी पर भी पड़ सकता है। यह कहना कि मनोचिकित्सक डॉ प्रकृति पोद्दार का। उन्होंने कहा कि हम अक्सर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के बीच घनिष्ठ संबंध की अनदेखी करते हैं।

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