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लाइफस्टाइल डेस्क. बेशक होली रंगों और मस्ती का त्योहार है लेकिन इसका उतना ही जुड़ाव सेहत से भी है। होली परंपराओं पर विज्ञान कहता है कि यह त्योहार शरीर को स्वस्थ रखने के साथ वातावरण से मच्छर, बैक्टीरिया और कीटों को खत्म करने का काम करता है। होलिका दहन के दौरान परिक्रमा करने पर शरीर में मौजूद बैक्टीरिया का दम घुटने लगता है और अधिक तापमान के संपर्क में आने से ये खत्म होने लगती हैं। होली की परंपराओं और रंगों से सेहत का सीधा जुड़ाव है। जानिए क्या है इसका विज्ञान....
अबीर-गुलाल का स्किन से कनेक्शन

जीव वैज्ञानिकों के मुताबिक, प्राचीनकाल से अबीर-गुलाल को कुदरती चीजों से तैयार किया जाता रहा है। इसमें फूलों से लेकर मसालों का प्रयोग किया गया है। फूलों की प्रकृति और मसालों की एंटीसेप्टिक खूबी खासतौर पर स्किन के लिए फायदेमंद है। अबीर-गुलाल जब स्किन के रोमछिद्रों से शरीर में पहुंचता है तो त्वचा के रंग में इजाफा करने के साथ बेजान पर्त को हटाता है। नेचुरोपैथी विशेषज्ञ डॉ. किरन गुप्ता के मुताबिक, प्राकृतिक रंगों में प्रयोग हल्दी, पलास के फूल, नीम की पत्तियां, मक्के का आटा, चुकंदर का रस फेसपैक और स्क्रब की तरह काम करता है और शरीर में निखार आता है।
होलिका दहन से बैक्टीरिया और कीटों का सफाया

वैज्ञानिकों के मुताबिक, होली के समय मौसम में बदलाव हो रहा होता है। धीरे-धीरे खत्म होती सर्दी और बढ़ती गर्मी के कारण वातावरण में बैक्टीरिया, कीट और मच्छरों की संख्या बढ़ती है। होलिका दहन के कारण अचानक वातावरण का तापमान तेजी से बढ़ने पर बैक्टीरिया और कीटों का दम घुटने लगता है। इनकी संख्या में तेजी से कमी आती है। होलिका दहन के दौरान परिक्रमा करने से बॉडी में मौजूद जीवाणु खत्म होने लगते हैं।
रंगों का विज्ञान : लाल रंग से दर्द और नारंगी से अस्थमा का इलाज

वैज्ञानिकों का कहना है होली में इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग रंग एक थैरेपी की तरह काम करते हैं। कई तरह के रंग शरीर और दिमाग को संतुलित रखते हैं। साथ ही यह आपके दिमाग को बूस्ट करते हैं। इसे देखने पर शरीर में हार्मोन और रसायन रिलीज होते हैं जो रोगों से राहत दिलाते हैं। वर्तमान में रोगों को खत्म करने वाली कलर थैरेपी भी इसी खूबी का ही हिस्सा है वहीं इजिप्ट और चीन में इसका इस्तेमाल प्राचीन समय से इलाज के तौर पर किया जा रहा है। जैसे…
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