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जब महात्मा गांधी ने कहा था- 'जामिया को चलाएंगे भले ही हमें भीख क्यों न मांगनी पड़े'

2 वर्ष पहले
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एजुकेशन डेस्क. नागरिकता कानून के विरोध में दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी छात्रों के उग्र प्रदर्शन का केंद्र बन गई है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, लखनऊ के नदवा कॉलेज और पटना में प्रदर्शन हो रहे हैं। पुलिस और छात्रों के बीच संघर्ष को लेकर विरोधाभासी बयान आ रहे हैं। ऐसे में इस यूनिवर्सिटी के इतिहास के बारे में जानें तो पता चलता है कि जामिया की शुरुआत गुलामी की दौर में अंग्रेजों विरोध के बीच एक छोटी सी संस्था के रूप में हुई थी।

उर्दू में 'जामिया' का अर्थ है विश्वविद्यालय और 'मिलिया' यानी राष्ट्रीय। जामिया यूनिवर्सिटी की शुरुआत  29 अक्टूबर 1920 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से हुई। इसकी स्थापना स्वतंत्रता सेनानियों के एक समूह ने की थी। जिसमें प्रमुख तौर पर मुहम्मद अली जौहर, शौकत अली, महात्मा गांधी, हकीम अजमल खान, महमूद-उल-हसन थे। 1925 में यूनिवर्सिटी को अलीगढ़ से दिल्ली शिफ्ट किया गया। हकीम अजमल ख़ान जामिया यहां के पहले चांसलर बने। 1988 में इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। जामिया के इतिहास में कुछ अहम किस्सों का जिक्र है को इसकी यात्रा को बखूबी बताते हैं। जानते हैं ऐसे ही चार किस्से।

1) पहला किस्सा : महात्मा गांधी ने यूनिवर्सिटी से 'इस्लामिया' शब्द हटाने का किया था विरोध

विश्वविद्यालय के इतिहास में एक ऐसा समय आया जब इसके नाम से 'इस्लामिया' शब्द हटाने की बात सामने आई। वजह यह थी कि ऐसा होने के बाद गैर मुस्लिम स्रोतों से फंड लाने में आसानी होगी। जब यह बात महात्मा गांधी को पता चली तो उन्होंने इसका विरोध किया। इस बात का जिक्र 1969 में जामिया से निकलने वाली उर्दू पत्रिका 'जामिया' के नवंबर अंक में हुआ था। लेख का नाम ‘महात्मा गांधी और जामिया मिलिया इस्लामिया’ है जिसे लिखा था प्रोफेसर मो. मुजीब साहब ने। सैय्यद मसरूर अली अख्तर हाशमी ने अपनी किताब में लिखा है कि 'गांधी ने न सिर्फ जामिया मिलिया के साथ 'इस्लामिया' शब्द बने रहने पर जोर दिया बल्कि वह ये भी चाहते थे कि इसके इस्लामिक चरित्र को भी बरकरार रखा जाए।’ प्रो. मुहम्मद मुजीब स्वतंत्रता सेनानी और अंग्रेज़ी व उर्दू साहित्य के विद्यान थे। मुजीब साहब ने ऑक्सफोर्ड में इतिहास का अध्ययन किया और फिर जर्मन गए जहां उनकी मुलाकात जाकिर हुसैन हुई। 1926 में अपने दोनों दोस्त आबिद हुसैन व जकिर हुसैन के साथ भारत लौटे और जामिया की सेवा में लग गए। 1948 से लेकर 1973 जामिया मिलिया इस्लामिया के वाइस चांसलर रहे। 1965 में भारत सरकार ने प्रो. मुहम्मद मुजीब को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्म भूषण से नवाजा।

जामिया का पहला दीक्षान्त समारोह 1921 में हुआ। तस्वीर में मौजूद डॉ एमए अंसारी, हाकिम अजमल खान, सईद सुलेमान नदवी, मौलाना अबुल कलाम आजाद, डॉ जाकिर हुसैन, मौलाना शौकत अली, एएम ख्वाजा।
जामिया का पहला दीक्षान्त समारोह 1921 में हुआ। तस्वीर में मौजूद डॉ एमए अंसारी, हाकिम अजमल खान, सईद सुलेमान नदवी, मौलाना अबुल कलाम आजाद, डॉ जाकिर हुसैन, मौलाना शौकत अली, एएम ख्वाजा।

असहयोग आंदोलन के बीच राष्ट्रवादी विचार को लेकर पनपा जामिया जब वित्तीय संकट से जूझ रहा था तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने पैसों की तंगी को लेकर कहा था कि आर्थिक परेशानियों के बावजूद जामिया को चलाना ही होगा। भले ही इसके लिए मुझे भीख ही क्यों न मांगनी पड़े। इस बात को जामिया की कहानी पुस्तक में अब्दुल गफ्फार महदौली ने भी लिखा है। महात्मा गांधी और जामिया के संबंध पर 'जामिया और गांधी' किताब लिखने वाले यहां के पूर्व छात्र अफरोज आलम साहिल के मुताबिक, 1922 में महात्मा गांधी ने असहयोग-आंदोलन वापस ले लिया था और मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने 1924 में खिलाफत आंदोलन के अंत की घोषणा कर दी। इसके बाद जामिया को मिलने वाली आर्थिक मदद बंद हो गई थी। 28 और 29 जनवरी 1925 को दिल्ली के करोल बाग स्थित शरीफ मंजिल में फाउंडेशन कमेटी का जलसा हुआ, जिसमें तय हुआ कि जामिया को चलाते रहना है। दूसरे दिन जलसे में महात्मा गांधी भी मौजूद थे। पैसों की तंगी को लेकर कहा कि जामिया को चलाना ही होगा, भले ही इसके लिए मुझे भीख ही क्यों न मांगनी पड़े।  स्वतंत्रता सेनानी और मुस्लिम धर्मज्ञ, मौलाना महमूद हसन ने शुक्रवार, 29 अक्तूबर 1920 को अलीगढ़ में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की आधारशिला रखी। जामिया के जनसंपर्क अधिकारी अहमद अजीम के मुताबिक, जामिया पहला राष्ट्रवादी शिक्षण संस्थान है। अंग्रेजी शासन से स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे बनाने और सींचने में अनगिनत कुर्बानियां दीं। उनमें से कईयों ने बिना तनख्वाह काम किया। अपना जमीन-जायदाद जामिया के नाम कर दिया। गांधी जी के अलावा रवीन्द्रनाथ टैगोर, मुंशी प्रेमचंद, बिरला, जमुना लाल बजाज जैसी हस्तियों का जामिया से करीबी रिश्ता रहा। मुंशी प्रेमचंद के नाम से तो यहां एक आर्काइव भी है। 

जामिया के शुरुआती सालों की तस्वीर में महात्मा गांधी और डॉ जाकिर हुसैन।
जामिया के शुरुआती सालों की तस्वीर में महात्मा गांधी और डॉ जाकिर हुसैन।

1 मार्च, 1935 को जामिया के सबसे छोटे छात्र अब्दुल अज़ीज ने ओखला में इसकी पहली बिल्डिंग की नींव रखीं। यह आइडिया डॉ जाकिर हुसैन का था, जिसकी तारीफ महात्मा गांधी ने भी की। गांधी ने जाकिर हुसैन को एक पत्र भेजा, जिसमें लिखा था, 'यह एक बहुत श्रेष्ठ विचार है कि जामिया की बुनियाद उसके सबसे छोटे बच्चे द्वारा रखी जाए. इस कल्पना की मौलिकता पर मेरी बधाई। मैं जानता हूं जामिया का भविष्य उज्जवल है। मैं आशा करता हूं कि इसके द्वारा हिन्दू-मुस्लिम एकता का बीज शानदार वृक्ष के रूप में उगेगा। मैं इस साहसिक प्रयास की हर सफलता के लिए कामना करता हूं।' डॉ. ज़ाकिर हुसैन 1926 से 1948 तक जामिया के वाइस चांसलर रहे। 1963 में जामिया के चांसलर बने। 

ओखला में बनी जामिया की पहली बिल्डिंग के चीफ आर्किटेक्ट थे जर्मनी के कार्ल हेंज जो तुर्की के एक प्रिंस अब्दुल करीम के साथ हैदराबाद पहुंचे थे। डॉ. ज़ाकिर हुसैन और कार्ल हेंज जल्द ही जर्मन भाषा के अपने सामान्य ज्ञान के कारण दोस्त बन गए। हेंज ने अपनी मर्जी से बिना किसी शुल्क के जामिया की इमारतों को डिजाइन किया। कार्ल हेंज की डिजाइनों को व्यावहारिक रूप मिस्त्री अब्दुल्ला ने दिया। इंजीनियर ख्वाजा लतीफ हसन पानीपति ने भी निर्माण कार्य की देख-रेख के लिए भी स्वेच्छा से काम किया था। हेंज इमारत को तैयार करने के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध मैटेरियल जैसे लाल पत्थर और लाइम का प्रयोग किया। लेकिन जमीन के लिए कोटा के पत्थर का इस्तेमाल किया।

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