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अभावों में पला, धोखा भी खाया पर डटा रहा, आईआईटी में दाखिला अब जर्मन कंपनी में जॉब

10 महीने पहले
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एजुकेशन डेस्क.जूतों की दुकान में काम करते थे उसके वालिद। अक्सर यही सोचते कि क्या उनकी जिंदगी यूं ही गुजर जाएगी? क्या उनके बच्चों को बेहतर जिंदगी नसीब नहीं होगी? बेटा हंजला पढ़ने में होशियार था। मगर घर की खस्ता हालत हर कदम पर सबसे बड़ी रुकावट थी। मां यास्मीन तो चाहती थी कि हंजला किसी बड़े मुकाम पर पहुंचे। एक सरकारी स्कूल में बेटे का दाखिला कराया गया। कुछ समय बाद स्कूल संकट में आ गया। शिक्षकों ने आना बंद कर दिया। ताले जड़ दिए गए। तब घर में कुछ मदद की मंशा से उसकी बुआ ने एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी शुरू की। गुजारिश करके हंजला को वहीं दाखिल कराने में कामयाब हो गई। फीस की फिक्र भी नहीं करनी थी। गाड़ी पटरी पर आई। 

सुपर 30 के नाम पर मिला धोखा
तीन-चार साल बाद बुआ का निकाह हो गया। उनके रुखसत होते ही हंजला से फीस मांगी गई। पैसे थे नहीं। आखिरकार उसे स्कूल से निकाल दिया गया। उन्हीं दिनों जावेद नाम के एक रहमदिल टीचर की निगाह हंजला पर गई। उन्होंने कहा, बेटा जितना पढ़ सकते हो पढ़ो। बाकी की फिक्र छोड़ दो। कुछ ऐसा करो कि दुनिया देखे। हंजला के लिए यह बड़ी नेमत थी। वह किताबों में ही रम गया। एक कमरे के घर में कई लोग थे। वह बाहर जाकर पढ़ता। 2010 में उसने दसवीं पास की। मुसीबतें इम्तहान लेने से कब बाज आती हैं? इंजीनियर बनने का ख्वाब लिए हंजला अपनी मां यास्मीन के साथ सुपर 30 के बारे में सुनकर पटना आया। मासूम मां-बेटे सुपर 30 से मिलते-जुलते नाम के किसी संस्थान के चक्कर में पड़ गए। उनसे पैसे मांगे गए। यास्मीन ने अपना सबसे प्यारा गहना बेचा। थोड़े ही वक्त में उन्हें अहसास हो गया कि वे गलत जगह जा पहुंचे हैं। हंजला बारहवीं तो पास कर गया मगर इंजीनियरिंग में दाखिला नहीं हुआ।

मौके की तलाश में पहुंचा सुपर-30
एक दिन वे मेरे पास आए। यास्मीन की आंखों में आंसू थे। पिता ने बताया कि महीने की उसकी कुल कमाई 28 सौ रुपया ही है। अपनी आपबीती सुना रहे थे। हंजला सिर झुकाए था। उनकी कहानी किसी के दिल को भी पिघलाने के लिए काफी थी। हंजला को देखकर ही लगा कि इस काबिल बच्चे को सिर्फ एक मौके की दरकार है। बस फिर क्या था वह हमारी टीम में आ गया। गजब का मेहनती हंजला गणित के सवालों को कई-कई तरह से हल करने का हुनर रखता था। उस बैच में दो बच्चे मुस्लिम थे। ईद के मौके पर मैंने छुट्टी रख दी। सबको कहा कि मजे से त्योहार मनाओ। घर जाओ। हंजला और महबूब आकर बोले कि हम नहीं जाएंगे। जब होली-दिवाली आपके साथ मनाई तो ईद मनाने क्यों जाएं? हमने घर पर ही दावत रखी। मिलकर मजे से सेवइयां बनाई। वह यादगार ईद थी। 

आज जर्मन कंपनी में है हंजला
2013 में आईआईटी में प्रवेश परीक्षा का दिन नजदीक आ रहा था। हंजला को देखकर ही कोई भी कह सकता था कि यह लड़का बाजी मारेगा। नतीजे के एक दिन पहले ही हंजला और यास्मीन गए। यास्मीन की जिंदगी की सबसे बड़ी हसरत पूरी होने जा रही थी। हंजला ने ऊंची रैंक हासिल की। यास्मीन की आंखों में तब भी आंसू थे, जब वह पहली बार आई थीं। मगर वे मजबूरी और बेबसी के आंसू थे। आंखें अब भी बह रहीं थीं मगर अब बात और थी। हंजला आज दिल्ली आईआईटी से अपनी पढाई पूरी करके एक जर्मन कंपनी में काम कर रहा है। अब उसके पिताजी की अपनी दुकान है। घर भी बन गया है। आज भी हंजला के माता-पिता मुझसे मिलने पटना अक्सर आया करते हैं।’

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