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बंगाल के 3 हिल स्टेशनों से ग्राउंड रिपोर्ट:यहां ममता गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के भरोसे; पर इनकी आपसी लड़ाई का फायदा BJP को, 2017 गोलीकांड को लेकर TMC से नाराजगी भी

कोलकाता3 महीने पहलेलेखक: अमरेंद्र कुमार
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देश के चुनिंदा हिल स्टेशनों में शुमार दार्जिलिंग, कालिम्पोंग और कर्सियांग में हर साल इस सीजन में लोगों की भीड़ रहती है, लेकिन इस साल की भीड़ अलग है। इस बार आम टूरिस्ट नहीं, चुनावी टूरिस्ट और उनके समर्थकों की भीड़ से नॉर्थ बंगाल का ये पहाड़ी इलाका गुलजार है। कोलकाता की उमस भरी गर्मी से दार्जिलिंग का शांत-ठंडा मौसम जितना अलग है, उतनी ही अलग यहां की राजनीति भी है। गोरखालैंड यहां का सबसे बड़ा मुद्दा रहा है, लेकिन इस बार इस आंदोलन के तीनों बड़े नेताओं बिमल गुरुंग, विनय तमांग और मन घीसिंग (सुभाष घीसिंग के पुत्र) की बदली हुई वफादारियों की वजह से खुलकर ये मुद्दा कोई नहीं उठा रहा।

2016 में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा भाजपा के साथ था और मन घीसिंग के नेतृत्व वाला गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) तृणमूल कांग्रेस के साथ। इस बार जीएनएलएफ पूरी तरह भाजपा के साथ गठबंधन में है। जबकि गोरखा जनमुक्ति मोर्चा अब बिमल गुरुंग और विनय तमांग के दो गुटों में बंट गया है। दोनों ही तृणमूल कांग्रेस के समर्थन का दावा करते हैं, लेकिन इनके बीच वोट बंटने का फायदा भाजपा को मिलता दिख रहा है।

पिछले चुनाव में तीनों सीटें गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने जीती थी

दरअसल, 2016 में यहां गोरखालैंड सबसे बड़ा मुद्दा था। तब भाजपा के समर्थन से यहां की तीनों सीटें गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने जीती थी। 2017 में गोरखालैंड की मांग पर यहां बड़ा आंदोलन हुआ। आंदोलन को खत्म कराने के प्रयास के दौरान हिंसा भड़कने से हुए गोलीकांड में 12 गोरखा और एक पुलिस जवान की मौत हो गई थी। आंदोलन के अगुआ और गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) के निर्वाचित अध्यक्ष बिमल गुरुंग अंडरग्राउंड हुए तो ममता बनर्जी ने उन्हीं के साथी विनय तमांग को जीटीए का मनोनीत अध्यक्ष बना दिया। बाद में बिमल गुरुंग के खिलाफ दर्ज केस वापस ले लिए गए। माना जा रहा है कि इसी के बाद गुरुंग का झुकाव टीएमसी की ओर हो गया।

पिछले दिनों यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ दार्जिलिंग आए थे। उनके साथ मंच पर मन घीसिंग भी मौजूद रहे। वे इस बार भाजपा को सपोर्ट कर रहे हैं।
पिछले दिनों यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ दार्जिलिंग आए थे। उनके साथ मंच पर मन घीसिंग भी मौजूद रहे। वे इस बार भाजपा को सपोर्ट कर रहे हैं।

चुनाव की शुरुआत में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को अपने साथ जोड़ना ममता बनर्जी की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा था, लेकिन जमीन पर हालात बताते हैं कि इसका फायदा भाजपा को मिल सकता है। बिमल गुरुंग के टीएमसी के साथ जाने से गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ही दो गुटों में बंट गया। यहां तृणमूल का अपना कोई प्रत्याशी नहीं है, वह गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का समर्थन कर रही है, लेकिन मोर्चा के दोनों गुटों ने अपने-अपने प्रत्याशी उतारे हैं। इससे वोट बंटना तय है।

दूसरा बड़ा फैक्टर यहां 2017 का गोलीकांड है। स्थानीय लोग खुलकर चुनाव पर बात तो नहीं करते, लेकिन दबी जुबान में इस गोलीकांड के लिए ममता बनर्जी को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। रोहिणी के लोअर शिरूबाडी में स्थानीय लोगों की चुनावी चर्चा में मौजूद लोग पहले तो वोट किसे देंगे का सवाल टालते रहे। अंतत: 61 वर्षीय श्याम किशोर थापा का गुस्सा फूट पड़ा, बोले-मर जाऊंगा...लेकिन टीएमसी को वोट नहीं दूंगा। यह कहने पर कि टीएमसी का तो प्रत्याशी ही नहीं है...सभी शांत हो गए।

लोग जानते हैं कि गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के किसी भी गुट को वोट देना, टीएमसी को ही मजबूत करना है। लोगों की इन भावनाओं का अंदाजा भाजपा को भी है, तभी दार्जिलिंग से करीब 10 किलोमीटर दूर लेबंग की चुनावी सभा में अमित शाह कह गए कि यही मौका है, दीदी के सभी जुर्मों का हिसाब-किताब कर दें।

गोरखा नेता टीएमसी का समर्थन मिलने के कारण भले गोरखालैंड की बात न कर रहे हों, मगर भाजपा जरूर परमानेंट पॉलिटिकल सॉल्युशन (पीपीएस) के बहाने यह मुद्दा उठा रही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हों या केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, दोनों ही यहां वादा कर गए हैं कि राज्य में सरकार बनी तो गोरखालैंड आंदोलन की सभी प्रमुख मांगों, यानी 12 गोरखा जातियों को एससी का दर्जा और चाय-सिनकोना वन बस्ती भूमि का स्वामित्व आदि को पूरा किया जाएगा। पार्टी ने ऐसा ही वादा 2019 में भी किया था। मगर अब शाह कह रहे हैं कि राज्य और केंद्र में अलग-अलग दलों की सरकार के कारण इसमें अड़चन आ रही है।

ममता बनर्जी इस इलाके के चुनाव पर पूरी नजर रखे हुए हैं। 2019 में दार्जिलिंग की लोकसभा सीट भाजपा के हाथ में जाने के बाद वे यहां की राजनीतिक उठापटक को लेकर काफी सतर्क भी हैं। मगर गोरखालैंड का अंडरकरंट चुनाव में सीन बदल सकता है।

बिमल गुरुंग गोरखालैंड आंदोलन के बड़े नेता हैं। पहले भाजपा में थे। अब ममता बनर्जी को सपोर्ट कर रहे हैं।
बिमल गुरुंग गोरखालैंड आंदोलन के बड़े नेता हैं। पहले भाजपा में थे। अब ममता बनर्जी को सपोर्ट कर रहे हैं।

भाजपा ने हमें धोखा दिया, तभी टीएमसी के साथ आए : बिमल गुरुंग

बंगाल चुनाव के तमाम पहलुओं को लेकर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता बिमल गुरुंग से भास्कर ने सीधी बात की। उन्होंने कहा कि पहले मैं अपने मुद्दे को लेकर भाजपा में शामिल हुआ था, लेकिन वहां मुझे धोखा मिला। इसलिए मैंने भाजपा का साथ छोड़ दिया। पढ़िए उनसे बातचीत के प्रमुख अंश...

  • 2016 में भाजपा के समर्थन से लड़े थे, इस बार खिलाफ लड़ रहे हैं, कितनी सीटें जीत पाएंगे?

तीनों सीट पर हमारे ही प्रत्याशी विजयी होंगे। वह भी अच्छी मार्जिन से।

  • भाजपा के साथ लंबे समय तक रहे, फिर टीएमसी के साथ आने की क्या वजह रही?

हम अपने मुद्दे के लिए भाजपा के साथ थे, लेकिन पार्टी ने विश्वासघात किया। अब टीएमसी के साथ हम लोग का गठबंधन हो गया है।

  • आपने इतना बड़ा आंदोलन किया, नतीजा क्या रहा?

वही तो। भाजपा ने उसमें बड़ा धोखा दिया। 2009 से हम लोगों ने भाजपा की मदद की, लेकिन संकल्प पत्र में गोरखालैंड के बदले पीपीएस डाल दिया।

  • भविष्य में भी भाजपा से परहेज रखेंगे?

इतना बड़ा धोखा दिया तो भविष्य में भी परहेज ही रखेंगे।

  • आपके लिए बड़ा प्रतिद्वंद्वी कौन हैं, भाजपा या विनय तमांग?

(थोड़ी देर चुप रह कर) सभी तो मैदान में हैं। अपना-अपना दांव चलते हैं। मैं भी तो अपना दांव चलता हूं। दोनों बड़े प्रतिद्वंद्वी हैं।

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