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भाजपा-कांग्रेस लोकसभा चुनाव में बढ़े 7-10% वोट रोक पाई तो आप को बड़ी चुनौती मिलेगी

एक वर्ष पहले
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2015 के विधानसभा चुनाव की तरह वोट बदले तो आप को अपना दबदबा बचाने को जूझना होगा। - Dainik Bhaskar
2015 के विधानसभा चुनाव की तरह वोट बदले तो आप को अपना दबदबा बचाने को जूझना होगा।
  • 2013 में 3 दलों के उतरने के बाद से दिखा बड़ा बदलाव, आप की एंट्री के बाद दिल्ली में हुए 4 चुनाव

नई दिल्ली (अखिलेश). भाजपा और कांग्रेस के बीच का रणक्षेत्र बनने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव के रण में आम आदमी पार्टी (आप) का प्रवेश 2013 में हुआ। तब से विधानसभा और लोकसभा के 4 चुनाव हुए, अब पांचवें चुनाव की बारी है। आप की एंट्री से वोट ट्रेंड बदले। लोकसभा में मोदी का चेहरा और विधानसभा में अरविंद केजरीवाल के चेहरे पर सांसद और विधायक चुने जाने लगे। 2013 में त्रिशंकु और फिर 49 दिन की सरकार आई। फिर एक साल बाद लोकसभा चुनाव हुआ तो बंपर वोट से सभी सात सीटें भाजपा के खाते में गईं। 

नौ महीने बाद विधानसभा चुनाव-2015 हुआ तो बंपर वोट के साथ आप 67 सीट ले आई। लोकसभा-2019 में फिर भाजपा पिछली बार से भी ज्यादा दमदारी के साथ सात सीट ले गई। यही ट्रेंड लोकसभा के बाद विधानसभा या दो लोकसभा चुनाव के बीच बढ़े वोट बचाने में भाजपा-कांग्रेस सफल रही तो आप के लिए बड़ी चुनौती पेश आएगी।

भास्कर ने 2013 से 2019 के बीच हुए 4 चुनाव के मतदाताओं के ट्रेंड का विश्लेषण किया तो सामने आया कि आम आदमी पार्टी का 3-21%, भाजपा का 14-25% और कांग्रेस के वोट में 6-13% वोट का उतार-चढ़ाव सामने आया है। भास्कर स्कैन में यह बात सामने आई कि 2015 के विधानसभा चुनाव की तरह वोट बदले या फिर भाजपा और कांग्रेस 2019 लोकसभा चुनाव में बढ़े अपने वोट रोक पाए तो आप को अपना दबदबा बचाने को जूझना होगा।

आप में 3-21%, भाजपा में 14-25% व कांग्रेस में 6-13% की वोट शिफ्टिंग का ट्रेंड 

  • लोकसभा चुनाव-2014 के मुकाबले लोकसभा चुनाव-2019 में भाजपा और कांग्रेस के 7-10% वोट बढ़े थे
  • 2014 लोकसभा के बाद विधानसभा 2015 चुनाव की तरह वोटर शिफ्ट हुए तो भी आप को मिल सकती है चुनौती

आम आदमी पार्टी

पहले चुनाव में मिले थे 29.5% वोट
दिल्ली विधानसभा चुनाव में तीन दलाें के मैदान में होने और उसके ट्रेंड को देखें तो आम आदमी पार्टी सबसे बड़े दमखम के साथ उभरी है। 2013 के पहले चुनाव में 29.5% वोट लेकर 28 सीट जीतने वाली आप ने अपने दूसरे चुनाव (लोस-2014) में करीब चार फीसदी वोट बढ़ाए तो 2015 में तो बंपर 54.5% वोट के साथ जनता ने 67 सीटें दे दीं। हालांकि तुरंत बाद चार साल बाद लोस में उतरे तो फिर पिछले लोस के मुकाबले 15% वोट गिर गए। अबकी बार देखना होगा कि 2014 लोस के बाद 2015 का ट्रेंड कायम रहता है या बदलता है।

भाजपा 

1993 में 47% वोट के साथ 47 सीट 
1993 में 47% वोट के साथ 47 सीट जीतने वाली भाजपा को पांच साल बाद के दूसरे चुनाव में कांग्रेस ने झटका दिया था। सीधे 15 सीट पर आए लेकिन सबसे बड़ा झटका 2013 में लगा। इस चुनाव में भाजपा को सबसे कम 31.1 फीसदी वोट मिले। हालांकि सीटें 28 आईं। फिर लोकसभा-2014 हुआ तो फिर 1993 के विस चुनाव की तरह करीब 47% वोट और सभी सात सीटें मिल गईं। लेकिन 2015 विस चुनाव हुए तो भाजपा 32% वोट के बावजूद महज 3 सीटें ही ला पाई। चार साल बाद लोस चुनाव-2019 हुए तो बाजी पलट गई। भाजपा की झोली में 56.9% वोट के साथ दिल्ली की सातों संसदीय सीट आ गई। अब भाजपा के सामने 2019 के बढ़े वोट प्रतिशत को रोकना चुनौती है।

कांग्रेस

1998 से 2003 तक 40-48% तक वोट लेकर दिल्ली की सत्ता में काबिज रही
दिल्ली में कांग्रेस 1998 से 2003 तक 40-48% तक वोट लेकर दिल्ली की सत्ता में काबिज रही। 2009 में सभी 7 लोस सीटें भी जीतीं। 2013 विस चुनाव में 24.7% वोट पर आ गए जिसमें महज 8 सीटें मिली। लोस चुनाव 2014 में मोदी लहर में वोट घटकर 15% और तुरंत बाद 2015 में केजरीवाल लहर में वोट दहाईं से भी नीचे 9.7% और सीट शून्य हो गईं। 2019 लोस चुनाव में वोट 22.6% पहुंचा लेकिन सीट जीरो रही। लोस चुनाव में विस वार आंकलन करें तो कांग्रेस 5 मुस्लिम सीट पर नंबर-वन और 42 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही।

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