इलेक्शन खास / द्रविड़ राजनीति की नब्ज पर कांग्रेस का हाथ



Congress's hand on the pulse of Dravidian politics
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Congress's hand on the pulse of Dravidian politics

  • तमिलनाडु में चुनाव अन्नाद्रमुक के लिए जीने-मरने जैसा है

एन के सिंह

एन के सिंह

Apr 16, 2019, 03:29 AM IST

म्यूजिकल चेयर के खेल के लिए मशहूर तमिलनाडु की राजनीति एक बार फिर करवट बदलती दिख रही है। 10 सालों से सत्ता पर काबिज अन्नाद्रमुक में आपसी कलह और फूट का फायदा उसके परंपरागत प्रतिद्वंदी द्रमुक को मिल रहा है। सहयोगी दल कांग्रेस की बांछे खिली हैं। यूपीए गठबंधन के विजय का भरोसा दिलाते हुए कांग्रेस नेता पी चिदंबरम कहते हैं ‘जब भी डीएमके और कांग्रेस ने साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा है, 1989 से आजतक वे कभी नहीं हारे हैं।’ द्रविड़ राजनीति में कभी द्रमुक की सरकार बनती है, तो कभी अन्नाद्रमुक का पलड़ा भारी हो जाता है। राष्ट्रीय पार्टियां आधी सदी से हाशिये पर हैं। अपनी एकछत्र नेता जयललिता की मौत के बाद आंतरिक कलह से तबाह अन्नाद्रमुक अभी पूरी तरह उबर नहीं पाया है। वह अम्मा के भीमकाय कटआउट से काम चला रहा है, जबकि सामने द्रमुक के पास हाड़-मांस के स्टालिन हैं।

 

थेनी से कांग्रेस उम्मीदवार इवीकेएस इलांगोवन, जो द्रविड़ राजनीति के जनक पेरियार के पौत्र हैं, बताते हैं, ‘अन्नाद्रमुक की हालत इस दफा खस्ता है।’ कद्दावर नेता टीटीवी दिनाकरण ने पार्टी से विद्रोह कर नई पार्टी बनाई है, जो वोट काटकर अन्नाद्रमुक को नुकसान पहुंचा रही है। अन्नाद्रमुक सरकार के लिए ये चुनाव जीने-मरने का प्रश्न है। राज्य की 39 सीटों के लिए 18 अप्रैल को वोटिंग होगी। इसके साथ ही विधानसभा की 22 सीटों के लिए भी उपचुनाव होने वाले हैं। सत्ता में बने रहने के लिए अन्नाद्रमुक को इनमें से कम से कम 8 सीटें जीतनी होंगी।  


तमिलनाडु में गठबंधन राजनीति के विराट स्वरूप के दर्शन होते हैं, और दक्षिण-उत्तर विभाजन के भी। अन्नाद्रमुक की अगुआई में चुनाव लड़ रहे एनडीए और द्रमुक के सहारे वैतरणी पार कर रही यूपीए के बीच एक फर्क साफ नजर आ रहा है। कांग्रेस नेता ए गोपन्ना कहते हैं कि यह पहला ऐसा चुनाव है जिसमें कांग्रेस को जितना फायदा द्रमुक से हो रहा है, उतना ही द्रमुक को कांग्रेस की वजह से हो रहा है। यहां ओपिनियन पोल में राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी से ज्यादा लोकप्रिय हैं। द्रमुक नेता स्टालिन चुनावी सभाओं में कहते नहीं थकते कि इस इलेक्शन का सुपर हीरो कांग्रेस घोषणापत्र है, वह द्रविड़ विचारधारा को प्रतिबिंबित करता है।


द्रविड़ राजनीति की मनोग्रंथि समझने में और तमिल अस्मिता का कार्ड खेलने में कांग्रेस ने कुशलता दिखाई है। मेडिकल में दाखिले के लिए नीट को खत्म करने का सवाल हो या फेडरल ढांचे का, कांग्रेस द्रविड़ पार्टियों के साथ खड़ी है। अपने भाषणों में भी राहुल स्थानीय मुद्दों का पूरा ख्याल रखते है,वे द्रविड़ राजनीति के जनक पेरियार का जिक्र करते हैं और मोदी के बारे में कहते हैं कि पता नहीं इस आदमी ने तमिल इतिहास के बारे में कुछ पढ़ा है या नहीं।  तमिल अस्मिता से सम्बंधित ज्यादातर मुद्दों पर भाजपा कठघरे में है। अन्नाद्रमुक समेत सारी द्रविड़ पार्टियां नीट के खिलाफ हैं। पर भाजपा नेता पीयूष गोयल ऐलान करते हैं ‘नीट खत्म नहीं कर सकते, इससे प्राइवेट कॉलेज कैपिटेशन फीस मांगेंगे।’ लोग अभी भी जीएसटी और नोटबंदी की बात करते हैं और पुलवामा हमले से ज्यादा कावेरी विवाद में दिलचस्पी रखते हैं। कई दशकों बाद यह पहला ऐसा चुनाव है, जिसमें द्रविड़ राजनीति की दो कद्दावर शख्सियतें, जयललिता और करुणानिधि मौजूद नहीं हैं। आधी सदी से तमिलनाडु पर छाई द्रविड़ राजनीति के लिए इसके अपने निहितार्थ हैं। तमिलनाडु राजनीति चकाचौंध करने वाली भव्यता के लिए मशहूर थी। नेताओं के कद से कई गुना बड़े उनके कटआउट होते थे। उनके पीछे जनता इस तरह दीवानी थी कि एमजी रामचंद्रन के निधन के बाद ३० लोगों ने आत्महत्या की। जयललिता और करुणानिधि जैसे करिश्माई शख्सियतों के न रहने से द्रविड़ राजनीति की चमक फीकी पड़ी है। तमिलनाडु भाजपा के नेता जेजे चंद्रू कहते हैं कि राष्ट्रीय पार्टियों के लिए यह शुभ संकेत है।

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