कर्ज चुकाने के लिए बेटी नरगिस को बनाया हीरोइन:दो बच्चों की मां जद्दनबाई के लिए मोहन बाबू ने जायदाद-करियर दोनों छोड़ दिए

6 महीने पहलेलेखक: ईफत कुरैशी

कोठों पर तवायफों के गाने सुनना मुगलों की शान हुआ करता था, जो ब्रिटिश राज में आम लोगों का शौक भी बन गया। ऐसे ही एक कोठे से भारत को पहली महिला संगीतकार मिलीं। नाम था जद्दन बाई। ये वो ही जद्दन बाई हैं, जिनकी बेटी नरगिस बॉलीवुड की सबसे उम्दा एक्ट्रेसेस में से एक रहीं और नाती संजय दत्त भी सुपर सितारे हैं।

1900 का दौर था। भारत में अंग्रेजों की हुकूमत थी। उन दिनों उत्तर भारत के इलाहबाद (अब प्रयागराज) के एक कोठे पर एक मशहूर तवायफ थीं दलीपाबाई। जद्दन बाई इन्हीं की बेटी थीं। कोठे पर ही परवरिश हुई। गाने की फनकारी खून में ही थी। जद्दन बाई की आवाज में वो कशिश थी कि उनको जो सुनता, सुध-बुध खो देता। कोठे पर ही उनकी आवाज की दीवानगी का ये आलम था कि उनको सुनने आए दो ब्राह्मण परिवार के नौजवानों ने उनसे शादी करने के लिए इस्लाम कबूल कर लिया।

जद्दन बाई ने कुल तीन शादियां की थीं। कोठे पर ठुमरी और गजलें गाने वाली जद्दन बाई तीसरी शादी के बाद बॉम्बे आ गईं, जहां फिल्में बना करती थीं। बनारस के कोठे से बंबई की फिल्मी दुनिया तक का उनका सफर बहुत उतार-चढ़ाव भरा रहा। आजादी से पहले का वो दौर जब लड़कियों का फिल्मों में काम करना तवायफ के पेशे से भी ज्यादा बुरा माना जाता था, तब एक कोठे पर गाने वाली ही भारत की पहली फीमेल म्यूजिक डायरेक्टर बनी।

पढ़िए, आज की अनसुनी दास्तानें में गायिका, लेखिका, डायरेक्टर और एक्ट्रेस जद्दन बाई की कहानी…

शादी के दिन ही मां हो गई थीं विधवा

जद्दन बाई का जन्म 1892 में बनारस में हुआ था। इनकी मां दलीपाबाई थीं, जो इलाहाबाद की सबसे मशहूर तवायफ थीं और पिता थे मियां जान, जिन्हें जद्दन बाई ने महज 5 साल की उम्र में खो दिया।

दरअसल, दलीपाबाई एक बुरे हादसे के बाद कोठे तक पहुंची थीं। उनका बाल विवाह हुआ था, लेकिन शादी के बाद जब बिदाई लेकर बारात लौटी तो पंजाब के गांव के पास बारात पर डाकुओं ने हमला कर दिया। सारा दहेज और सोना लूट लिया गया और दूल्हे को गोली मार दी। भगदड़ मची और दुल्हन बनीं दलीपाबाई भी जान बचाकर भाग निकलीं।

जैसे-तैसे सुसराल पहुंचीं तो उन्हें अभागन कहते हुए विधवा प्रथा के कष्टों से गुजरना पड़ा। रोजाना उन्हें ससुराल में प्रताड़ित किया जाता था। बात इतनी बिगड़ी कि परिवार उन्हें जान से मारने का मन बना चुका था। एक दिन गांव पहुंची मंडली की नजर नदी किनारे गुनगुनाते हुए कपड़े धो रही दलीपा पर पड़ी। उन्होंने दलीपा की आवाज से इंप्रेस होकर साथ जाने का प्रस्ताव दिया। घरवालों से तंग आकर दलीपा भी साहस कर साथ जाने के लिए राजी हो गईं। लेकिन, जैसे ही वो इलाहाबाद पहुंची तो मंडली के लोगों ने उन्हें कोठे पर बेच दिया गया। फिर दलीपाबाई यहां से कभी निकल ना सकीं।

कोठे में काम करने वाले एक व्यक्ति ने दलीपा की शादी सारंगी वादक मियां जान से करवा दी। दलीपाबाई ब्राह्मण परिवार की थीं, लेकिन जब उन्होंने मियां जान से शादी की तो वो भी मुस्लिम हो गईं। शादी के बाद इनके घर जद्दन बाई हुसैन का जन्म हुआ।

कम उम्र में कोठे में ठुमरी गाने लगी थीं जद्दन बाई

कोठे में पली बढ़ीं जद्दन बाई को गायकी और नृत्य का हुनर उनकी मां से मिला था। ये कोठे में जरूर पली बढ़ीं, लेकिन इनके कोठे पर देह व्यापार नहीं होता था बल्कि सिर्फ ठुमरी और गजलें पेश की जाती थीं। बड़ी होती गईं तो मां की लीगेसी को आगे बढ़ाने के लिए खुद कमान संभाल ली और मां से भी ज्यादा पहचान हासिल की। लोग इनकी एक नजर में ऐसे दीवाने हो जाया करते थे कि इनके लिए सब कुछ छोड़ने के लिए भी राजी हो जाते थे।

पहले पति ने इस्लाम कबूला, लेकिन फिर छोड़कर चला गया
इनके कोठे पर पहुंचे गुजराती हिंदी बिजनेसमैन नरोत्तम दास; जिन्हें बच्ची बाबू नाम से पहचाना जाता था, को इनसे ऐसे प्यार हुआ कि उन्होंने इनके लिए इस्लाम कबूल कर शादी कर ली। दोनों का एक बेटा अख्तर हुसैन हुआ। बेटे के जन्म के कुछ सालों बाद ही नरोत्तम जद्दन बाई को छोड़कर चले गए और कभी लौटे ही नहीं।

चंद सालों तक अकेले बेटे की परवरिश कर रहीं जद्दन बाई पर कोठे में ही हारमोनियम बजाने वाले मास्टर उस्ताद इरशाद मीर खान का दिल आ गया। जद्दन बाई ने इनसे दूसरी शादी की जिससे इन्हें दूसरा बेटा अनवर हुसैन हुआ। चंद सालों में ही दोनों अलग हो गए।

अंग्रेजों की छापामारी से परेशान, बनारस छोड़ा कोलकाता गईं
गुलाम भारत में अंग्रेज आए दिन जद्दन बाई के घर छापेमारी करवाया करते थे। अंग्रेजों को शक था कि जद्दन बाई अपने घर में क्रांतिकारियों को जगह देती हैं। अंग्रेजों ने उन पर ऐसा दबाव बनाया कि उन्हें बनारस की दालमंडी का अपना घर छोड़ना पड़ा। वो बनारस छोड़कर कोलकाता आ गईं और यहां एक कोठे पर गाना शुरू किया।

जद्दन बाई के लिए सब कुछ छोड़ बैठे थे मोहन बाबू
लखनऊ के एक रईस परिवार के मोहन बाबू पानी के जहाज से कोलकाता से लंदन डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए रवाना होने वाले थे। जहाज के रवाना होने में देरी हुई तो वो शाम को समय गुजारने के लिए जद्दन बाई के कोठे पर जा पहुंचे। जद्दन बाई को देखते साथ ही मोहन बाबू ने उनसे शादी करने की जिद पकड़ ली।

मोहनबाबू एक अमीर खानदानी परिवार से थे, जबकि जद्दन बाई दो नाकाम शादियां कर चुकीं, दो बच्चों की मां और कोठेवाली थीं। उन्होंने मोहनबाबू को समझाते हुए कहा, जाओ पहले अपने परिवार को जाकर बताओ कि तुम एक मुस्लिम तवायफ से शादी करना चाहते हो। अगर वो राजी हो जाते हैं तो मैं तुम्हारे प्रस्ताव के बारे में सोचूंगी।

जद्दन बाई की बात मानते हुए मोहनबाबू चले गए और चार सालों तक लौटकर नहीं आए। चार सालों बाद मोहनबाबू अपने पूरे परिवार को छोड़कर आ गए और कहा, मैंने अपने परिवार से सारे रिश्ते तोड़ लिए हैं और अब मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं। मोहनबाबू के इस साहसी कदम के आगे जद्दन बाई को हार माननी पड़ी। मोहन बाबू शादी से पहले इस्लाम कबूल कर अब्दुल राशिद बन गए। परिवार से नाता तोड़ने के बाद मोहनबाबू की जिम्मेदारी भी जद्दन बाई ने ही उठाई।

जब गातीं तो राजा-नवाब करते थे सोने-चांदी की बारिश
मशहूर उर्दू राइटर सआदत हसन मंटो ने एक किस्से में जद्दन बाई का जिक्र किया था। जद्दन बाई की महफिलों में राजा और नवाब उनकी गायिकी से खुश होकर उन पर सोने-चांदी के आभूषणों की बारिश कर दिया करते थे। वहीं जद्दन बाई ऐसी खुद्दार महिला थीं कि इसकी परवाह किए बिना हर महफिल के बाद पति मोहन बाबू के सामने हाथ जोड़ कर खड़ी रहती थीं।

जब नवाब की महफिल में बाल-बाल बचीं जद्दन बाई
जद्दन बाई को एक बार एक नवाब की महफिल में बुलाया गया। उनका साथ देने के लिए तबलावादक अहमदजान थिरकवा साहब को बुलाया गया। नवाब साहब संगीत के शौकीन थे, लेकिन सनकी मिजाज के थे। खुश होने पर तोहफे और नाराज होने पर खूब सुनाते थे। महफिल शुरू होने से पहले तबलावादक ने पूछा, बाई आज क्या सुनाओगी। जद्दन ने जवाब दिया, कुछ ऐसा सुनाऊंगी कि नवाब साहब मतवाले हो जाएंगे। थिरकवा साहब ने पूछा, कौन सी बंदिश।

जवाब मिला, पापी नवाब तूने जुल्म किए, नैहर मोरा छुडाए दिए। ये बोल सुनते ही थिरकवा साहब के होश उड़ गए। उन्होंने कहा, क्यों जलील होना चाहती हो बाई। जद्दन ने घबराकर जवाब दिया, माजरा क्या है। थिरकवा ने समझाया, कहीं ये कड़वे बोल नवाब साहब ने अपने ऊपर ले लिए तो लेने के देने पड़ जाएंगे। जद्दन बाई महीनों से इसी बंदिश पर रियाज कर रही थीं और उनके पास कुछ और सुनाने को नहीं था। दोनों ने फैसला किया कि इसी बंदिश के बोल बदलकर पापी नवाब को अच्छे नवाब और जुल्म किया को तोहरी उम्र बढ़ जाए कर दिया जाए। जद्दन बाई ने मौके की नजाकत समझते हुए बोल बदलकर गाए। नतीजा ये हुआ कि नवाब इस बंदिश से खुश हुआ और उन्हें ढेर सारा इनाम देकर लौटाया।

बनारस से कोलकाता, कराची फिर मुंबई आईं

जद्दन बाई ने कुछ सालों में ही कोठे से निकलकर सिंगर बनने के लिए कोलकाता पहुंच गईं। यहां उन्होंने श्रीमंत गणपत राव, उस्ताद मोइनुद्दीन खान, उस्ताद चड्डू खान साहब और उस्ताद लाब खान साहब से संगीत की शिक्षा प्राप्त की। देखते-ही-देखते इनके गानों को देशभर में पसंद किया जाने लगा। ब्रिटिश शासक इन्हें न्योता देकर रामपुर, बीकानेर, ग्वालियर, जम्मू-कश्मीर जैसी अलग-अलग जगहों पर महफिल सजवाया करते थे। रेडियो स्टेशनों के जरिए इनके गाने देशभर तक पहुंचने लगे, वहीं यूनाइटेड किंगडम की म्यूजिक कंपनी ग्रामोफोन इनकी गजलों को रिकॉर्ड करवाकर ले जाया करते थे।

जब पहचान मिलने लगी तो लाहौर की फोटोटोन कंपनी ने इन्हें राजा गोपीचंद (1933) फिल्म में हीरो की मां का रोल ऑफर किया। फिल्म कर ये एक्टिंग की दुनिया में आ गईं। कराची की कंपनी के लिए इन्होंने आगे इंसान या शैतान फिल्म की। प्रेम परीक्षा और सेवा सदन में भी ये नजर आईं। चंद सालों में ही ये परिवार को लेकर लाहौर से बॉम्बे (मुंबई) पहुंच गईं।

बेटा नहीं चला तो बेटी नरगिस को फिल्मों में लाईं

जद्दन बाई को फिल्में बनाने पर नुकसान हो रहा था। इन्होंने जब दूसरे बेटे अनवर हुसैन को फिल्मों में उतारा तो फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हो गई और जद्दन बाई को खूब नुकसान हुआ। जद्दन बाई और मोहनबाबू ने नरगिस का दाखिला मुंबई के इंग्लिश मीडियम एलीट स्कूल में करवाया था, लेकिन जब प्रोडक्शन हाउस को नुकसान होने लगा तो उन्हें स्कूल बदलवाना पड़ा।

मोहन बाबू पहले ही जद्दन बाई से शादी करने के लिए डॉक्टर बनने का सपना छोड़ चुके थे, तो वो बेटी नरगिस को डॉक्टर बनाना चाहते थे, लेकिन जद्दन बाई ने कर्ज अदा करने के लिए नरगिस को फिल्मों में लाना जरूरी समझा।

6 साल की उम्र में पहली बार कैमरे के सामने नरगिस

तलाश-ए-हक में जद्दन बाई ने अभिनय भी किया और म्यूजिक भी कंपोज किया। जद्दन बाई ने इसी फिल्म में 6 साल की नरगिस को बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट जगह दी, जिसमें उन्हें बेबी नरगिस नाम से क्रेडिट मिला। कई फिल्मों में छोटे-मोटे रोल करने के बाद नरगिस को 14 साल की उम्र में तकदीर फिल्म से पहचान मिली। जद्दन बाई का बेटी के लिए लिया गया फैसला सही साबित हुआ।

1940 में बंद हुआ जद्दन बाई का प्रोडक्शन हाउस
1940 आते-आते हिंदी सिनेमा में बड़े स्तर पर फिल्में बनने लगीं और कई प्रोडक्शन हाउस खुलने लगे। नतीजन की जद्दन बाई की प्रोडक्शन कंपनी बंद होने की कगार पर आ गई। कंपनी बंद हो गई और जद्दन बाई ने फिल्मों से दूरी बना ली। जद्दन बाई के बेटे अख्तर हुसैन ने जब फिल्म दरोगाजी बनाई तो जद्दन बाई ने खुद फिल्म के सभी डायलॉग लिखे। 1949 में रिलीज हुई ये इनकी जिंदगी की आखिरी फिल्म थी।

कैंसर ने ली जान, बेटी को स्टार बनते नहीं देख पाईं
8 अप्रैल 1949 में कैंसर से जद्दन बाई का निधन हो गया। तब उनकी उम्र 57 साल के आसपास थी। अफसोस कि वो अपनी बेटी नरगिस को स्टार बनते नहीं देख सकीं। जद्दन बाई को मुंबई के बाबा कब्रिस्तान में दफन किया गया। जद्दन बाई को श्रद्धांजलि देते हुए मुंबई में सभी फिल्मों की शूटिंग रोक दी गई और स्टूडियो एक दिन के लिए बंद कर दिए गए।