सबसे महंगी सिंगर-एक्ट्रेस थीं कानन देवी:रिश्तेदारों ने निकाला तो कभी दूसरे के घर में नहीं रहीं, पतियों को भी अपने घर में रखा

4 महीने पहलेलेखक: ईफत कुरैशी

एक छोटी बच्ची जिसकी मां को रिश्तेदारों ने एक चीनी की प्लेट टूट जाने पर इतना जलील किया कि उसे मां को लेकर रिश्तेदारों का वो घर छोड़ना पड़ा। वहां उनकी औकात नौकरों से ज्यादा नहीं थी। इस बच्ची ने रिश्तेदारों का ये रवैया देखकर ठान लिया था कि अब भूखे मर जाना है, लेकिन किसी के घर में पनाह नहीं लेनी।

7 साल की ये बच्ची फिर ताउम्र अपनी इसी बात पर कायम भी रही, इतनी कायम कि शादी के बाद पति के घर नहीं गईं, उन्हें अपने घर में रखा। हम बात कर रहे हैं सेल्फ रिस्पेक्ट की मिसाल कही जाने वाली कानन देवी की। कानन देवी बंगाली फिल्मों की पहली एक्ट्रेस रहीं। हिंदी फिल्मों में भी इनका बड़ा नाम था। इनकी खूबसूरती के लोग दीवाने थे। उन दिनों ज्यादातर जवान लड़कों के कमरों में इनके पोस्टर पाए जाते थे।

बचपन में संघर्ष, फिर फिल्मों में गजब का स्टारडम। उस दौर में जब फिल्में 15-20 हजार में बन जाती थीं, कानन देवी की एक फिल्म की फीस 5 लाख थी। एक गाना गाने के 1 लाख लेती थीं। एक फैन पर इनका दिल आ गया तो उससे शादी कर ली। उस शादी का ऐसा विरोध हुआ कि लगभग पूरा कोलकाता ही इनके खिलाफ हो गया।

आज की अनसुनी दास्तानें में बात इन्हीं कानन देवी की, जिन्होंने फिल्में छोड़ दीं लेकिन कभी मेकर्स की गलत डिमांड नहीं मानी...

मां- बाप की असल पहचान से अनजान थीं कानन देवी

कानन देवी का जन्म 22 अप्रैल 1916 को पश्चिम बंगाल के हावड़ा के एक गरीब परिवार में हुआ था। ना पिता का नाम पता था, ना मां का। इनकी बायोग्राफी के अनुसार कानन देवी को दंपत्ति रतन चंद्र दास और राजोबाला ने पाला तो वो उन्हें ही अपने माता-पिता समझने लगीं। गोद लेने वाले रतन उन्हें असल बेटी से भी बढ़कर प्यार देते और संगीत से जुड़ी ट्रेनिंग देते। लेकिन, जब कानन देवी मात्र 6 साल की थीं, तब उस पिता की भी मौत हो गई जिसने इन्हें गोद लिया।

जिसने गोद लिया उसका भी हो गया निधन

घर में कमाने वाला कोई नहीं था। जो मां के जेवर थे वो भी रतन का कर्ज चुकाने में बिक गए। अब परिवार भूखमरी की हालत में था। किराए के घर से भी मां-बेटी को निकाल दिया गया, क्योंकि किराया चुकाने के पैसे नहीं थे। रजोबाला 6 साल की बेटी के साथ कोलकाता के अमीर लोगों के घर काम करने जाने लगीं और बेटी भी उनकी छोटे-मोटे कामों में मदद करवाने लगी। पढ़ाई की उम्र में कानन एक नौकरानी बन चुकी थीं।

जिन रिश्तेदारों ने मदद की वो रोज करते थे जलील

मां-बेटी की हालत पर तरस खाकर एक रिश्तेदार उन्हें घर ले आया, लेकिन उन्हें परिवार की तरह रखने के बजाए वो इनसे घंटों काम करवाते और बुरा व्यवहार करते थे। रिश्तेदारों के जुल्म बढ़ने लगे और एक दिन हद पार हो गई। रजोबाला के हाथों एक चीनी की प्लेट टूटते ही रिश्तेदारों ने उन्हें खूब जलील किया। कानन से ये बर्दाश्त नहीं हुआ और वो मां को लेकर निकल पड़ीं। कानन ने रोज जलील होने से बेहतर भूखा मरना समझा। 7 साल की कानन देवी ने फैसला कर लिया कि वो अब किसी के भी घर में नहीं रहेंगी।

7 साल की उम्र में किए गए इस फैसले पर कानन ने ताउम्र अमल किया। दो शादियां कीं, लेकिन उन्होंने पति के घर रहने की बजाय पतियों को अपने घर में रखा। जब कानन स्टार बन गईं तो वही रिश्तेदार उनसे मदद मांगने आए, लेकिन उसूलों की पक्की कानन ने मदद करने से इनकार कर दिया। मां ने समझाया तो कानन ने मदद की, लेकिन कभी उन्हें मां का अपमान करने वालों को माफी नहीं दी।

खैर, कानन देवी के बचपन में वापस लौटते हैं..रिश्तेदारों का घर छोड़ने के बाद कानन और रजोबाला हावड़ा लौट आए। यहां उन्होंने एक वैश्यालय के पास रहना शुरू किया। छोटे मोटे काम कर घर चलाते रहे। समय गुजर रहा था लेकिन हालात नहीं बदले। मां-बेटी की आर्थिक हालात पर तरस खाते हुए एक फैमिली फ्रैंड तुलसी बनर्जी (स्टेज आर्टिस्ट), जिन्हें कानन काका बाबू कहती थीं, ने 10 साल की कानन का मदन थिएटर और ज्योति थिएटर में परिचय करवाया। कानन कम उम्र से ही बेहद खूबसूरत और तेज दिमाग की लड़की थीं।

10 साल की उम्र में फिल्मों में आईं कानन देवी

मदन मूवी स्टूडियो ने खूबसूरती से इंप्रेस होकर इन्हें 5 रुपए महीने की पगार पर जयदेव फिल्म में साइन किया। फिल्म में एक छोटा सा रोल मिला। दरअसल, कानन का कॉन्ट्रैक्ट 25 रुपए का था, लेकिन थिएटर वाले उन्हें सिर्फ 5 रुपए ही देते थे। 1928-31 तक कानन ने चंद फिल्मों में काम किया और इस दौरान उन्होंने म्यूजिक कंपोजर हिरेन बोस, गीतकार धीरेन दास और कवि काजी नाजरुल इस्लाम के साथ कुछ गाने भी रिकॉर्ड किए।

ये वो दौर था जब महिलाओं की फिल्म इंडस्ट्री में काफी कमी थी। फिल्मों में आने वाली ज्यादातर महिलाएं या तो तवायफ थीं या विदेशी। फिल्मों में आने वाली महिलाओं के साथ कभी सम्मानजनक बर्ताव नहीं किया जाता था। कानन देवी जब मजबूरी में फिल्मों में आईं और उन्हें पहचान भी मिली, लेकिन सम्मान नहीं मिला। सुंदर थीं तो कई डायरेक्टर्स उन पर बुरी नजर रखते थे, लेकिन कानन ने कभी आत्मसम्मान से समझौता नहीं किया। कई फिल्में हाथ से निकलीं और कई फिल्मों से निकाली गईं।

पढ़ाई से था खास लगाव

कानन बचपन में आर्थिक तंगी के चलते कभी स्कूल नहीं जा सकीं, लेकिन पैसे आते ही कानन ने अपने लिए पुराण, इंग्लिश, गणित, इतिहास की जानकारी हासिल करने के लिए पर्सनल ट्यूटर रखा था कानन ने शंकराचार्य, रिशिर प्रेम, जोरेबारात, विष्णु माया, प्रहलाद जैसी कई बेहतरीन फिल्मों में अभिनय की गहरी छाप छोड़ी।

विष्णु माया और प्रहलाद फिल्म में कानन देवी ने पुरुष का लीड रोल प्ले किया था। मनमयी गर्ल्स स्कूल से कानन का नाम कानन बाला पड़ा और फिर इन्होंने अपना नाम कानन देवी कर लिया। 21 साल की उम्र में कानन देवी अपनी खूबसूरती और बेहतरीन अदाकारी के लिए मशहूर हो चुकी थीं।

एक गाने के 1 लाख रुपए चार्ज करती थीं कानन देवी

राधा फिल्म कंपनी के साथ काम करते हुए कानन देवी एक सुपरस्टार बन चुकी थीं। ये अपने जमाने की हाईएस्ट पेड एक्ट्रेस थीं। जब फिल्म का बजट 15-5- हजार रुपए और टिकट करीब 30 पैसे हुआ करती थी उस जमाने में कानन एक गाने के 1 लाख रुपए और एक फिल्म की 5 लाख रुपए फीस लेती थीं।

फैशन आइकॉन कानन देवी

फिल्मों में कानन देवी के पहने गए कपड़े, गहने और उनकी हेयर स्टाइल को हर तबके के लोगों द्वारा कॉपी किया जाने लगा था। वो जहां जातीं वहां एक नजर पाने के लिए चाहने वालों की भीड़ लग जाती। इन्हें हाई सिक्योरिटी के साथ ही कहीं आना-जाना होता था।

अपने अभिनय करने में कानन ने कुल 57 फिल्मों में काम किया, वहीं इन्होंने करीब 40 गानों को आवाज दी। ये फिल्म जगत की पहली महिला थीं, जिन्हें पुरुष प्रधान इंडस्ट्री में मैडम कहकर बुलाया जाता था। रुतबा ऐसा था कि कोलकाता के एक फंक्शन में स्टेट गवर्नर भी इन्हें आता देख अपनी सीट छोड़कर खड़े हो गए थे।

हॉलीवुड तक थी इनके गानों की चर्चा

साइलेंट एरा के बाद साउंड फिल्मों में कामयाबी हासिल की और फिर ये स्टार बन गईं। भारत ही नहीं कानन देवी को हॉलीवुड मैग्जीन में भी गिफ्टेड सिंगर कहा जाता था। बेहतरीन गायिकी के कारण कानन देवी को मेगाफोन ग्रामोफोन कंपनी ने बतौर सिंगर हायर कर लिया।

कानन ने भीष्मदेव चटर्जी, अनादि दास्तिदर जैसे दिग्गजों से संगीत की ट्रेनिंग ली। ये न्यू थिएटर्स कंपनी की टॉप सिंगर बनीं, लेकिन उन्होंने 1941 में कंपनी से कॉन्ट्रेक्ट खत्म कर दिया और हिंदी और बंगाली फिल्मों में काम करने लगीं।

केएल सहगल और अशोक कुमार की पहली पसंद थीं कानन देवी

हिंदी सिनेमा में कानन देवी ने यहां के दिग्गज कलाकारों केएल सहगल, पंकज मलिक, प्रथमेश बरुआ, पहाड़ी सान्याल, छबि बिस्वास, अशोक कुमार के साथ भी काम किया। जवाब फिल्म में कानन का गाना दुनिया ये दुनिया, है तूफान मेल इतना हिट रहा कि इसे उन्होंने तीन और फिल्मों हॉस्पिटल, बनफूल, राजलक्ष्मी में भी इस्तेमाल किया।

जब एक फैन को रातभर गोद में सुलाया

1930 में कानन देवी की मुलाकात अशोक मैत्रा से हुई। ये सिटी कॉलेज के प्रिंसिपल और ब्रह्म समाज के लीडर हेराम्बा चंद्र मैत्रा के बेटे थे। दोस्तों के साथ जन्मदिन का जश्न मनाते हुए अशोक ने अपने दोस्तों से कहा कि उनका जन्मदिन तब ही सफल होगा जब कानन देवी उनसे मिलेंगी। अशोक नशे में थे। दोस्तों ने नशे में चूर अशोक को कानन देवी के कपालीतला लेन स्थित घर में उतार दिया।

आधी रात को कानन देवी ने देखा कि सूट-बूट पहना एक नौजवान उनके घर के नीचे बेहोश पड़ा है। जब नीचे पहुंची तो अशोक नशे में जमीन पर लेटे हुए थे। कानन देवी जमीन पर बैठीं और अशोक का सिर अपनी गोद में रख लिया। अशोक नशे में थे, तो उन्हें लगा वो सपना देख रहे हैं और वो सोते रहे। ये दोनों की पहली मुलाकात थी।

कोलकाता की सेक्स सिंबल कानन को बहू बनाने के खिलाफ थे ब्रह्म समाज के लीडर

देखते-ही-देखने दोनों के बीच दोस्ती हुई और फिर प्यार, लेकिन जब शादी का समय आया तो परिवार खिलाफ हो गया। अशोक के पिता ब्रह्म समाज के लीडर थे और कानन देवी कोलकाता की सेक्स सिंबल बन चुकी थीं। कानन का करियर परिवार को दागदार कर सकता था, इस डर से अशोक के घरवाले कानन को अपनाने के लिए तैयार नहीं हुए।

शादी की तो पूरा कोलकाता शहर हुआ खिलाफ

जब अशोक मैत्रा के पिता हेराम्बा का निधन हुआ तो उन्होंने कानन देवी से समाज के खिलाफ जाकर 1940 में शादी कर ली। 25 साल की कानन ने जब 36 साल के अशोक से शादी की, तो हंगामा मच गया। खबरें आते ही पूरे कोलकाता शहर के लोग विरोध करने लगे कि ब्रह्म समाज में एक नाचने-गाने वाली हीरोइन बहू कैसे बन सकती है।

रवींद्रनाथ टैगोर को आए थे धमकी भरे कॉल

जब उन्होंने तोहफे में कानन को अपना साइन की हुई एक तस्वीर भेजी और ये खबर अखबारों में छपी तो लोग उनके भी खिलाफ हो गए। कई लोगों ने रवींद्रनाथ को फोन कर उनकी निंदा की और धमकियां दीं। कई लोगों का ये भी मानना रहा कि एक सेक्स सिंबल महिला के घर महान कवि का ऑटोग्राफ और तस्वीर कैसे हो सकती है। दरअसल कानन देवी ने रवींद्रनाथ टैगोर के लिखे कुछ गानों को आवाज दी थी, जिससे उनका परिचय हुआ था।

समाज के बहिष्कार के बावजूद फिल्मों से नहीं बनाई दूरी

कानन के पास दो विकल्प थे, पहला शादीशुदा जिंदगी बचातीं, दूसरा फिल्मी करियर। लेकिन, अपनी शर्तों पर जीने वाली कानन ने शादी भी की और फिल्मों में काम करना जारी रखा। उस जमाने में ज्यादातर एक्ट्रेसेस शादी के बाद फिल्में छोड़ दिया करती थीं।

जब कानन ने समाज के बहिष्कार के बावजूद फिल्मों में काम किया तो उनके घर के बाहर रोजाना विरोध प्रदर्शन होने लगा। लोग गालियां देते और ब्रह्म परिवार पर भी शादी तोड़ने का दबाव बनाते। कानन जहां जातीं वहां भीड़ उनके खिलाफ नारेबाजी करती थी।

खुद को घर में कैद करने पर मजबूर थीं कानन देवी

जो भीड़ पहले कानन की एक झलक के लिए खड़ी होती थी, वही भीड़ अब विरोधियों में तब्दील हो चुकी थी। रोजाना के विरोध से परेशान होकर कानन देवी ने पहले पब्लिक इवेंट में जाना छोड़ दिया और फिर घर ने निकलना ही बंद कर दिया। खुद को दुनिया की नजरों से छिपाने के लिए कानन अपने ही 11-A, कबीर रोड स्थित घर के बरामदे तक भी नहीं जाती थीं क्योंकि हर दम कुछ लोग विरोध के लिए खड़े होते थे।

पर्सनल सवाल से तंग करते थे फिल्म बिरादरी के लोग

लोगों का बर्ताव कानन को लेकर बदल चुका था। उन्हें हैरेस करने वालों में इंडस्ट्री के लोग भी थे। एक पॉपुलर डायरेक्टर ने कानन देवी से पूछा था कि पति के साथ बिताई हुई उनकी पिछली रात कैसी रही, वहीं एक ने कहा कि उन्हें शादी के बाद तैयार नहीं होना चाहिए और ना बिंदी लगानी चाहिए, क्योंकि इससे वो सुंदर दिखने लगती थीं और लोग आकर्षित होते है।

पति ने साथ छोड़ा तो टूट गईं कानन देवी

ये कानन की जिंदगी का सबसे बुरा समय रहा जब पति अशोक ने भी साथ देने के बजाय विरोध शुरू कर दिया। शहर भर के विरोध से पति पर भी बुरा असर पड़ा। वो भी कानन के फिल्मों में काम करने के खिलाफ हो गए। मीडिया, आम जनता के बाद अब घर में लड़ाई शुरू हुई। 10 साल की उम्र में फिल्मों में काम कर पेट पालने वाली कानन फिल्में छोड़ने के लिए तैयार नहीं थीं।

पति के जुल्मों से तंग आ चुकी थीं कानन

जब भी इंडस्ट्री से जुड़े किसी व्यक्ति का कॉल आता तो कानन के घर में झगड़े शुरू हो जाते। हालात इतने बद्तर हो गए कि पति उनके हाथ से फोन तक छीन लिया करता था। कानन देवी अपने साथ होते इस असॉल्ट से टूट चुकी थीं। जब पति के जुल्म बढ़ने लगे तो कानन ने फिल्में छोड़ने के बजाय 1945 में पति अशोक मैत्रा को ही तलाक दे दिया। हालांकि, सास कुसुम कुमारी मैत्रा से उनके रिश्ते बरकरार रहे। कुसुम कुमारी ने सालों बाद कानन की बाहों में ही दम तोड़ा।

तनाव भरी शादीशुदा जिंदगी जीते हुए कानन देवी की हॉस्पिटल (1943), चंद्रशेखर (1947) जैसी कई फिल्में बुरी तरह फ्लॉप हो गईं। आखिरकार, उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली। तलाक के बाद भी कानन ने अपनी बुक में पति अशोक का आभार जताया, क्योंकि वो उन्हें समाज में सम्मान दिलाने वाले पहले व्यक्ति थे।

1947 में कानन देवी विदेशी फिल्म इंडस्ट्री को करीब से समझने के लिए विदेश चली गईं। वहां उन्हें हॉलीवुड के लीजेंड्री एक्टर क्लार्स गैबल, स्पेंसर ट्रेसी, रॉबर्ट टेलर जैसी कई हस्तियों से रूबरू होने का मौका मिला। वापस आकर कानन ने चंद फिल्में कीं और फिर खुद का प्रोडक्शन हाउस श्रीमती प्रोडक्शन शुरू किया। पुरुष प्रधान फिल्म इंडस्ट्री में कानन देवी तीसरी महिला थीं, जिन्हें फिल्मों सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड मिला, कानन देवी से पहले देविका रानी और रूबी मेयर्स को ये सम्मान मिल चुका था। ये अवॉर्ड उन्हें 1977 में मिला था। इससे पहले 1968 में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया।

कानन देवी की दूसरी शादी

1949 में कानन देवी ने हरिदास भट्टाचार्या से दूसरी शादी की, जो बंगाल सरकार में ADC थे। दोनों की मुलाकात टोलीगंज, कोलकाता के एक स्कूल फंक्शन के दौरान हुई थी। 1949 में ही कानन ने बेटे सिद्धार्थ को जन्म दिया।

शादी के बाद हरिदास ने सरकारी नौकरी छोड़कर कानन का साथ दिया और 1952 से उनके प्रोडक्शन में बनने वाली फिल्में डायरेक्ट करना शुरू कर दीं। हरिदास ने कई हिट फिल्में डायरेक्ट कीं, लेकिन उन्हें हमेशा कानन देवी के पति के रूप में ही पहचाना गया। ये दोनों के झगड़ों का एक कारण बना। झगड़ों की वजह बदलती गईं और आखिरकार 4 अप्रैल 1987 को हरिदास ने कानन का घर छोड़ दिया।

आखिरी बार देखने भी नहीं पहुंचे पति

हरिदास ने कानन से रिश्ता तो खत्म कर लिया, लेकिन तलाक नहीं दिया। जब कानन बीमार रहने लगीं तो हरिदास ने ही उनका इलाज करवाया। कानन की आई सर्जरी में भी हरिदास ने साथ दिया। लंबी बीमारी के बाद 17 जुलाई 1992 में कानन का निधन हो गया, लेकिन हरिदास ने उनके अंतिम संस्कार में आना जरूरी नहीं समझा।

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अभी तक आपने कई फिल्मी सितारों की अनसुनी दास्तानें पढ़ीं। आज हम आपको एक ऐसी नायिका की कहानी सुनाते हैं, जिसके लिए हीरोइन बनना अपनी जिंदगी को जीते-जी नर्क बनाना साबित हुआ। पहली फिल्म के पहले ही शो के बाद लोग उसकी जान लेने पर आमादा हो गए, थिएटर जला दिए गए। उसे अपनी बाकी जिंदगी गुमनामी में गुजारनी पड़ी। इतनी गुमनामी में कि आज गूगल पर भी उसकी सिर्फ एक धुंधली सी तस्वीर है।

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Reference-

https://scroll.in/reel/835319/then-and-now-how-a-40s-movie-star-dealt-with-a-bad-marriage-and-prying-eyes

https://www.thehindu.com/features/friday-review/Our-fair-lady/article14474412.ece

https://www.kanandevi.com/achievements.php

https://bagsbooksandmore.com/2018/04/23/book-review-kanan-devi-the-first-superstar-of-indian-cinema-by-mekhala-sengupta/

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