'भुज' मूवी रिव्यू:अजय देवगन स्टारर 'भुज: प्राइड ऑफ इंडिया' की अतुल्य देशभक्ति की कहानी मेलोड्रामा के ओवरडोज की हुई शिकार

मुंबई2 महीने पहलेलेखक: अमित कर्ण
  • कॉपी लिंक
  • अवधि:- 1 घंटा 53 मिनट
  • स्टार:- 3 स्टार

'भुज: प्राइड ऑफ इंडिया' देशभक्ति की जिस कहानी पर बेस्ड है, वह भारतीय सैनिकों और 300 महिलाओं के अभूतपूर्व साहस और सूझबूझ की मिसाल थी। 1971 की भारत-पाक जंग में तब भुज और कच्छ में उन्होंने भारी गोला-बारूद, असलहे और सैनिकों से लैस पाकिस्तान को 1965 वॉर के बाद दोबारा हराया था। पड़ोसी मुल्क के लोगों को पाकिस्तान से बचा उन्हें दुनिया के नक्शे पर अलग पहचान दिलाई थी। इस जंग में भारत की ओर से एक से एक वीर सैनिक थे। सिर्फ उनके ही सफर में जाया जाए तो कई फिल्में तैयार हो जाएं। वह चाहें भुज एयरबेस के स्क्वैड्रन लीडर विजय कार्णिक हो या कच्छ की वीरांगना सुन्दरबेन। जामनगर एयरबेस पर तैनात फ्लाइट लेफ्टिनेंट विक्रम सिंह हो या फिर सिविलयन से रौ एजेंट बने रणछोड दास पगी। सबकी शख्सियत में शौर्य, त्याग, वचनबद्धता थी।

बेमिसाल कहानी को बेहतरीन फिल्म में तब्दील नहीं कर पाए मेकर्स
यहां डायरेक्टर अभिषेक दुधइय इस बेमिसाल कहानी को बेहतरीन फिल्म में तब्दील करने में रह गए हैं। उनके पास कहने को बहुत कुछ था, वह सब आपस में उलझ कर रह गए हैं। फिल्म के पहले 20 मिनट पाकिस्तानी हमलों को समर्पित है। पाकिस्तानी फाइटर प्लेनों को जिस तरह लेफ्टिनेंट विक्रम सिंह और खुद विजय कार्णिक बचा रहें हैं, वह स्तरीय नहीं लगा है। न स्टोरी टेलिंग के लिहाज से और न विजुअली। उन 20 मिनटों में अलग अलग वीर योद्धाओं की एंट्री भी बम धमाकों की तरह ताबड़तोड़ हो रही है। दर्शक को समझने में जरा मुश्किल हो सकती है कि आखिर किन किन एयरबेसों पर हमले हो रहें हैं या उनसे बचने को जंग लड़ी जा रही है।

फिल्म में रोमांच लाने के लिए जो स्लोगन वाले डॉयलॉग हैं
फिल्म में जो विजुअल और साउंड इफेक्ट्स हैं, वो टुकड़ों में ही दर्शकों को स्क्रीन से सीधे जंग के मैदान पर ले जाने वाले लगते हैं। जंगी जहाजों से दागे जाने वाले मिसाइल रोम रोम पुलकित करने वाले असर नहीं ला पाते। वो सब किसी बेसिक वीडियो गेम के वॉर जोन जैसा असर ही ला पाते हैं। ‘शिवाय’ जैसी विजुअल डिलाइट फिल्म देने वाले अजय देवगन से यहां क्या चूक हुई है, इसका जवाब वो ही दे सकते हैं। फिल्म में रोमांच लाने के लिए जो स्लोगन वाले डॉयलॉग हैं, वो भी बड़े अतिरंजित से लगते हैं।

विजय कार्णिक और विक्रम सिंह को छोड़ दें तो बाकी सारे किरदार लाउड बने हैं
विजय कार्णिक और विक्रम सिंह को छोड़ दें तो बाकी सारे किरदार लाउड बने हैं। नोरा फतेही ने जासूस हीना रहमान में कोशिश अच्छी की है, पर उनका हर अगला कदम बहुत प्रेडिक्टेबल सा हो गया है। विजय कार्णिक की पत्नी उषा कार्णिक के रोल में प्रणिता सुभाष का पूरी फिल्म में एक भी डायलॉग नहीं है। वो पुतले की भांति बस मौजूद हैं। सोनाक्षी ने जरूर सुंदरबेन के रोल में एक हद तक अपना असर छोड़ा है। गुजराती वीरांगना के रोल को उन्होंने जरूरी मजबूती प्रदान की है। विक्रम सिंह की भूमिका में ऐमी विर्क फिल्म की खोज हैं। पगड़ीधारी एक्टर के तौर पर दिलजीत दोसांझ के बाद इंडस्ट्री को उनके रूप में एक और बेहतर कलाकार मिला है। रणछोड़दास पगी के रोल में संजय दत्त असरहीन लगे हैं। ऐसा कुछ हद तक ‘ठग्स ऑफ हिंदोस्तान’ में अमिताभ बच्चन के साथ देखने को मिला था। ‘लक्ष्मी‘ में शरद केलकर इंप्रेसिव थे, पर यहां कर्नल नायर के अवतार में उनके डायलॉग बेदम से हो गए हैं। इंदिरा गांधी की भूमिका में जरूर नवनी परिहार एक ग्रेस लेकर आई हैं।

मेकर्स से बहुत बड़ी चूक पाकिस्तानी सेनाओं के लिए कास्ट किए गए कलाकारों के मोर्चे पर हुई
मेकर्स से बहुत बड़ी चूक पाकिस्तानी सेनाओं और वहां के हुक्मरानों के लिए कास्ट किए गए कलाकारों के मोर्चे पर हो गई है। उन सबकी न तो स्क्रीन प्रेजेंस असरदार है और न ही डायलॉग डिलीवरी। सैनिक पाकिस्तान से है तो उसके हाथों में सिगार होगा ही। वह विमेनाइजर होगा ही। यह सब क्लीशे बहुत बार देखा जा चुका है। यहां उन सबका दोहराव है। मनोज कुमार के पोते वंश गोस्वामी का भी इसमें डेब्यू हुआ है, पर उन्हें अभी और काम करने की जरूरत है। फिल्म के डीओपी ने भी ज्यादातर क्लोज शॉट लिए हैं। वह गुजरे जमाने की वॉर फिल्मों में होता था।

एक कमाल की देशभक्ति की कहानी को बॉलीवुड से ऐसा ट्रिब्यूट स्तरहीन है
अजय देवगन को विजय कार्णिक के रोल में देख ऐसा लगा कि वह अकेले फिल्म की वन मैन आर्मी की भूमिका में हैं। कुछ एक सीन में वो अपने रंग में नजर आते हैं। खासकर जब वो गांववालों को अपनी स्पीच और कविता से देशभक्ति का जज्बा जगाने में सफल होते हैं। बाकी पूरी फिल्म में वो पूरी फिल्म का बोझ अपने कंधों पर लिए इंसान के रूप में नजर आते हैं। हां ट्रक पर फाइटर प्लेन की लैंडिंग वाला सीन प्रभावी है। दिमागी लड़ाइयां ठीक बन पड़ी हैं। ऐसी वॉर फिल्मों में किरदारों और घटनाक्रम को स्थापित करने के लिए वक्त चाहिए होता है, वो भी अतिरिक्त चुस्त एडीटिंग की शिकार हो गई है। एक कमाल की देशभक्ति की कहानी को बॉलीवुड से ऐसा ट्रिब्यूट स्तरहीन है।

खबरें और भी हैं...