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  • CBFC Chairman Prasoon Joshi Said That Efforts Are Needed To Connect Hindi With Employment invention, English Or The Rest Is The Language Of Skill; Hindi Is The Language Of Right

हिंदी दिवस पर खास बातचीत:CBFC के चेयरमैन प्रसून जोशी ने कहा-हिंदी को रोजगार-आविष्‍कार से जोड़ने के लिए भगीरथ प्रयत्‍नों की दरकार, अंग्रेजी या बाकी तो हुनर की भाषा हैं; हिंदी हक की भाषा है

मुंबईएक महीने पहलेलेखक: अमित कर्ण
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  • इस मनोदशा से भी बाहर निकलना होगा कि हिंदी की अंग्रेजी से कोई लड़ाई है
  • भाषा तो मेरी हिंदी है, हुनर मेरी अंग्रेजी है, प्रथम या द्व‍ितीय भाषा का मसला नहीं है

देश भर में आज हिंदी दिवस मनाया जा रहा है। आजादी के बाद देश में हिंदी के उत्थान के लिए 14 सितंबर 1949 को भारत की संविधान सभा द्वारा हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था। इसलिए हर साल देश में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए 14 सिंतबर को हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। हिंदी दिवस के मौके पर सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन के चेयरमैन और राइटर प्रसून जोशी ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत की है। इस दौरान प्रसून जोशी ने हिंदी भाषा के महत्व को समझाया है। पेश हैं प्रसून जोशी से हुई बातचीत के प्रमुख अंश -

  • हिंदी की जो गति है, उस पर आप कभी प्रश्‍नचिन्‍ह नहीं लगा सकते। यह अपने आप में एक स्‍वत: स्‍फूर्त प्रक्रिया है। हिंदी बहता हुआ पानी है। अपने मूल गति से भी मंजिल तक पहुंचने को खुद रास्‍ते ढूंढते हुए पहुंच रही है। इसकी अपनी एक शक्ति है। संचार माध्‍यमों से लेकर मनोरंजन या फिर सांस्‍कृतिक और आध्‍यात्‍म‍िक पक्ष लेकर आम जनमानस में पैठ बनाती रही है। वो जो उसके जन्‍मजात गुण हैं, उनकी मदद से हिंदी का प्रवाह बरकरार रहेगा। अविरल गति से बहती रहेगी।
  • यकीनन इसकी गति तीव्र करने के लिए जो भगीरथ प्रयास होने चाहिए, उनमें कसर तो है। बीज का स्‍वभाव है खुद को खपा दे और वृक्ष में परिवर्तित हो जाए। मगर जो माली का काम होता है सींचने का, वह अधूरा है और कम हुआ है। हिंदी रूपी पौधे को जो पोषण सामाजिक, अकादमिक और औद्योगिक सतर पर मिलना चाहिए, वह कम हुआ है। हिंदी का जो मूल स्‍वरूप है, उसके साथ खिलवाड़ हो रहा है। किसी न किसी तरह से उसका ध्‍यान नहीं रखा जा रहा है। इस तरह के जो खरपतवार हैं, चारों तरफ उन्‍हें भी काटने का काम हिंदी प्रेमियों का है।
  • उस संदर्भ में अखबार, समाचार चैनलों की भी अहम भूमिका है। इनके मंच से ही जो चर्चा हो रही है, उसका प्रचार प्रसार होता रहे, तो हिंदी रफ्तार पकड़ती रहेगी। हिंदी का पौधा तो स्‍वत: स्‍फूर्त है। हम न भी रहें, वह तो वृक्ष की शक्‍ल लेगा ही, मगर जो हमारे या बाकी लोगों के कर्तव्‍य हैं कि इस तरह के प्रयास निरंतर होते रहें।
  • भाषा के व्‍यावहारिक पक्ष पर भी ध्‍यान देने की जरूरत है। वह सिर्फ आनंद की भाषा बनकर नहीं रहनी चाहिए। कोई भी इस बात से इनकार तो नहीं करेगा कि हिंदी बेहद सुंदर भाषा है। उसमें एक प्रवाह है। पढ़ने पर आनंद प्रदान करता है। आध्‍यात्‍म‍िक पक्ष तो इसमें रचा बसा है। यह रीढ़ वाली भाषा है। वीरता झलकती है। सच्‍चे रूप में आप इस भाषा में अपनी बात रखते हैं, तो उसमें रीढ़ नजर आती है। यह एक पारदर्शी भाषा है। जो लिखा गया, वह कहा गया। यह छुपाने वाली भाषा नहीं है। यह प्रत्यक्ष भाष है।
  • अब आते हैं व्‍यावहारिक पक्ष पर। भूमंडलीकरण का दौर रहा है। बाजार की अपनी व्‍यवस्‍था है। उसमें कुछ भाषाओं से वह व्‍यवस्‍था सरल, सहज बनी रहती है। अब अगर जो भी नए आविष्‍कार हो रहें हैं, उसकी चर्चा हमारी भाषा में नहीं होगी, तो वह अव्‍यवहारिक होगा। यह बात भी है कि अपनी भाषा की बाहें और फैलानी होंगी। वह तब होगा, जब हिंदी नए विचारों को समाहित करती रहे। वह शक्ति भी उसमें है। इसमें कोई दो राय नहीं कि हिंदी को किसी भी क्षेत्र में ले जाएं, वह कारगर साबित हो सकती है। स्‍वाभाविक तौर पर उन भगीरथ प्रयासों की जरूरत है, जिनसे यह भाषा रोजगार, आविष्‍कार से जुड़े। दुनिया में जो भी परिवर्तन हो, उन्‍हें यह साथ लेकर चलती रहे। इन सबमें वक्‍त लग सकता है। इसमें एक पूरी पीढ़ी खप सकती है। जोर प्रयासों को गति देने पर होना चाहिए।
  • मुझे कतई नहीं लगता कि आईआईटी, आईआईएम, एम्‍स या फिर और भी जो तकनीकी संस्‍थान हैं या फिर बड़े स्‍कूल हैं, वहां विद्यार्थियों और पेशेवरों को हिंदी से नहीं जोड़ा जा सकता। हिंदी में सिर्फ साहित्‍य ही नहीं, गणित, विज्ञान आदि सब बेहतर तरीके से पढ़ाया जा सकता है। हम एकमत नहीं हो पाते हैं। या सुविधा को अपना लेते हैं। जरूरत इस बात की है कि भगीरथ प्रयत्‍न करने होंगे। उसके लिए मिशन बनाकर काम करना होगा। मुझे पूरा भरोसा है कि हिंदी भाषा में भी वाणिज्‍य, प्रबंधन आदि की बेहतर किताबें आ जाएं। भले इसमें इतना वक्‍त लग जाए, जो तब तक शायद हम आप न रहें। हमारी अगली जनरेशन रहे। हम चाहेंगे कि हमारे सामने हो जाए तो अच्‍छा हो। मैं इस बात से तो सहमत नहीं हूं कि हिंदी में कोई भी विषय पढ़ाया नहीं जा सकता। इस तरफ हमने सोचा नहीं है।
  • भाषा देश की आत्‍मा है। इस मनोदशा से भी बाहर निकलना होगा कि हिंदी की अंग्रेजी से कोई लड़ाई है। मैं खुद एक मल्टीनेशनल कंपनी का चेयरमैन हूं। विदेशों में भाषण देने होते हैं। कई बार पूछा जाता है कि मेरी पहली भाषा क्‍या है। मैं कहता हूं-'हिंदी मेरी भाषा है, हुनर मेरी अंग्रेजी है'। हुनर सीखने में तो कोई दिक्‍कत नहीं है। स्‍कूली स्‍तर पर बच्‍चों को हिंदी से जोड़ने के लिए पहले तो स्‍वाभाविक तौर पर बच्‍चों को पढ़ाया जाए। देश की जो बाकी बोलियां और भगिनी भाषाएं हैं, उनका हाथ थामने की भी जरूरत है। यहां हिंदी बाकी भगिन भाषाओं से मित्रता कर ले और जहां मित्रता होती है, वहां अस्मिता का सवाल नहीं आता है। भाषा की आत्‍मा जीवि‍त रखते हुए मित्रता मुमकिन है। रहा सवाल भाषाई अस्‍मि‍ता का तो वह सवाल भी उठाना जरूरी है। इस सवाल को बेमानी नहीं मानता। जो कुछ भी हमारी भाषा के मूल स्‍वरूप को ठेस पहुंचाए, उन प्रभावों को तो दूर करना होगा। वैसे खरपतवारों से भाषा को बचाकर रखना होगा। यकीनन कुछ प्रभाव आंचलिक भाषाओं के हैं, वो खरपतवार नहीं हैं। वहां हमें हृदय खोलने की आवश्‍यकता है।
  • हिंदी फिल्‍मों के गीत या संवादों में हिंदी भाषा के मूल ढांचे को न नष्‍ट किया जाए। उसकी आत्‍मा को बचाकर चलना होगा। आप को पता लग जाता है, जब उसके साथ खिलवाड़ होता है या उसके साथ प्रेम होता है। विदेशी लोग टूढी फूटी हिंदी बोलते हैं, कोई नाक-भौं नहीं सिकोरते हैं। हमारे लोग उनके साथ प्रेम करते हैं। हमारी आंखें नम हो जाती है। विदेशि‍यों का उस वक्‍त भाषाई प्रेम दिखता है। हिंदी फिल्‍मों में कई बार प्रेम दिखता है। कई बार अज्ञान और कुछेक मौकों पर हिंदी का अनादर दिखता है। वह खरपतवार है। उसे काटकर फेंकने की जरूरत है। यह मुमकिन है कि हमारे पाठकों या दर्शकों के पास अनादर वाले शिल्‍प को बहिष्‍कृत करने का अधिकार है।
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