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डेथ एनिवर्सरी:1930-40 में सालाना 6 से ज्यादा फिल्में करती थीं राजलक्ष्मी, शूटिंग से लौटते हुए कार एक्सीडेंट ने बदल दी जिंदगी

एक महीने पहले

हिंदी सिनेमा में कई अभिनेता आए और गए, लेकिन खलनायकों की गिनती कम ही रही। जब भारत में फिल्में बनना शुरू हुईं तो कोई पहला हीरो बना और कोई डायरेक्टर, लेकिन पहली खलनायिका बनीं राजलक्ष्मी देवी। इन्होंने बंगाली और रीजनल भाषाओं की करीब 200 से ज्यादा फिल्मों में काम कर अभिनय की गहरी छाप छोड़ी। फिल्मों में इनका किरदार नफरत करवा देने वाला होता था, लेकिन टैलेंट ऐसा कि लोगों का खूब प्यार मिला। 1932 की बंगाली फिल्म पाल्ली समाज से शुरू हुआ एक्टिंग करियर साल 1971 में हुए एक खौफनाक एक्सीडेंट तक जारी रहा। लेकिन एक एक्सीडेंट के बाद इनके करियर में विराम लग गया।

आज राजलक्ष्मी देवी के 50वीं पुण्यतिथि के मौके पर आइए जानते हैं कैसे शुरू हुआ इनकी फिल्मी सफर-

राजलक्ष्मी देवी का जन्म 1902 को मेरठ, उत्तर प्रदेश में हुआ। बात इतनी पुरानी है कि जन्म की तारीख भी किसी को याद नहीं है। परवरिश कलकत्ता में हुई तो राजलक्ष्मी ने कलकत्ता को ही अपना होमटाउन मान लिया। बचपन से ही इन्हें डांस और गाने की ट्रेनिंग दी गई, जिसके बाद इन्होंने प्रोफेशनल थिएटर से जुड़कर अभिनय करना शुरू कर दिया।

बंगाली फिल्मों से 1932 में की करियर की शुरुआत

राजलक्ष्मी कई प्ले में हिस्सा लेने लगीं। एक दिन रबींद्रनाथ टैगोर के प्ले गृहप्रबेश में नाटक करते हुए राजलक्ष्मी ने ऑडिटोरियम में मौजूद कई डायरेक्टर्स को इंप्रेस कर दिया। यहीं शिशिर कुमार भादुड़ी ने राजलक्ष्मी को अपकमिंग फिल्म पाल्ली समाज (1932) में काम दे दिया। फिल्म में उनके साथ बिस्वानाथ भादुड़ी और योगेश चौधरी लीड रोल में थे। पहली फिल्म से ही राजलक्ष्मी को स्टारडम हासिल हुआ और उन्होंने 200 से ज्यादा रीजनल फिल्मों में अभिनय की गहरी छाप छोड़ी।

खलनायिका के रोल से मिली पहचान

राजलक्ष्मी ने कामयाबी मिलने के बाद पूरन भगत, मंत्रा शक्ति, भिखारिन, राजगी जैसी बेहतरीन फिल्में कीं। चंद फिल्मों के बाद ही राजलक्ष्मी नेगेटिव रोल में नजर आने लगीं। उन्हें हीरोइन से ज्यादा खलनायिका की भूमिका मिलने लगीं और देखते-ही-देखते राजलक्ष्मी हिंदी सिनेमा की पहली सबसे पॉपुलर खलनायिका बन गईं।

हर साल 6 से ज्यादा फिल्में देने वाली पहली एक्ट्रेस थीं राजलक्ष्मी

1939 तक राजलक्ष्मी बंगाली सिनेमा की कामयाब एक्ट्रेस बन चुकी थीं। इनकी हर साल कम से कम 6 फिल्में रिलीज हुआ करती थीं। ये वो दौर था जब एक फिल्म को बनाने में भी कई साल लगते थे, लेकिन राजलक्ष्मी बैक-टू-बैक फिल्में किया करती थीं।

1932 की बंगाली फिल्म पाल्ली समाज से शुरू हुआ राजलक्ष्मी का करियर 1971 तक जारी रहा, लेकिन एक कार एक्सीडेंट से इनकी जिंदगी में विराम लग गया। जीबन जिग्नासा फिल्म की शूटिंग से देर रात घर लौटते हुए राजलक्ष्मी का बुरी तरह एक्सीडेंट हो गया। कई दिनों तक अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच लड़ाई लड़ने के बाद इनकी हालत में सुधार आया। जैसे ही इलाज पूरा हुआ एक्ट्रेस को एनिमिया हो गया और लगातार इनकी हालत खराब रहने लगी। एक्सीडेंट के ठीक एक साल बाद 26 मई 1972 में राजलक्ष्मी ने दम तोड़ दिया।

राजलक्ष्मी की फिल्म जीबन जिग्नासा उनके एक्सीडेंट के बाद कभी पूरी ही नहीं हो सकी, लेकिन इस हादसे के बाद इनकी दो फिल्में पड़ी पिशिर बर्मी बक्शा और माणिकजोरे साल 1972 में रिलीज हुईं।

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