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न्याय:द जस्टिस:डायरेक्टर दिलीप गुलाटी बोले- यंग लड़का कैसे स्ट्रगल करके स्टार बना और कैसे उसके पर कतर दिए यह थॉट लेकर आया हूं

19 दिन पहलेलेखक: उमेश कुमार उपाध्याय
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सुशांत सिंह राजपूत की मौत से प्रेरित फिल्म 'न्याय-द जस्टिस' को निर्देशक दिलीप गुलाटी बड़े पर्दे पर लेकर कर आ रहे हैं। उनका कहना है कि हम इसमें कुछ गलत नहीं दिखा सकते, क्योंकि फिल्म का नाम ही न्याय-द जस्टिस है। फिल्म के बारे में निर्देशक और फिल्म के लॉयर अशोक सरावगी ने अहम जानकारी दी।

फिल्म की कहानी के बारे में निर्देशक दिलीप गुलाटी बताते हैं- ज्यादा पॉलिटिक्स में न जाकर कैरेक्टर के इमोशंस को प्ले किया है। इसमें काफी अपनी इमेजिनेशन भी हैं। वह टेलीविजन से निकलकर फिल्मों में आया, यहां आने पर लोगों ने उसे कैसे लिया। यंग लड़का कैसे स्ट्रगल करके स्टार बना और यहां लोगों ने उसके पर कैसे कतर दिए, यह थॉट लेकर आया हूं। इस तरह उसे न्याय देने की कोशिश कर रहे हैं। बहरहाल, डेस्टिनी में जो लिखा होता है, होता वही है। फिल्म में एंटरटेनमेंट वैल्यू रखी है। सॉन्ग भी रखे गए हैं, क्योंकि वह गुड डांसर था। उसको ग्लोरीफाई करने की कोशिश की है। वह केरल में बाढ़ पीड़ितों के लिए एक करोड़ की मदद करता है। तब लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि तुम तो बिहार से हो, फिर केरल को क्यों मदद कर रहे हो! उसने अपनी टीम के चार-पांच सदस्यों को घर पर रखा था। फैमिली के साथ उनका प्यार आदि स्टैबलिश करने की कोशिश की है।

आप अच्छी चीजें दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, फिर केस क्यों हुआ?
डायरेक्टर गुलाटी बताते हैं- अभी तक किसी ने फिल्म देखी नहीं है। लोगों के मन में डर रहता है कि उसकी छवि खराब हो जाएगी। पता नहीं क्या होगा। दूसरा, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि उन्हें कुछ करना है। बस, मौका मिलना चाहिए। मुझे पता है कि मुंबई में एक केस हुआ है, जो ऑन बोर्ड है।अगले महीने 15 अप्रैल के आसपास हाईकोर्ट में डेट है।

रोल निभाने के लिए एक्टर्स कैसे तैयार हुए।
दिलीप बताते हैं- हम एक लड़का ढूंढ़ रहे थे, जो उनके साथ काम भी कर चुका है। उसका नाम जुबैर खान है। मुझे ग्लैमरस लड़की का लुक चाहिए था, जिसके लिए श्रेया शुक्ला को साइन किया। नारकोटिक्स के चीफ पंजाबी थे, इसलिए शक्ति कपूर को साइन किया ताकि पंजाबी फ्लेवर मिले। कमिश्नर के लिए महाराष्ट्रियन लुक चाहिए था, इसिलए अनंत जोग को लेकर आया। लेडी सीबीआई थी, जिसके लिए उनकी पर्सनैलिटी के हिसाब से मेरे दिमाग में सुधा चंद्रन थी। ईडी की इन्वेस्टिगेशन बड़ी इम्पोर्टेंट थी, क्योंकि ईडी की इन्वेस्टिगेशन से ही मामला आगे बढ़ा और उसने नारकोटिक्स में मैटर भेजा था। उसमें अमन वर्मा फिट बैठते दिखे थे। मुझे लगा उनको बोर्ड पर लाना चाहिए। पॉजिटिव वकील चाहिए था, उसके लिए किरण कुमार को लेकर आया। फादर के रोल के लिए असरानी को लेकर आया, मुझे लगा कुछ एक्सपेरिमेंट करते हैं। उनसे इमोशनल करवाते हैं।

मिलिंद गुणाजी फिल्म में हीरोइन के एडवोकेट बने हैं। हीरोइन का नाम उर्वशी दिया है। जज के रोल में टफ चाहिए, जिसकी आवाज दमदार हो। उसके लिए रजा मुराद को लेकर आया। महेश भट्‌ट के कैरेक्टर के लिए अरुण बक्शी को पकड़ा, क्योंकि उनके भी बाल वगैरह नहीं हैं न! एक्टर भी अच्छे हैं। फिल्म साइन करने के बाद उसे कैसे प्रॉब्लम हो जाती हैं। तीन-चार प्रोड्यूसर के जो कैरेक्टर थे, उसे एक में ही मिलाते हुए इसके लिए कमाल मलिक को चुना। हमने जब लोगों को रोल सुनाया, तब लोगों को लगा कि यह जेनुइन चीज दिखा रहे हैं। ये सभी अकलमंद लोग हैं और फाइनेंशली स्ट्रगल नहीं कर रहे हैं। हमारी अच्छी स्क्रिप्ट होने की वजह से पेमेंट को लेकर भी निर्माता से कोई तर्क नहीं किया।

फिल्म लगभग पूरी तरह कंप्लीट है। लास्ट सीन होना बाकी है। जिसे जल्द शूट करके खत्म कर देंगे। बाकी चीजों पर काम चल रहा है। लॉयर सरावगी से चर्चा करके एंड अच्छा बनाएंगे, क्योंकि वे लीगली जानकार हैं। फिल्म की पूरी शूटिंग मुंबई में हुई है। 35 दिनों का शेड्यूल था। फिल्म में एक पार्टी सॉन्ग रखा है, जिसमें उसके डांस स्किल को दिखाया है। एक रोमांटिक गाना रखा है। एक टाइटल सॉन्ग है और तेरे जाने से ऐसा हंगामा बरपा सोचा न था कि क्या से क्या हो गया… यह बैकग्राउंड सॉन्ग है। इस तरह कुल चार गाने हैं।

एडवोकेट अशोक सरावगी के साथ न्याय द जस्टिस के राइटर राकेश भारती
एडवोकेट अशोक सरावगी के साथ न्याय द जस्टिस के राइटर राकेश भारती

अशोक सरावगी

आप फिल्म न्याय- द जस्टिस से किस रूप से जुड़े हैं?
मेरी वाइफ सरला सरावगी फिल्म की प्रोड्यूसर हैं और उनके साथ राहुल शर्मा जुड़े हैं। दोनों मिलकर फिल्म बना रहे हैं। स्टोरी आइडिया, सब्जेक्ट का कांसेप्ट मेरा है। उसको कैसे लीगल शब्दों में पिरोया जाए, यह आइडिया मेरा है। क्योंकि मैं सुशांत सिंह राजपूत के केस से भी जुड़ा था, इसलिए मुझे इनहाउस मालूम है। हम फिल्मी ड्रामा नहीं लिख सकते हैं, बाकी बेसिक आइडिया मेरी दिया हुआ है।

केस में किस रूप में जुड़े थे? फिल्म बनाने के लिए अनुमति ली है?

श्रुति मोदी जो सुशांत की एक्स सेक्रेटरी थीं। उनको मैं रीप्रेजेंट करता था। इसके लिए किसी की अनुमति लेने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ये सारी चीजें पब्लिक डोमेनियन है। दूसरी बात, जो इंसान अब दुनिया में नहीं रहा, उसकी पर्सनल लाइफ असेट्स नहीं है।

बतौर लॉयर इसकी कहानी दिए हैं। क्या बता सकते हैं कि फिल्म में क्या-क्या बातें बताई हैं?
जो भी चीजें हैं, सारी पब्लिक डोमेन से ली हुई है और पब्लिक डोमेन की चीजों पर बनाने के लिए किसी की परमिशन लेने की जरूरत नहीं है, जो इंसान अब नहीं रहा, अब उसके पर्सनल लाइफ की कोई असेट्स नहीं है। अगर कोई असेट्स होगा तो भी आप लीगल एडवाइजर के पास जाओ। जैसे अब आप महात्मा गांधी जी पर फिल्म बनाना चाहते हैं तो उनके बारे में जो भी चीजें हैं, वह पब्लिक डोमेन में हैं और उसके लिए आपको उनके पोते से परमिशन लेने की जरूरत नहीं है।
अगर जीवित आदमी हैं और उस पर हम बायोग्राफी बनाते हैं तो डेफिनेटली उसकी परमिशन लेने की जरूरत है। हम तो पब्लिक डोमिनियन पर चल रहे हैं। सारे फैक्ट के बेसिस पर चल रहे हैं और इन्हें कोई झुठला नहीं सकता।

फिर केस किस बात पर हुआ?
केस के कंसलटेंट का कहना है कि हम सुशांत को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं तो इस पिक्चर को रोका जाए। दूसरा उसका कहना है कि अभी भी इन्वेस्टिगेशन चालू है तो हमारी फिल्म से कहीं न कहीं इन्वेस्टिगेशन पर भी फर्क पड़ेगा, इसलिए इसे रोका जाए। अभी एक और केस किसी ने बिहार से भी किया है। अब एक-दो दिन में पता चलेगा कि क्या बात है। मुंबई के केस की बात की जाए तो डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में तो हम जीत गए हैं। उसके बाद हाईकोर्ट में वह गए। हाईकोर्ट ने उन्हें कोई अंतरिम राहत देने से मना कर दिया। अब वहां केस पड़ा है, उसका कोई असर नहीं होगा।

इसमें आपने ड्रग्स एंगल को भी सजेस्ट किया था कि इस पहलू को भी लिए हैं?
हां, सबसे पहले ही मैंने ही डायवर्ट किया था। टीवी पर तीन दिन के इंटरव्यू में मैंने इसकी पूरी पोल खोल दी थी कि इंडस्ट्री में काफी हद तक ड्रग्स आता है और सुशांत के मामले में ड्रग एंगल बहुत इम्पॉर्टेंट है। इसके बाद ही ड्रग्स फॉर इन्वेस्टिगेशन चालू हुई। सबकी पकड़ा-पकड़ी चालू हुई, तब तक न ही ईडी के पास कोई मैटेरियल आया न ही सीबीआई के पास कोई मैटेरियल आया।

यह बताने से काफी लोग नाराज भी होंगे!
हम कहीं भी उन्हें ड्रगिस्ट नहीं बता रहे हैं। हां, यह जरूर बता रहे हैं कि उन्हें कहीं न कहीं थोड़े ड्रग्स की आदत हो गई थी और किसी की वजह से हुई थी। किसी ने करने की कोशिश की थी। हम कहीं भी उनके कैरेक्टर को गलत नहीं बता रहे। हम तो यह चाहते हैं, जो आज दुनिया सुशांत के नाम को भूल गई है, कुछ चैनल वाले छाती ठोक कर कहते थे कि मैं शपथ खाता हूं कि मैं यह करता हूं, मैं वह करता हूं, पर अचानक से वह बिल्कुल डायवर्ट हो गए और आज आप पूछने जाएं तो सुशांत का वह नाम भी नहीं लेंगे। हम इसे जिंदा रखना चाहते हैं ताकि इसका प्रॉपर आगे इन्वेस्टिगेशन हो और वास्तव में जो भी दोषी हो, उसे सजा मिले।
हां, कुछ हद तक सेलिब्रिटीज के ड्रग्स एंगल पर गए हैं, पर एक्जेक्टली नहीं बता सकता। पॉलिटिकल एंगल को हमने ज्यादा नहीं खींचा है, पर पुलिस की भूमिका पर जरूर उंगली उठाई है। यह पूरी सुशांत की लाइफ पर बेस्ड है। वह कैसे मुंबई आया कैसे स्ट्रगल किया और जब स्टार बनने का उसका मौका आया तो कैसा उसका लेग पुलिंग हुआ है। यह पूरा हमने कवर किया है। केस अभी इन्वेस्टिगेशन में चल रहा है तो हमने क्लाइमैक्स में क्या दिखाया है। यही सस्पेंस है। हमने सब्जेक्ट उठाया है कि सुसाइड या मर्डर और इसीलिए हमने टाइटल दिया है, न्याय- द जस्टिस।

आप गहराई से जुड़े हैं। फिर आपके अनुसार सच क्या है?
फिल्म इंडस्ट्री का ऐसा है कि कई लोग इसके लिए खिंचे चले आते हैं। यहां आकर आपको खुद को मेनटेन भी करना होता है। इंडस्ट्री ऐसी है कि यहां रात-रात पार्टियां होती हैं। उनमें खर्चे भी होते हैं तो जो जूनियर आते हैं, वह किसी न किसी तरह सीनियर से जुड़ जाते हैं। आप आज भी मुंबई के ओशिवारा इलाके में जाओगे तो इतना होने के बावजूद भी आज वहां यह सब चालू है।

अच्छा, किरदार के चुनाव में आपका कितना हाथ रहा?
सुशांत के किरदार के लिए जो ऑडिशंस हुए, उन्हें लेकर राहुल और मिसेज सरावगी मुझसे कंसल्ट करते थे। किस का फेस मिलता है, नहीं मिलता है, यह एक्टर के हिसाब से कैसा है, यह सब चीजें को लेकर मुझसे कंसल्ट किया गया और कई चीजों में मेरी बात भी मानी है। खैर, फिल्म का सबसे बड़ा मुद्दा जो लेकर चल रहा हूं, वह यह कि इंडस्ट्री में क्या हो रहा है, मुझे यह लोगों को बताना है। दूसरा, यह बंदा इस टॉप लेवल पर पहुंचा और शायद से बहुत आगे जाता। ऐसे कैसे डिमोरलाइज करके रास्ते से हटा दिया गया, इन सब चीजों को काफी बाहर लाना चाहता हूं।

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