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  • Father Salim Khan Said On Salman's 'Radhe' This Is Not A Great Film, But Commercial Films Have Accountability, So That Everyone Can Get Money

इंटरव्यू:सलमान की 'राधे' पर पिता सलीम खान बोले- यह ग्रेट फिल्‍म नहीं है, मगर कमर्शियल फिल्‍मों की जवाबदेही होती है कि सबको पैसा मिल सके

2 महीने पहलेलेखक: अमित कर्ण
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ईद पर रिलीज के बाद से सलमान की 'राधे: योर मोस्‍ट वॉन्‍टेड भाई' समीक्षकों के निशाने पर है। सोशल मीडिया पर भी फिल्म के उपर ढेर सारे मीम्‍स बने हैं। सलमान जैसे कद के एक्टर ऐसी फिल्‍में क्‍यों करते हैं, इस मसले पर उनके पिता और स्‍टार राइटर सलीम खान ने दैनिक भास्‍कर ने खास बातचीत की। पेश हैं प्रमुख अंश:-

Q-समीक्षक 'राधे..' जैसी फिल्‍मों में सलमान की पिछली फिल्‍मों का दोहराव महसूस कर रहे हैं। इस फिल्‍म में क्रिएटिव मेहनत और नयापन कम नजर आ रहा है। आप क्‍या कहना चाहेंगे?
A-इससे पहले जो फिल्‍म थी, 'दबंग 3' वह डिफरेंट थी। 'बजरंगी भाईजान' अच्‍छी थी और बिल्‍कुल अलग थी। 'राधे' कतई ग्रेट फिल्‍म नहीं है, पर कमर्शियल सिनेमा की एक जिम्‍मेदारी होती है कि हर इंसान को पैसे मिल सकें। आर्टिस्‍ट से लेकर प्रोड्यूसर, डिस्‍ट्रीब्यूटर, एग्‍जीबिटर और हर स्‍टेकहोल्‍डर को पैसे मिलने चाहिए। जो सिनेमा खरीदता है, उसे तो हर हाल में पैसे मिलने चाहिए। इसके चलते ही सिनेमा निर्माण और व्‍यवसाय का चक्र चलता रहता है। इस बेसिस पर तो सलमान ने परफॉर्म किया है। इस फिल्‍म के स्‍टेकहोल्‍डर फायदे में हैं। बाकी 'राधे' वैसी ग्रेट फिल्‍म तो नहीं है।

Q-'टाईगर' सीरिज आपको कैसी लगती है?
A-जो भी मिशन वाली फिल्‍में हैं, उनमें एक्‍शन तो अच्‍छा होता है। उस फिल्म में ट्व‍िस्‍ट एंड टर्न्‍स थे। मेरी ही फिल्म 'डॉन' जैसे उसमें ट्व‍िस्‍ट एंड टर्न्‍स थे। मेरे ख्‍याल से फिल्‍मों का मकसद तो यही होना चाहिए कि वह आप को ढाई घंटे बांधकर रखे। आप को हम ऊबासी न लेने दें तो वो फिल्‍में सही हैं। बाकी सिनेमा से ये उम्‍मीद न रखी जाए कि उससे कोई क्रांति आएगी। हमने ही जैसे 'डॉन' जैसी फिल्‍में की थीं, तो वो ग्रेट नहीं थीं, मगर वो इंटरेस्टिंग थीं।

Q-कभी आप का दिल किया हो, या सलमान ने भी कहा कि आप उनके लिए कुछ लिखें?
A-कुछ आयडियाज तो हैं, उन पर दिमाग भी जाता है। थोड़ा सा काम भी बढ़ जाता है। मगर हकीकत यह है कि क्‍या होगा, अगर मैं सलमान के साथ कुछ लिखूं तो। यह है कि अच्‍छी फिल्‍म बनाने के लिए बहुत से सैक्रिफाइस करने पड़ते हैं। अब सलमान जैसे स्‍टार की फिल्‍मों में यह होता है कि यह डाल दो, वह मिला दो, यह सब सुनने को मिलता रहता है। ऐसे में बहुत मुश्किल हो जाती है। हमारी जो फिल्‍में बनी हैं जैसे 'शोले', 'दीवार', 'जंजीर', 'त्रिशूल', 'शक्ति' हैं, उनमें राइटर्स को क्रिएटिव सैटिसफैक्शन मिलती रही हैं। ये सब बहुत अच्‍छी फिल्‍में हैं।

Q-सलमान की फिल्‍मों का बजट ऊंचा होता है तो क्‍यों नहीं राइटर्स पर खर्च कर उनसे फिल्‍में लिखवाई जाएं?
A-फिल्‍म इंडस्‍ट्री का बहुत बड़ा प्रॉब्‍लम है कि यहां अच्छे राइटर हैं हीं नहीं। उसकी वजह यह है कि राइटर्स हिंदी या उर्दू जुबान के साहित्‍य पढ़ते ही नहीं हैं। कुछ भी बाहर का देखा और उसे इंडियनाइज करने में जुट जाते हैं। फिल्म 'जंजीर' इंडियन सिनेमा का गेम चेंजर थी। उस फिल्म ने इंडियन सिनेमा की सही राह पर वापसी कर दी थी। मगर उसके बाद से इंडस्‍ट्री को सलीम-जावेद का रिप्‍लेसमेंट ही अब तक नहीं मिला। ऐसे में सलमान भी क्‍या करे?

Q-कई जानकार, ट्रेड एनैलिस्‍ट कहते हैं कि अब सलमान का करियर ओवर चुका है, क्‍या कहना चाहेंगे आप?
A-वो वैसा हर बार सलमान की फिल्‍म के उम्‍मीद से जरा कम परफॉर्म करने के बाद कहते रहे हैं। हकीकत यह है कि जैसे ही सलमान की कोई हिट फिल्‍म आई नहीं कि बस वापस चारों तरफ सलमान ही सलमान कहे जाने लगते हैं।

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