इंटरव्यू:एक्टर सिद्धांत कर्णिक ने कहा-कास्टिंग डायरेक्टर के जरिए ऑडिशन देकर इंटरनेशनल प्रोजेक्ट मिला

मुंबई3 महीने पहलेलेखक: उमेश कुमार उपाध्याय
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लफंगे परिंदे, लिसन अमाया, थप्पड़ आदि फिल्मों में काम कर चुके सिद्धांत कर्णिक अब इंटरनेशनल फिल्म में भी कदम रख चुके हैं। उनकी आगामी फिल्म 'एंड टुमॉरो वी विल बी डेड' है। यह सच्ची घटना पर आधारित तालिबान द्वारा बंधक बनाए गए एक कपल की कहानी है। इसकी शूटिंग स्पेन, उदयपुर आदि जगहों पर हुई है। सिद्धांत ने इसमें तालिबानी कमांडर नजरजान का कैरेक्टर प्ले किया है। उन्होंने भास्कर से खास बातचीत की।

सुना है कि इन दिनों आप काफी व्यस्त हैं। व्यस्तता के बारे में बताइए?
जब काम आता है, तब छप्पर फाड़कर आता है। लॉकडाउन ओपन के बाद जिंदगी ने तेज रफ्तार पकड़ी है। एकाएक काम की बाढ़-सी आ गई है। सबको डेट चाहिए, सो डेट शेड्यूल हैंडिल करने को लेकर कंप्लीकेटेड महसूस कर रहा हूं। अभी 'पॉटलक' नामक वेब सीरीज रिलीज हुई। इसके प्रोमोशन में बिजी रहा। इसके साथ एक बड़ी फिल्म और एक सीरीज की शूटिंग में व्यस्त हूं।
23 सितंबर को मेरी फिल्म 'एंड टुमॉरो वी विल बी डेड' ज्यूरिक फिल्म फेस्टिवल को ओपन करने वाली है। फेस्टिवल में स्विटजरलैंड के प्रेसिडेंट और ज्यूरिक के मेयर हमारे साथ पिक्चर देखेंगे। 21 सितंबर को वहां जा रहा हूं। इस समय ड्रीम लाइफ का फील महसूस कर रहा हूं। मुझे इस खबर पर यकीन नहीं हो रहा है।

यह इंटरनेशनल फिल्म का प्रोजेक्ट आपको कैसे मिला? कैरेक्टर में ढलने के लिए किसने मदद की?
इसके मशहूर कास्टिंग डायरेक्टर नंदिनी श्रीकांत और करण मल्ली के जरिए ऑडिशन देने के मौका मिला। जब मैं शॉर्ट लिस्टेड हुआ, तब फिल्म के डायरेक्टर खुद इंडिया आकर मेरा ऑडिशन लिया। इस तरह ऑडिशन देने के बाद यह फिल्म मिली। कैरेक्टर में ढलने के लिए मेरे पिताजी ने काफी मदद की। दरअसल, वे फौज में थे और ब्रिग्रेडियर पद पर से रिटायर हुए थे। उन्होंने बताया कि खासकर फिल्मों में तालिबानी को टेररिस्ट के तौर पर पेश किया है, यही हमारा नजरिया बन गया है।
पिताजी ने बताया था कि एक आदमी जो दूसरे देश के लिए आतंकवादी हो सकता है, वही अपने देश के लिए स्वतंत्रता सेनानी कहलाता है। बस, नजरिए का फर्क है। उन्होंने यह बात कुछ ऐसे समझायी कि कैरेक्टर के बारे में अच्छी तरह से समझ पाया। मैंने अफगानिस्तान और तालिबान के बारे में काफी रिसर्च किया, डॉक्टूमेंट्री फिल्में देखी। थोड़ा-बहुत पश्तो सीखी। इस तरह से कैरेक्टर में ढलने की तैयारी की।

फिल्म की स्टोरी क्या है, अपने किरदार के बारे में भी बताइए?
देखिए, यह फिल्म ट्रू लाइफ स्टोरी पर बेस्ड है। डेविड और डेनिला की कहानी है। दोनों साल 2011 में स्विटजरलैंड से मलेशिया की तरफ एक रोड ट्रिप पर निकले थे। साल 2012 में आते समय वे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बलूचिस्तान क्रॉस कर रहे थे। उसी दौरान ओसामा बिन लादेन मारे गए थे। वहां के लोगों ने इन गोरों को देखा, तब उन्हें लगा कि यह अमेरिकन हैं, तब उन्हें किडनैप कर लिया।
लेकिन जब पता चला कि ये स्विस हैं, तब वहां के दूतावास के साथ नेगोशिएट करने लगे। इस तरह डेविड और डेनिला वहां पर 290 दिन गुजारने के बाद फाइनली स्विटजरलैंड वापस आते हैं। मजेदार बात यह है कि वह वापस यूरोप आते हैं, तब उनके साथ क्या हादसा होता है, यह देखने लायक है। मेरे किरदार का नाम नजरजान है, जो रियल लाइफ कैरेक्टर है। नजरजान तालिबान कमांडर थे, जो नेगोशिएशन के इंचार्ज बने।

अच्छा, नजरजान के गेटअप में आने के लिए कितना समय लगता था?
पूरे गेटअप में आने के लिए डेढ़ घंटा लगता था। सबसे ज्यादा दाढ़ी लगाने में समय जाता था। अपनी इंडस्ट्री के बारे में बुरा नहीं कहना चाहूंगा, लेकिन स्विस इंडस्ट्री के बारे में कहूंगा कि कैरेक्टर के इतने ज्यादा डिटेलिंग में जाते हुए अब तक नहीं देखा। गेटअप में आने के लिए डेढ़ घंटा समय लगता था, लेकिन कॉस्टयूम डिजाइनर, मेकअप मैन आदि अपने-अपने टाइम पर आकर काम करते थे।

इंटरनेशनल फिल्म में काम करने का अनुभव किस तरह अलग रहा?
वहां के फिल्ममेकर कैरेक्टर की डीप डिटेलिंग में जाते हैं। छोटे-बड़े हर कैरेक्टर पर पहले से काफी तैयारी करके रखते हैं। समय को लेकर बड़े पाबंद होते हैं। ऐसा समझिए कि एक बार अपने सिनेमैटोग्राफर के साथ लंच कर रहा था। उनके चीफ एडी (असिस्टेंट डायरेक्टर) एक फाइल लेकर आए। उस फाइल में सारा डाइग्राम था। एक छोटे-से सीन के सीक्वेंस में हम गाड़ी में बैठकर एक जगह से दूसरे स्थान पर जा रहे हैं।
मैंने उस सीन के बारे में गौर से पढ़ा तो पाया कि उसमें ऑलरेडी लिखा था कि गाड़ी में कौन-सा कैरेक्टर कहां बैठा है, कौन-सा कैमरा एंगल होगा, रोड की दिशा क्या होगी, उस दिन यह सीन किस समय पर शूट होगा, यह सब चार महीने पहले की डेट में लिखा गया था। वह इतनी तैयारी के साथ काम करते हैं। हम कई बार समय से पहले शूट कर लेते थे, पर कभी समय से आगे नहीं गए। वहां स्विस के सिर्फ 15 एचओडी थे बाकी सारे इंडियन थे। लेकिन स्विस को देखकर हम उनके जैसे बन गए थे। मतलब जो टाइम कॉल शीट पर लिखा होता था, उसे उसी टाइम पर खत्म भी करते थे। हां, जिस तरह से हम इंडियन कोई काम जुगाड़ से कर लेते हैं, वे नहीं कर पाते हैं।

अच्छा, आपको बाइक राइडिंग का भी शौक है। उसके बारे में कुछ बताइए?
यह शौक नहीं, पागलपन है। यह मेरे लिए स्प्रिचुअलिटी है। 20 वर्षों से मोटर साइकिल चला रहा हूं। कार की बात छोड़ दूं तो अब तक सिर्फ बाइक से 1 लाख 85 हजार किलोमीटर चल चुका हूं। सबसे लंबा सफर साल 2019 में रहा। इंडिया टूर पर गया था, तब 36 दिनों में 9820 किलोमीटर मोटर साइकिल चलाई थी। मुंबई, देहरादून, रुद्र प्रयाग, ओली, आसाम, तमिलनाडु, सत्य मंगलम, महाराष्ट्र आदि जगहों का सफर किया।
मैं स्वच्छ भारत अभियान के असर को देखने के मकसद से निकला था। हर बार कोई न कोई जिम्मेदारी के साथ निकलता हूं। मुझे पहाड़ों से बड़ा लगाव है। हिमालय, लद्दाख आदि जगहों पर जा चुका हूं। अभी स्विटजरलैंड जा रहा हूं, सो कोशिश होगी कि वहां बाइक लेकर पहाड़ देखने जाऊं। शूटिंग से समय मिलेगा, तब अक्टूबर में अरुणाचल प्रदेश जाने का प्लान बना रहा हूं।

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