यादों में इरफान खान:कभी एक्टर-एक्ट्रेसेज को देखने की चाह में पहाड़ चढ़े, कभी मगरमच्छ बन कर सो गए;  इरफान के 4 दोस्तों ने शेयर किए दिलचस्प किस्से

6 महीने पहलेलेखक: राजेश गाबा
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जयपुर में खेत पर बातें करते इरफान खान और उनके दोस्त हैदर अली जैदी। - Dainik Bhaskar
जयपुर में खेत पर बातें करते इरफान खान और उनके दोस्त हैदर अली जैदी।

'जमाना बड़े शौक से सुन रहा था, हमीं सो गए दास्तां कहते-कहते।' साकिब लखनवी का यह शेर अभिनेता इरफान खान की जिंदगी पर बिल्कुल फिट बैठता है। जयपुर की गलियों से नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का सफर। फिर वहां से मायानगरी मुंबई में संघर्ष का दौर। टीवी सीरियल के बाद बड़े पर्दे पर अभिनय से बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक में पहचान बनाई। उन्होंने कामयाबी की बुलंदियों को छुआ और जब उन्हें सेलिब्रेट करने का वक्त आया तो न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर से जंग लड़ते हुए रंगमंच से पर्दा गिरा गए। इरफान की पहली पुण्यतिथि पर उनके चार दोस्तों ने उनसे जुड़े रोचक किस्से साझा किए...

'टीवी स्टेशन में एक्टर-एक्ट्रेस मिलेंगे ऐसा सोचकर पहाड़ चढ़ गए'

इरफान के करीबी दोस्त डीआईजी इंटेलिजेंस, जयपुर हैदर अली जैदी ने बताया, 'जब से होश संभाला, तब से इरफान को जानता था। उसका और मेरा बचपन साथ गुजरा था। सुभाष चौक में हम पड़ोसी थे। वह सेंट पॉल स्कूल में पढ़ता था और मैं सेंट जेवियर्स में। हम दोनों स्कूल तो साथ नहीं जाते थे, मगर स्कूल के बाद पूरे वक्त साथ ही रहते थे।

राजस्थान कॉलेज में साथ-साथ पढ़ते थे। मैं इकोनॉमिक्स में था और वो उर्दू डिपार्टमेंट में। उर्दू डिपार्टमेंट में मेरे फादर हेड ऑफ डिपार्टमेंट थे। फिर उसको थिएटर का शौक लगा। हमारे कॉमन फ्रेंड अनूप चतुर्वेदी के साथ वह थिएटर करने लगा। फिर दिल्ली एनएसडी चला गया और वहां से मुंबई की राह पकड़ ली। जब उसका नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, दिल्ली के लिए सिलेक्शन हुआ तो वह रात 2 बजे आया। मुझे जगाया। सुबह 5 बजे बस से जा रहा हूं। तेरे से मिलने का दिल हो रहा था। जयपुर मुझे छोड़ रहा है, मैं जा रहा हूं। उसको लग रहा था कि जगह छूट रही है।

जयपुर में पतंग उड़ाते हुए इरफान खान और उनके दोस्त हैदर अली जैदी।
जयपुर में पतंग उड़ाते हुए इरफान खान और उनके दोस्त हैदर अली जैदी।

वह बहुत ही इंटेस पर्सन था। जब भी जयपुर आता, तब हम साथ में पतंग उड़ाते थे। वह पतंगबाजी का शौकीन था और लूटने का भी। एक बार पतंगबाजी में गिर गया तो दाहिना हाथ फ्रैक्चर हो गया था। इसी हाथ से तेज बॉलिंग करने लगा। कोई भी उसकी बॉल पर आउट हो जाता था। उसकी हड्‌डी टेढ़ी हो गई थी। रात को पान खाना और सुनसान सड़क पर घूमना हमारी आदत में शुमार था। वह कैप पहन लेता था, ताकि कोई पहचान न ले। अभी जब आया था, तब हम पुष्कर गए थे। वहां जमीन देखी थी, उसका मन वहां एक बड़ा फार्महाउस बनाने का था।

जब हम स्कूल में थे तो पता चला कि नाहरगढ़ में टीवी स्टेशन है, जहां से टेलिकॉस्ट होता है। इरफान ने सोचा कि वहां एक्टर-एक्ट्रेस होंगे। हम पहाड़ पर चढ़कर चुपके से वहां पहुंचे, लेकिन वहां कोई नहीं मिला। उसे बचपन से ही हीरो-हीरोइन का क्रेज था। उसको अम्मी से खूब अटैचमेंट था। मदर डॉमिनेटिंग लेडी थीं। कहती थीं- हैदर मियां इरफान को समझाओ कहां जा रहा है। इससे बोलो यहीं रहे एक्टिंग वैक्टिंग का भूत छोड़े।

उसके घर के बाहर एक धोबी रहता था। एक रात 9 बजे हम आ रहे थे और शराब के नशे में धुत धोबी नाली में गिरा हुआ था। उसके हाथ में घड़ी थी, जो अटकी हुई थी। इरफान ने देखा तो बोला कि इसकी घड़ी गिर जाएगी, उतार लेता हूं। कल दे दूंगा नहीं तो खराब हो जाएगी। इरफान ने बहुत कोशिश की, लेकिन धोबी ने घड़ी नहीं उतारने दी। उल्टा खूब गालियां बकीं। बाद में इस बात पर हम खूब हंसे थे।

इरफान के फादर के पास पुरानी विली स्टाइल की जीप थी। उसके फादर की टायर रिट्रेडिंग की शॉप थी। हम बहुत छोटे थे। उसके फादर हम सबको आमेर का किला घुमाने ले जाते थे। उसके फादर जीप को थोड़ा सा डीजल ऊपर डालकर चलाते थे। लेकिन कैरोसीन से मोडीफाई कर रखा था। वे मैकेनिक कम इंजीनियर थे। इरफान कहता था कि देख, अब्बू जीप को बेवकूफ बना रहे हैं और क्या-क्या कहूं उसके बारे में। वह अपने पापा के बेहद क्लोज था। उन्हें अब्बू जी कहता था। उसके फादर की डेथ के बाद उसका दिल उचट गया था।

जयपुर में इरफान खान दोस्त डीआईजी इंटेलिजेंस हैदर अली जैदी और उनके बेटे अली के साथ।
जयपुर में इरफान खान दोस्त डीआईजी इंटेलिजेंस हैदर अली जैदी और उनके बेटे अली के साथ।

जब मैं उसकी फिल्म ‘मकबूल’ नहीं देख पाया था तो तब तक फोन करता रहा जब तक कि हमने फिल्म नहीं देख ली। फिर फोन लगाकर पूछता रहा कि परिवार के साथ फिल्म देखी तो कैसा लगा। भाभी राना को फिल्म कैसी लगी और मेरा काम कैसा लगा? मेरे बेटे ने एमीबीबीएस किया है तो उससे भी बात करता था और पूछता था कि अली साहब बताओ कैसे हो? वह अपनी बात नहीं करता था, दूसरों की सुनता था और तारीफ करता था।

जब 2018 में बीमारी का इलाज लंदन में करा रहा था, तब मैं उससे मिलने गया था। देखते ही गले लगा लिया और बोला-देख तू मुंबई नहीं आता था, आज तुझे लंदन बुला लिया। उसने हॉस्पिटल के पास फ्लैट ले रखा था। वहां वो टेनिस खेलता था, साइकिलिंग भी करता था। उसने खाना बनाया और बर्तन भी खुद साफ किए। उसे देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वह इतनी बड़ी बीमारी से लड़ रहा था। वह फाइटर था।

तू बंगाली है, सुतपा से मेरी बात कर दे : आलोक चटर्जी

इरफान खान के साथ नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में 1984-87 तक करीबी दोस्त रहे आलोक चटर्जी ने बताया, 'हम लोग नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में 1984 से 87 तक साथ में पढ़े। हमने 3 साल हर नाटक में लीड रोल किया। इरफान एक्टिंग को लेकर काफी सीरियस थे। शुरू से ही वे गंभीर और संजीदा अभिनेता थे। कम बोलते थे, दोस्तों में लोकप्रिय थे और हंसाने में माहिर।

एनएसडी में इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा था- 'एफटीआईआई (फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया) में अभी एक्टिंग का कोर्स नहीं है, इसलिए मैं एनएसडी आया हूं। क्योंकि मुझे सिनेमा का एक्टर बनना है। सिनेमा का भी ऐसा एक्टर बनना चाहता हूं, जिसकी एक्टिंग देखकर डायरेक्टर खुद पास आएं।' ये उनका सपना था और जिंदगी में उन्होंने अपने सामने इस मुकाम को हासिल भी किया।

इरफान नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के बैचमेट रंगनिर्देशक आलोक चटर्जी के साथ।
इरफान नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के बैचमेट रंगनिर्देशक आलोक चटर्जी के साथ।

बात तब की है, जब हम लोग एनएसडी में अपने सिलेक्शन की लिस्ट देख रहे थे। इरफान पीछे खड़े थे। मैंने पूछा तुम किस डॉरमेट्री में हो? उन्होंने कहा- 'मैं 5 नंबर डॉरमेट्री में हूं।' उन्होंने मुझसे पूछा- 'क्या तुम मुस्लिम हो?' सामने से मैने पूछा- 'तुम बंगाली हो?' वह बोले- 'नहीं, मैं मुस्लिम हूं।' मैंने कहा- 'मैं बंगाली हूं।' ये हमारा एनएसडी में पहला इंटरैक्शन था। एनएसडी में तीन साल तो हम साथ रहे । उसके बाद भी संपर्क बना रहा।

2005 में जब मैं मुंबई में अनुपम खेर साहब के घर गया तो उनसे मिलने भी गया था। तब तक वे बहुत बड़े स्टार बन चुके थे, लेकिन मिले वैसे ही, जैसे एनएसडी के दिनों में हुआ करते थे। उनकी सादगी और बेतक्कलुफ का अंदाजा इस बात से लगाइए कि मैंने सिगरेट पी और उन्होंने बीड़ी। हमने साथ में चाय पी, बादाम खाए।

मैं उनकी पत्नी (सुतपा सिकदर) को अच्छी तरह जानता हूं और वे भी मेरी पत्नी शोभा को पहले से जानते थे। क्योंकि हम दोनों के प्रेम संबंध तकरीबन साथ-साथ ही चल रहे थे। मैं एक तरह से उनका मैसेंजर था। उनकी लव मैरिज का प्रस्ताव लेकर भी मैं ही सुतापा के पास गया था। मैं भी बंगाली था और सुतपा भी बंगाली , इसलिए उन्होंने मुझसे कहा कि तुम भरोसेमंद आदमी हो, तुम्हीं जाकर बात करो।

यह फोटो 1984 का है। तब इरफान नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में पढ़ रहे थे। राइट में इरफान खान, नीचे सुतपा जो अब इरफान की पत्नी हैं। दाढ़ी वाले आलोक चटर्जी, अभिनेत्री मीता वशिष्ठ और लेफ्ट में इदरीश अनवर मालिक।
यह फोटो 1984 का है। तब इरफान नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में पढ़ रहे थे। राइट में इरफान खान, नीचे सुतपा जो अब इरफान की पत्नी हैं। दाढ़ी वाले आलोक चटर्जी, अभिनेत्री मीता वशिष्ठ और लेफ्ट में इदरीश अनवर मालिक।

जब मै उनका मैसेज लेकर गया तो सुतपा ने कहा कि आलोक आप क्यों आए हो? वह डरता है क्या? तब मैंने कहा नहीं वह अच्छा लड़का है। सिर्फ मुस्लिम है और आप बंगाली। तब सुतपा ने कहा- 'हम कलाकार हैं, हमारा कोई मजहब नहीं। कला हमारा ईमान है।' ये बात मैंने इरफान को बताई। फिर दोनों में दोस्ती हुई और धीरे-धीरे प्यार हो गया। हालांकि उन्होंने शादी एनएसडी से निकलने के चार-साल बाद, शायद 1991-92 में की। इसकी वजह शायद मुंबई का स्ट्रगल रहा होगा। वे सबसे कहते थे कि आलोक मेरे लिए हनुमान जैसा दूत बना, हनुमान राम का संदेशा लेकर सीता जी के पास गए थे और आलोक मेरा संदेशा लेकर सुतपा के पास गया।

जब मगरमच्छ बनकर सो गए थे इरफान

आलोक चटर्जी ने क्लास का एक किस्सा बताया। बोले - मोहन महर्षि हमारे टीचर और डायरेक्टर थे। एक दिन रियलिस्टिक क्लास में उन्होंने हमसे कहा कि सब किसी भी जानवर की तरह खुद को महसूस करो और एक्ट करो। तब कोई कुत्ता बना, कोई बिल्ली। इरफान पेट के बल लेट गए। जब मोहन जी ने पूछा कि तुम कौन सा जानवर बने हो तो इरफान ने एक रियलिस्टिक सा जवाब दिया- 'सर मगरमच्छ। वह धूप सेंक रहा है।' हम सब हंसने लगे। सर भी हंस पड़े। वे देखने में शांत थे, लेकिन उनके अंदर गजब का सेंस ऑफ ह्यूमर था।

एक और दिन मोहन महर्षि सर ने कहा कि सभी कोई एक रियलिस्टिक किरदार करो। इरफान ने एक मजदूर का कैरेक्टर लिया। उन्होंने एक बोरा उठाया और घूम-घाम कर आकर बैठ गए। सर ने पूछा क्या बने हो, क्या कर रहे हो? वे बोले- 'मजदूर है, भारी बोरा उठाकर लाया है। थक गया है, बीड़ी पीएगा।' वे बीड़ी पीने लगे। बहुत ही शरारती थे। एक दिन इरफान गुस्सा होने की मेडिटेशन एक्सरसाइज कर रहे थे। वह होली का दिन था। सबने ठंडाई पी और उन्हें भी पिला दी। तब वे बोले- 'मुझे गुस्सा नहीं आ रहा, मुझे हंसी क्यों आ रही है।' ठंडाई पीकर गुस्सा कहां से आएगा।

उन्होंने शुरुआत में मुंबई में स्ट्रगल भी काफी किया। छह घंटे कॉल सेंटर में नौकरी की, बाकी समय में स्टूडियो की खाक छानी। पहले सीरियल 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' से ब्रेक मिला। इसके 8 साल बाद टेलीविजन के सबसे पॉपुलर स्टार बन गए। फिर उन्हें पहली फिल्म मिली। करीब 42 साल की उम्र में वे सिनेमा में आए। और जब आए तो अमिताभ बच्चन से लेकर टॉम हैंक्स जैसे एक्टर के साथ काम किया।

वे शुरू से नसीरुद्दीन शाह को बहुत मानते थे। उनका मानना था कि फिल्मों में जो रियलिस्टिक एक्टिंग होती है, वह नसीर साहब करते हैं। अच्छा रोल मिले तो आदमी कामयाब हो सकता है। 'पान सिंह तोमर' में उसका सर्वश्रेष्ठ अभिनय है। उस कैरेक्टर को वे पी गए थे। वे किंग थे।

अमिताभ के साथ झगड़े का इम्प्रोवाइजेशन

इरफान खान के को-स्टार और फिल्म 'पीकू' में बुद्धन (अमिताभ बच्चन के सर्वेंट) का किरदार निभाने वाले अभिनेता बालेंद्र सिंह ने बताया, 'शूटिंग पर इरफान अपनी स्क्रिप्ट मिलते ही उसके बारे में सोचने में लग जाते थे। वे कोने में जाकर सिगरेट का कश लगाते थे और इम्प्रोवाइज करते थे। कैसे उस किरदार को जिएं? वे कहीं भी जाकर जमीन पर या गाड़ी के पास बैठ जाते थे। बोलते कम थे और सोचते ज्यादा थे।

कार में दीपिका पादुकोण, इरफान खान और बालेंद्र सिंह शूटिंग के दौरान
कार में दीपिका पादुकोण, इरफान खान और बालेंद्र सिंह शूटिंग के दौरान

सबसे इंट्रेस्टिंग ये था कि जब हम कुछ सीन की रिहर्सल करते थे, उसी में काफी कुछ हंसी-मजाक में शूट भी हो जाता था। क्योंकि हर जगह हम चार ही कलाकार थे। कलकत्ता जाते वक्त रास्ते में चाकू मिलने वाले सीन को इम्प्रोवाइज करना था। इसमें डायलॉग नहीं थे, बस सिचुएशन बता दी कि इरफान जी और अमिताभ जी को झगड़ना है। वे रिहर्सल में शुरू हो गए। 'ऐ अंकल, अंकल नहीं, भाई साहब, भाई साहब नहीं'। तब इरफान ने पूछा, ‘क्या बोलूं आपको। तब अमितजी बोले- ‘अरे कुछ भी बोलो, जब तक वो कट नहीं बोलेंगे, हम खेलते रहेंगे।' जब तक कट नहीं बोला गया, बच्चन साहब, इरफान भाई और दीपिका इम्प्रोवाइज करते रहे और मैं कार में सोया रहा और सब सुनता रहा। बाद में कट बोलने पर हम सब खूब हंसे।

'मुझे और गुड़ ले जाना है, पैसे तो लेने पड़ेंगे'

जयपुर से इरफान के साथी और 'पानसिंह तोमर' में उनके भाई मातादीन सिंह का किरदार निभाने वाले अभिनेता इमरान हसनी ने बताया, 'हमारे बड़े-बुजुर्ग और इरफान के बड़े-बुजुर्ग जयपुर में एक ही जगह के थे। इस तरह हमारा जयपुर में पहले से दोस्ताना था। मुंबई आया, तब उससे मिलना-जुलना लगा रहा। फिर हम कई बार ईद पर साथ में होते थे।

मुझे 'पान सिंह तोमर' की शूटिंग का एक वाकया याद है। हमें देहरादून के पास आर्मी एरिया में शूट करना था। वहां परमिशन नहीं मिली। हम तीन दिन वहीं रहे। एक दिन इरफान ने कहा कि चलो आगे गांव घूमकर आते हैं। मैं इरफान और कुछ लोग 3 किलोमीटर आगे तक पैदल चलकर गए। वहां पहुंचे तो देखा कि लिक्विड गुड़ बन रहा था और उसकी खुशबू आ रही थी।

'पान सिंह तोमर' के सेट पर इमरान हसनी और इरफान खान।
'पान सिंह तोमर' के सेट पर इमरान हसनी और इरफान खान।

जब गुड़ बनाने वालों को पता चला कि हम दूसरे शहर से आए हैं तो उन्होंने हमें मेहमान की तरह गुड़ खाने के लिए दिया। वह बहुत ही स्वादिष्ट था। बाद में इरफान ने पूछा कि कितने पैसे हुए। तो वे बोले- 'नहीं हम मेहमान से पैसे नहीं ले सकते।' इरफान भी अड़ा रहा कि नहीं मुझे और गुड़ भी ले जाना है, इसलिए पैसे बताओ। लेकिन उन्होंने कहा कि ये समझना आपने अपने भाई के घर खाया। इरफान ने उन्हें गले लगा लिया। कहा- ये है हमारा हिंदुस्तान और यहां की तहजीब। उसके बाद हम तीन दिन तक वहां गए और हमारी खूब खातिरदारी हुई।

इरफान भाई से आखिरी मुलाकात मुंबई में उनके हॉस्पिटल जाने से पहले उनके घर पर हुई थी। बीमारी के दौर में भी वे बहुत पॉजिटिव थे। कोई भी डिप्रेशन वाली बात नहीं की। वे परेशान थे, उन्हें तकलीफ थी। लेकिन उनके चेहरे पर शिकन नहीं थी। वे गले मिले, बाहर तक छोड़ने आए। जैसा हमेशा करते थे। बोले- 'जयपुर जाओ तो मेरा सलाम कहना सबसे।' खुदा हाफिज बोले। फिर जब वे हॉस्पिटल में थे, तब उनसे एक बार फोन पर बात हुई थी। बाबिल ने स्पीकर फोन पर बात कराई। बोले- 'भाई चिंता मत करो। ठीक हूं। जल्द आता हूं। इंशाअल्लाह पतंग उड़ाने जयपुर चलेंगे।' उसके बाद उनसे कब्रिस्तान में मिलना हुआ, जब हम उन्हें सुपुर्द-ए-खाक करने ले गए।

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