भास्कर इंटरव्यू:जेनिफर एल्‍फोंस बोलीं- अफगानी आर्टिस्‍ट फ्रांस और जर्मनी जाने को हैं मजबूर, हालांकि इस बार तालिबान ने उन्‍हें टारगेट नहीं किया है

5 महीने पहलेलेखक: अमित कर्ण
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अफगानिस्‍तान के तकरीबन तालिबान कब्‍जे में चले जाने के चलते वहां कोमा चला गया सिनेमा उद्योग खौफ के साये में जी रहा है। वहां की सरजमीं पर अपनी फिल्‍म शूट कर चुकीं इंडियन फिल्‍मकार जेनिफर एल्‍फोंस के मुताबिक, "अफगानी आर्टिस्‍ट, फिल्‍मकार आदि देश छोड़ फ्रांस, जर्मनी, कनाडा जैसे देशों में जाने को मजबूर हैं। उन्‍होंने पड़ोसी इस्‍लामी मुल्‍क नहीं चुना है। वो इसलिए कि ईरानी फिल्‍मकार और कलाकार भी फ्रांस आदि देशों में रह रहें है। वहां की फिल्‍मों में काम हासिल कर पा रहें हैं।"

'हबीब' भी अफगानिस्‍तान में तालि‍बानी खौफ से पूरी नहीं हो पा रही है

जेनिफर की फिल्‍म 'हबीब' भी अफगानिस्‍तान में तालि‍बानी खौफ और कोविड के चलते पिछले तीन सालों से पूरी नहीं हो पाई है। इस फिल्‍म के को-प्रोड्यूसर हबीब सैफी वहीं से हैं। एक प्रोड्यूसर हैदराबाद से हैं। जेनिफर बताती हैं, "तीन साल पहले हम वहां 40 फीसदी शूटिंग भी इसलिए कर सके क्योंकि वहां तब अफगान सरकार से हमें सुरक्षा मिली हुई थी। वरना शूट के दरम्‍यान अचानक इंटेल की रिपोर्ट आती है कि आसपास कोई स्‍नाइपर है, हमें निकलना होगा। या कहीं लोकेशन पर जाने के बाद पता चलता था कि वहां तो आसपास लैंडमाइंस भी बिछे हुए हैं। वहां से भी हमें निकलना पड़ता था। इस बार अब तक तो तालिबान ने वहां की सिनेमा और साहित्‍य बिरादरी को हार्म नहीं किया है, फिर भी लोग डरे हुए हैं।"

जेनिफर ने कुदरत से मिली चुनौतीयों के बारे में की बात

जेनिफर को वहां कुदरत से भी चुनौती मिलती थी। वो कहती हैं, "शूटिंग के लिए दिन में हमें समय भी कम मिलता था। वहां दोपहर चार बजे ही सूर्यास्‍त हो जाया करता था। उसी में एक से दो बजे दोपहर में लंच पीरि‍यड भी रखना पड़ता था। ऐसे में हम किसी भी एक्‍टर को एक या दो टेक से ज्‍यादा नहीं दे पाते थे।"

तालिबान नहीं होता तो अफगानि‍स्‍तान भी कला और साहित्‍य का केंद्र होता: जेनिफर

वहां के लोगों में फिल्‍म को लेकर जुनून था। जेनिफर बताती हैं, "हमने जैसे ही अनाउंस किया कि एक अफगान फिल्‍म बन रही है तो वहां ऑडिशन देने 200 अफगानी कलाकार आ गए थे। वो इसलिए नहीं जुट गए थे कि उन्‍हें फिल्‍म में काम चाहिए ही, बल्‍क‍ि सिनेमा के प्रति प्‍यार उन्‍हें खींच लाया था। हमारी फिल्‍म में हनीफ हम गम भी सेलेक्‍ट हुए। उन्‍होंने 'काबुल एक्‍सप्रेस' में खैबर का रोल किया था। हनीफ जी हालांकि अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनके साथ वैसे कलाकार भी हमारी फिल्‍म के लिए आए, जो वल्‍र्ड सिनेमा में काम कर चुके हैं। वहां की पेंटिंग और पोएट्री कमाल की है। अगर तालिबान नहीं होता तो अफगानि‍स्‍तान भी कला और साहित्‍य का केंद्र होता।"

फिल्‍म अफगानिस्‍तान में ही पूरी करेंगी जेनिफर

जेनिफर आगे कहती हैं, "वहां सिनेमाघर तो बहुत नहीं हैं। काबुल में बमुश्किल दो से तीन ही ही सिनेमाघर दिखे थे। उनमें दो में पश्‍तुन और ईरान का सिनेमा लगा था और एक में पुरानी हिंदी फिल्‍म चल रही थी। सिनेमाघरों में लोग जाते नहीं हैं, क्‍योंकि वहां धमाकों का जोखिम रहता है। मुझे भी कहा गया कि अगर वहां जाना है तो आप अपने रिस्‍क पर जाइए। बहरहाल, हमने भी ठाना हुआ है कि हम अपनी फिल्‍म वहीं पूरी करेंगे। हालात बेहतर होने का इंतजार है हमें। हमारी फिल्‍म में तेलुगू स्‍टार सत्‍यदेव कंचरना हैं।"

हिंदी फिल्‍म के लिहाज से अफगानिस्‍तान डेड मार्केट है अफगानिस्‍तान है: अतुल मोहन

ट्रेड एनैलिस्‍ट अतुल मोहन का कहना है कि तालिबान के चलते पिछले 20 सालों से अफगानिस्‍तान डेड मार्केट है। वहां दो दशकों में शायद ही डिस्‍ट्रीब्‍यूशन सिस्‍टम से किसी ने फिल्‍म खरीदी होगी। वहां तो 15 साल पहले ही तकरीबन सारे सिनेमाघर बंद थे। अब भी गिनती के दो से तीन सिनेमा हॉल काबुल में हैं। बमुश्किल से कीर्गि‍स्‍तान, उज्‍बेकिस्‍तान वगैरह में जाकर सिनेमा देखना पड़ता था। वहां पर साल 2002-03 में तो थोड़ा बहुत टूरिंग सिनेमा का कॉन्‍सेप्‍ट था। अफगानिस्‍तान वालों को सिनेमा देखना हो तो एकमात्र सहारा यूट्यूब और ऑनलाइन स्‍ट्रीम का है।

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