जॉनी वॉकर का जन्मदिन:गरीबी की वजह से पढ़ाई छोड़कर बेस्ट बस में कंडक्टर की नौकरी करते थे जॉनी वॉकर,भीड़ वाले सीन में खड़े होने का मिला मौका और फिर बन गए दिग्गज कॉमेडियन

2 महीने पहले
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50 से 70 के दशक तक हिंदी सिनेमा पर नजर दौड़ाएं तो तब की फिल्मों में जॉनी वॉकर एक ऐसे अभिनेता के तौर पर नजरों के सामने तैरने लगते हैं, जिन्होंने अपनी अदाकारी से न केवल लोगों को गुदगुदाया, बल्कि उनके चहरे पर मुस्कान भी बिखेर दी। जॉनी वॉकर ने जीवन में कभी शराब नहीं पी, लेकिन शराबी के किरदार वह इस तरह से निभाते मानों कितनी पी ली हो।

लीजेंड्री कॉमेडियन जॉनी वॉकर का जन्म 11 नवंबर 1920 को इंदौर में हुआ था, जबकि देहांत 29 जुलाई, 2003 को मुंबई में हुआ था। जॉनी के चेहरे के हाव-भाव, बोलने का अलग अंदाज और एक्टिंग की सादगी ऑडियंस को खूब पसंद आती थी। जॉनी ने अपनी को-एक्ट्रेस शकीला की बहन नूरजहां से शादी की थी। नूर और जॉनी वॉकर के 3 बेटे और 3 बेटियां हैं।

गरीबी की वजह से छोड़नी पड़ी थी पढ़ाई

जॉनी वाकर का वास्तविक नाम बदरूदीन जमालुदीन था। मध्यप्रदेश के इंदौर शहर मे एक मिडिल क्लास मुस्लिम फैमिली में जन्में जॉनी बचपन से ही एक्टर बनने का ख्वाब देखा करते थे। 1942 मे उनका पूरा परिवार मुंबई आ गया था। 10 भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर रहे जॉनी परिवार का पेट पालने के लिए बेस्ट बस सर्विस में कंडक्टर की नौकरी करते थे। इस नौकरी के लिए उन्हें 26 रुपए मिलते थे। बात दें, जॉनी को गरीबी की वजह से महज छटवीं क्लास के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। बॉलीवुड में शोहरत कमाने के बाद जॉनी ने अपने सभी बच्चों को विदेश में तालीम दी।

पहली बार एक्टिंग के लिए मिले थे 5 रुपए

जॉनी को कंडक्टर की नौकरी करते-करते मुफ्त में फिल्म स्टूडियो जाने का मौका मिल जाया करता था। उन्हें जल्द ही फिल्मों में भीड़ वाले सीन में खड़े होने का मौका मिल गया। जिसके लिए उन्हें 5 रुपए मिला करते थे। इसी दौरान जॉनी वॉकर की मुलाकात फिल्म जगत के मशहूर विलेन एन.ए.अंसारी और के. आसिफ के सचिव रफीक से हुई। लगभग 7-8 महीने के स्ट्रगल के बाद जॉनी वॉकर को फिल्म 'आखिरी पैमाने' मे एक छोटा सा रोल मिला। जिसके लिए उन्हें 80 रुपए मिले थे।

जॉनी ने एक बार शराबी की एक्टिंग की, जिसके चलते गुरुदत्त काफी नाराज हुए। हालांकि, जब गुरुदत्त को इस का बात का पता चला कि वो एक्टिंग कर रहे हैं तो वो काफी खुश हुए। इसके बाद उन्होंने जॉनी को 'बाजी' में एक रोल दिया। 35 साल के लंबे करियर के दौरान उन्होंने करीब 325 फिल्में की और सिनेमा से संन्यास ले लिया। हालांकि, ऋषिकेश मुखर्जी के आग्रह पर 'आनंद' और गुलजार के कहने पर 'चाची 420' में उन्होंने काम किया था।

बदल दिया जॉनी वॉकर का रोल

1957 में रिलीज हुई ‘प्यासा’ में गुरु दत्त ने अपने किरदार विजय के स्वार्थी दोस्त श्याम की भूमिका के लिए जॉनी वॉकर का चयन किया था, लेकिन जॉनी वॉकर पर कुछ सीन शूट करने के बाद उन्हें ख्याल आया कि दर्शक अपने पसंदीदा हास्य कलाकार को ऐसे नेगेटिव किरदार में कभी देखना पसंद नहीं करेंगे इसलिए यह रोल उन्होंने श्याम कपूर नामक अभिनेता को दिया और इस तरह जॉनी वॉकर एक दूसरा किरदार बनकर ‘सर जो तेरा चकराए’ नामक गीत का चेहरा बने।

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