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कैफी आजमी की डेथ एनिवर्सरी:11 साल में लिखी पहली गजल, पत्नी रूठी तो खून से लिखा खत, नेहरू जी के अंतिम संस्कार में बजा इन्हीं का लिखा गाना

2 महीने पहलेलेखक: ईफत कुरैशी

हिंदी, उर्दू के मशहूर शायर और हिंदी फिल्मों के लिरिसिस्ट कैफी आजमी को गुजरे आज पूरे 20 साल हो चुके हैं। कैफी आजमी ने अपने बेहतरीन लेखन से साहित्य एकेडमी अवॉर्ड, सोवियत लैंड नेहरु अवॉर्ड, पद्मश्री, लोटस अवॉर्ड और राष्ट्रपति अवॉर्ड जैसी कई बड़े सम्मान हासिल किए। हीर रांझा, आलम आरा, पाकीजा जैसी फिल्मों के लिरिसिस्ट रहे कैफी आजमी को लेखन का गुर विरासत में मिला। कैफी शायरों के परिवार से थे। पिता जमींदार थे तो अक्सर घर में शायराना महफिलें जमा करती थीं। बचपन में ही कैफी महफिलों में पहुंचकर बारीकियां समझने लगे थे। महज 11 साल की उम्र में कैफी ने अपना टैलेंट साबित करने के लिए जब पूरी गजल लिख डाली तो पढ़ने वाला हर एक शख्स हैरान था।

11 साल की नाजुक उम्र में लेखन शुरू करने वाले कैफी 83 साल की उम्र में मरते दम तक लिखते रहे। 10 मई 2002 में कैफी नाम का एक मशहूर सितारा दुनिया छोड़ गया लेकिन उनकी लिखी नज्म, शायरियां और लाइनें सदाबाहर बनकर लोगों के जहन में बसी रहीं।

आज कैफी साहब की डेथ एनिवर्सरी के मौके पर आइए जानते हैं इनकी जिंदगी से जुडी कुछ खास बातें-

शायरों के घर में जन्मे कैफी आजमी

14 जनवरी 1919 में कैफी आजमी का जन्म मिजवां, आजमगढ़ के एक जमींदार के घर हुआ। जन्म के बाद नाम मिला अथर हुसैन रिज्वी। मदरसे में उर्दू में पकड़ मजबूत हो गई वहीं घर में लगने वाली महफिलों से इन्हें शायरी और लिखने में रुचि बढ़ गई।

पिता के इम्तिहान से गुजरकर किया लोगों को हैरान

11 साल की उम्र में जब कैफी आजमी ने लिखना शुरू किया तो पिता ने उन्हें तवज्जो नहीं दी। एक दिन कैफी का इम्तिहान लेने के लिए पिता ने उन्हें एक मिसरा देकर लाइनें पूरी करने को कहा। वो मिसरा था- ‘इतना हंसो कि आंख से आंसू निकल पड़े’। कैफी ने झट से सुनाया-

11 साल के आम से दिखने वाले एक बच्चे के मुंह से ये गजल सुनकर पिता हैरानी में पड़ गए। यहां पिता ने अथर रिजवी को कैफी नाम दिया जो बाद में बन गए कैफी आजमी। 11 साल की उम्र में इन्हें लखनऊ के शियाओं के सबसे बड़े मदरसे सुल्तानुल मदारिस में भेजा गया। कैफी रोज मदरसे के बाहर एक नज्म पढ़कर लोगों का ध्यान खींचा करते थे।

कम्युनिस्ट पार्टी के लिए लिखते थे नज्म

एक दिन नज्म पढ़ रहे कैफी पर उर्दू लेखक अली अब्बास हुसैनी की नजर पड़ी। अली अब्बास ने कैफी की मुलाकात चंद संपादकों और शायरी पसंद करने वालों से करवाई। कैफी 1942 में कानपुर जाकर मजदूर सभा में शामिल हो गए। यहां कैफी इंकलाबी नज्में कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार के लिए लिखा करते थे। जब दफ्तर बॉम्बे शिफ्ट हुआ तो कैफी भी 1943 में बॉम्बे पहुंच गए।

1944 में लिखी पहली किताब

जब भारत आजादी के लिए जद्दोजहद कर रहा था तब 1944 में कैफी ने अपनी पहली किताब झंकार लिखी। झंकार में कैफी ने देश के बंटवारे का दर्द बयां किया जिसे देशभर में खूब पसंद किया गया।

कैफी लिखते गए और उन्हें देशभर में पहचान मिलती गई। देश के हर मुद्दे पर कैफी की नज्म आने लगी। आखिर-ए-शब, सरमाया आवारा सजदे, कैफियत, नई गुलिस्तां जैसी इनकी लिखी किताबे हर शायरी पसंद करने वाली की पहली पसंद बनने लगी।

फिल्मों के लिए लिखा तो सदाबहार हो गई इनकी लिखावट

आजमी ने 1951 में पहली बार बुजदिल फिल्म के लिए लिरिक्स राइटिंग की। काम पसंद आया तो इन्हें यहूदी की बेटी, परवीन, मिस पंजाब मेल, ईद का चांद में गाने लिखने का मौका मिला। सिनेमा बदल रहा था जहां साहिर लुधियानवी, जान निसार अख्तर, मजरूह सुल्तानपुरी के साथ कैफी भी अपना योगदान दे रहे थे।

हीर रांझा से मिली पॉपुलैरिटी

1970 में जब कैफी ने हीर रांझा के डायलॉग और गाने लिखे तो देशभर में इन्हें अलग पहचान मिल गई। आगे इन्होंने गरम हवा, मंथन, कागज के फूल, सात हिंदुस्तानी, कोहरा, शोला और शबनम, परवाना, बावर्ची, पाकीजा, अर्थ, रजिया सुल्तान जैसी फिल्मों के लिए गाने और डायलॉग लिखे।

जब कैफी के लिखे गाने से शौकत ने तोड़ ली थी मंगनी

कैफी आजमी के मुशायरों में आम जनता के साथ शायरी की दुनिया के दिग्गज कलाकार भी घंटों बैठते थे। कैफी की शायरियां लोगों को ऐसा प्रभावित करती थीं कि लोग जिंदगी के फैसले बदल लिया करते थे।

शौकत ऐसी प्रभावित हुई कि उन्होंने अपनी मंगनी तोड़ ली। मुशायरे में कैफी पहली बार शौकत से मिले। उस समय कैफी 18 और शौकत 21 की थीं।

शौकत ऑटोग्राफ लेने पहुंचीं तो कैफी ने उनकी डायरी में पेन घुमाया तो जरूर लेकिन कुछ लिखा नहीं। कैफी इस बात से नाराज थे कि शौकत इनसे पहले महफिल में शामिल सरदार साहब के पास गई थीं। यहां दोनों की नजरें मिल गईं और देखते-ही-देखते दोनों को प्यार हो गया।

पत्नी को मनाने के लिए लिख दिया खून से खत

कैफी आजमी ने शौकत आजमी से शादी की थी जिससे इन्हें एक बेटी शबाना आजमी और एक बेटा बाबा आजमी है। शादी के कुछ सालों बाद जब कैफी और शौकत का झगड़ा हुआ तो रूठीं पत्नी अपने मायके चली गई। कई दिनों तक दोनों में बात बंद रही। पत्नी का इंतजार करके थक चुके कैफी ने आखिरकार अपने हुनर का जादू चलाया और खून से खत लिख डाला। जब शौकत ने खत खोला तो खून देखकर वो दंग थीं, वहीं खत में लिखी लाइनें में उन्हें घर वापस जाने पर मजबूर कर रही थीं। शौकत के पिता ने खत पढ़ा तो हंस पड़े। कहा- ये शायर बहुत चालाक होते हैं, जैसे दिखते हैं वैसे होते नहीं। शौकत नहीं मानीं और तुरंत घर पहुंच गईं।

कैफी आजमी का लिखा गाना 'मेरी आवाज सुनो, प्यार का राज सुनो....', मोहम्मद रफी ने गाया। जिसे प्राइम मिनिस्टर जवाहरलाल नेहरू के अंतिम संस्कार में बजाया गया था।

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