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मदर्स डे स्पेशल:फिल्मी पर्दे पर 'असाधारण मां' के रूप में देवियां, भारतीय सिनेमा में देवियों के अवतार अलग-अलग नरैटिव में दिखाएं गए हैं

भावना सोमाया10 दिन पहले
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अगली बार जब भी आप किसी असाधारण मां को स्क्रीन पर देखें तो उस देवी को याद करें जिन्होंने उस चरित्र के लिए प्रेरित किया। सिनेमा में ये अवतार अलग-अलग नरैटिव में प्रतिबिम्बित होते आए हैं। तंत्र-चूड़ामणि के अनुसार जब सती ने यज्ञ में छलांग लगाई और भगवान शिव ने उनकी पार्थिव देह को अपनी बाहों में लेकर तांडव किया तो भगवान विष्णु ने कयामत को भांपते हुए अपना सुदर्शन चक्र फेंका।

सुदर्शन चक्र ने सती के शरीर को इक्यावन टुकड़ों (कुछ कहते हैं 108 टुकड़े) में विभाजित कर दिया। ये सभी देवी शक्ति की अभिव्यक्तियां बनीं। भारतीय सिनेमा में ये अवतार अलग-अलग नरैटिव में प्रतिबिम्बित होते आए हैं। ‘संजोग’ में माला सिन्हा को लक्ष्मी के अवतार के रूप में दर्शाया गया है। मां दुर्गा/अम्बा अच्छाई का पोषण करने और बुराई को खत्म करने के लिए बनाई गई देवी ‘शक्ति’ की अभिव्यक्ति हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार जब राक्षस महिषासुर अजेय था, तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने देवी को असाधारण बनाने के लिए ऊर्जा केंद्रित की।

राकेश रोशन की ‘खून भरी मांग’ में रेखा, कबीर बेदी को हरा देती है। और जैसे शिव, ब्रह्मा और विष्णु ने मां दुर्गा की सहायता की, एक अजनबी व्यक्ति रेखा की जान बचाता है, एक डॉक्टर उसे एक नई पहचान देता है और उसके बच्चे उसको पीड़ा पहुंचाने वाले अत्याचारी से लड़ने का हौसला देते हैं। माना जाता है कि देवी लक्ष्मी, सरस्वती और काली ने मां वैष्णो देवी को उत्पन्न करने के लिए मिलकर शक्तियों को संयुक्त किया, ताकि वह मानवता को पीड़ा से मुक्त कर सके। वैष्णो देवी की रचना कठोर तपस्या और अत्यंत भक्ति करने के बाद हुई थी। गोविंद सरैया की ‘सरस्वती चंद्रा’ में कुमुद सुंदरी के रूप में इस पवित्र व तपस्वी चरित्र की झलक देखी जा सकती है। इस चरित्र को नूतन ने अभिनीत किया था। फिल्मों में मां सरस्वती का किसी न किसी रूप में गुणगान किया गया है।

‘आवारा’ में राज कपूर ने विद्या के रूप में, ऋतिक रोशन ने ‘गुजारिश’ में मरहम लगाने वाली के रूप में, जितेंद्र ने ‘ज्योति’ में सुधारक के रूप में तो कमल हासन ने ‘एक दूजे के लिए’ में शिक्षक के रूप में देखा। मां सावित्री देवी सती का ही एक अवतार हैं जो वैवाहिक जीवन के लिए समर्पित है। भारतीय सिनेमा पीढ़ियों से अपने पति के प्रति समर्पित सर्वगुण संपन्न नायिकाओं को बढ़ावा देता आया है, चाहे फिर वह ‘मैं चुप रहूंगी’ हो या ‘दिल एक मंदिर’। तो जब अगली बार जब आप किसी असाधारण मां को स्क्रीन पर देखें तो उस देवी को अवश्य याद करें जिन्होंने उस चरित्र के लिए प्रेरित किया। (भावना सोमाया जानी-मानी फिल्म लेखिका, समीक्षक और इतिहासकार)

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