भास्कर एक्सक्लूसिव:मो. रफ़ी की बहू ने सुनाए फैन्स की दीवानगी के किस्से, उनकी पुण्यतिथि पर कोई पूरा दिन खाना नहीं खाता, कोई कब्र की मिट्टी तक खा लेता है

3 महीने पहलेलेखक: उमेश कुमार उपाध्याय

मोहम्मद रफ़ी की आवाज के बिना हिंदी सिने संगीत की कल्पना नहीं की जा सकती। उनके शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीतों की भी अद्भुत दुनिया है...जुलाई का ये महीना जाते-जाते हमें रफ़ी साहब की सुरीली यादों से भिगो देता है। उनके फिल्मी, गैर-फिल्मी गीतों, भजनों, ग़ज़लों से लेकर दूसरी भाषाओं में गाए उनके गीतों और उनसे जुड़े यादगार किस्से बेहद मशहूर हैं। मोहम्मद रफ़ी की सबसे छोटी बहू फिरदौस शाहिद रफ़ी ने मो. रफ़ी साहब की पुण्यतिथि 31 जुलाई के अवसर पर उन्हें याद करते हुए दैनिक भास्कर से खास बातचीत की है। फिरदौस रफ़ी, मो. रफ़ी के सबसे छोटे बेटे शाहिद की पत्नी हैं। उनकी शादी रफ़ी साहब की मौत के 9 साल बाद हुई। फिरदौस की कभी रफ़ी साहब से मुलाकात नहीं हुई, लेकिन रफ़ी साहब की निशानियां वो संभाल रही हैं।

पढ़िए, फिरदौस शाहिद रफ़ी से बातचीत के प्रमुख अंश...

फिल्मी दुनिया से आपका क्या ताल्लुक रहा है?
मेरे पिता की जिंदगी फिल्म इंडस्ट्री में बीती। उन्होंने बतौर चाइल्ड एक्टर काम करना शुरू किया। वे इंडस्ट्री में मास्टर रोमी के नाम से जाने जाते थे। पिता की एक फिल्म थी- ‘अब दिल्ली दूर नहीं’। उसमें रफ़ी साहब का एक गाना था- चुन चुन करती आई चिड़िया, दाल का दाना लाई चिड़िया...। यह गाना मेरे पिता पर फिल्माया गया था। मेरी खुशकिस्मती रही कि शादी के बाद उनका अवॉर्ड रूम देखा और उनके फैन्स से मिली।

फैन्स रफ़ी साहब की कब्र की मिट्‌टी को अपने पर्स और रूमाल में रखकर ले जाते हैं।
फैन्स रफ़ी साहब की कब्र की मिट्‌टी को अपने पर्स और रूमाल में रखकर ले जाते हैं।

रफ़ी साहब के अवॉर्ड्स किस तरह सहेजकर रखे गए हैं?

रफ़ी साहब का बंगला साल 1987 में बिल्डिंग में कन्वर्ट हो गया। उसमें अवॉर्ड रूम बनाकर उनके सारे अवॉडर्स सहेजकर रखे गए हैं। इसे देखने के लिए रफ़ी साहब के फैन्स उनकी पुण्यतिथि (31 जुलाई) और जन्मदिन (24 दिसंबर) पर आते हैं। माशाअल्लाह! सुबह से शाम तक, भारी मजमा जमा होता है। फैन्स गुलदस्ता, फूल-हार आदि लेकर आते हैं। लोगों की तादाद साल-दर-साल बढ़ती गई। फैन्स मॉरीशस, लंदन, दिल्ली, पंजाब आदि जगहों से आते थे। बहरहाल, दो साल से लॉकडाउन की वजह से अवॉर्ड रूम बंद है, सो अब लोग फोन करके पूछते हैं कि क्या हम देखने आ जाएं। दो साल से उन्हें मना करना पड़ रहा है। अवॉर्ड्स, रिकॉर्ड्स, चेयर, टेबल, टेलीफोन सहित हारमोनियम, तानपुरा, तबला आदि जिस पर वे रियाज़ करते थे, उन्हें भी संभालकर रखा गया है।

फैन्स की निगाहें सबसे ज्यादा किन पर टिकती हैं?
सच कहूं तो फैन्स अवॉर्ड रूम में आते जरूर हैं, पर उनकी निगाहें फैमिली पर ज्यादा टिकी रहती हैं। उनकी लालसा रफ़ी साहब के बेटे-पोते को छूने की होती है। उनको इतना लगाव है कि फैमिली को देखते ही रहते हैं। उनके साथ तस्वीरें खिंचवाते और बातें करते रहते हैं। इस तरह फैमिली की मौजूदगी उनके लिए बड़ी बात होती है। हां, फैन्स को अटैंड करने के लिए फैमिली भी खड़ी रहती है। ऐसा नहीं होता है कि फैन्स को देखने के लिए अवॉर्ड्स रूम खोल दिया, वे आए और देखकर चले गए।

रफ़ी साहब का ऐसा कोई हार्डकोर फैन, जो उनके लिए कुछ खास करता हो?
एक-दो नहीं, बहुतेरे फैंस हैं, जिन्होंने उनके साथ तस्वीरें खिंचवाकर, उनका सामान ले जाकर अपने आपको फेमस कर लिया है। अभी कनाडा से एक फोन आया था। फोन करने वाले कह रहे थे- क्या आपको पता है कि यहां पर एक लेडी रहती हैं, जिनका वर्षों से यही रूटीन है कि 31 जुलाई को वे कंपनी से छुट्‌टी लेती हैं।

नया स्टाफ आया, तब बातचीत में खुलासा हुआ कि वह मैडम 31 जुलाई को ही छुट्‌टी क्यों लेती हैं? पता चला कि 31 जुलाई को मैडम पूरा दिन खाना नहीं खाती हैं, घर का काम नहीं करतीं। बस, कमरे में पड़े-पड़े रफ़ी साहब का गाना सुनती और रोती रहती हैं। इस तरह दुनिया के कोने-कोने में ऐसे तमाम हार्डकोर फैन्स हैं। इंडिया के बारे में पता चल भी जाता है, पर बाहर वालों के बारे में उतना पता नहीं चल पाता।

इस तरह की एक-दो कहानियां और बताइए?
लोग आते हैं, तब उनकी कब्र की मिट्‌टी को अपनी पर्स और रूमाल में रखकर ले जाते हैं। कोई टीका लगाता है, तब कोई खा भी लेता है। इस तरह उनके प्रति तमाम लोग मोहब्बत जाहिर करते हैं। बिल्डिंग के बाहर ‘रफ़ी मेंशन’ नाम लिखा है। फैन्स ही नहीं, बल्कि सिंगर्स भी वहां पर अपना शीश झुकाते हैं। उनका मानना है कि उसे छू लेने भर से उन्हें आशीर्वाद मिल गया। मैंने कोलकाता, पंजाब में ऐसे फैन्स को भी देखा है कि उन्होंने अपने घर के मंदिर में कृष्ण भगवान के साथ अपने अजीज रफ़ी साहब की भी फोटो लगा रखी है।

उनकी भी पूजा करते हैं। इसे लेकर काफी कंट्रोवर्सी भी हुई, लेकिन वे कहते हैं कि अपने भगवान की पूजा कर रहा हूं। इस तरह की बातें कहने में हमें शर्म आती है, पर लोग उन्हें मोहब्बत तो बहुत करते हैं। अलग-अलग किस्म के चाहने वाले लोग हैं। वीडियो बनाकर कोई अपने आपको उनका पोता तो कोई उनकी पोती बताता है। हमें इस पर गुस्सा, जलन नहीं, बल्कि फ़ख्र महसूस होता है कि उनसे हर कोई जुड़ना चाहता है।

रफ़ी साहब दान-धर्म की बातें फैमिली को भी नहीं बताते थे।
रफ़ी साहब दान-धर्म की बातें फैमिली को भी नहीं बताते थे।

कोई अद्भुत किस्सा सुनाइए?
हर चीज, उनकी किताब वगैरह के जरिए बाहर है, ऐसा कुछ छिपा तो नहीं है। फिर भी एक किस्सा बताती हूं। रफ़ी साहब के गुजर जाने के बाद एक बाबा आए थे। गेट पर आकर उन्होंने कहा कि साहब को बुलाओ। हमें साहब से मिलना है। वे जिद् करने लगे, तब घर पर उन्हें बुलाकर पूछा गया कि आप कहां से आए हैं? उन्होंने बताया कि मैं कश्मीर से आया हूं। उन्हें बताया गया कि उनका इंतकाल हो गया। क्या आपको खबर नहीं मिली! इतना सुनते ही उन्होंने कहा- तभी तो मैं कहूं कि मेरे पैसे क्यों आने बंद हो गए? उन्होंने नम्र भाव से बताया कि कई सालों से रफ़ी साहब मेरा घर चला रहे थे। अब एकाएक पैसे आने बंद हो गए, तब लगा कि ऐसा क्या हो गया, जो बंद हो गए। परिवार वालों ने जब रफ़ी साहब के सेक्रेटरी से पूछा, तब उन्होंने बताया कि यह बात सच है, लेकिन रफ़ी साहब ने कहा था कि यह बात किसी को बताना मत। चुपचाप इन्हें पैसे भेजते रहना। ऐसे थे- रफ़ी साहब। ऐसी कुछ दान-धर्म की बातें फैमिली को भी नहीं बताते थे।

स्टार्स के साथ रफी साहब का कोई किस्सा?
मुझे याद है, एक बार जीतेंद्र साहब ने उनके बारे में एक किस्सा बताया था। उनकी फिल्म में एक गाना गाना था। जीतेंद्र जी ने रफ़ी साहब से पूछा कि एक बहुत छोटे बजट की फिल्म है। क्या रफ़ी साहब आप करेंगे? उन्होंने कहा- बता दो। मैं गाने आ जाऊंगा। खैर, बात बन गई और दिन-तारीख तय हुआ। रफ़ी साहब ने गाना गाया और गाकर घर आने लगे, तब जीतेंद्र के सेक्रेटरी ने उन्हें एक लिफाफा दिया। उन्होंने घर आकर उसे खोला, तब सीधे जीतेंद्र को फोन लगाया। रफ़ी साहब पंजाबी में कहने लगे- क्या बात है, तू तो बहुत बड़ा आदमी बन गया है। तेरे पास बहुत पैसे आ गए हैं।

जीतेंद्र ने कहा- क्या बात है, मुझसे कोई गलती हो गई। अगर कुछ गलत हो गया, तो माफी चाहता हूं। रफ़ी साहब ने कहा- मुझे इतने सारे पैसे क्यों दिए। मुझे जितना चाहिए, यह उससे कहीं बहुत ज्यादा है। इतना तो मेरा बनता भी नहीं है। खैर, उन्होंने कुछ पैसे रखकर बाकी पैसा जीतेंद्र को वापस भेज दिया। ये किस्से जिनके साथ हुए होते हैं, वे अपने शब्दों में बतलाते हैं, तब सुनकर बहुत खुशी होती है। मैंने सुना है कि उन्होंने कई फिल्मों में एक रुपया लेकर भी गाया है।

चल मेरे भाई तेरे हाथ जोड़ता हूं, हाथ जोड़ता हूं तेरे पांव पड़ता हूं। रफ़ी साहब ने यह गाना अमिताभ बच्चन के साथ गाया था।
चल मेरे भाई तेरे हाथ जोड़ता हूं, हाथ जोड़ता हूं तेरे पांव पड़ता हूं। रफ़ी साहब ने यह गाना अमिताभ बच्चन के साथ गाया था।

रफ़ी साहब के जीवन के मूल्य क्या है, जिन्हें आपने भी अपनाया हो?
देखिए, हर किसी का जीने का अपना तरीका होता है। रफ़ी साहब की तरह उनके बच्चों और फैमिली को भी खाने का शौक है। अगर किसी चीज को उनके बच्चों ने अपनाया है, तो उनकी सादगी और अच्छाई है। इस पर सारी दुनिया नाज़ करती है। घमंड करना उनकी फितरत में नहीं था। खिलाने-पिलाने के शौकीन रफ़ी साहब की सादगी ऐसी थी कि घर की बनी चाय थर्मस में डालकर रिकॉर्डिंग स्टूडियो लेकर जाते थे। उनकी चाय बहुत फेमस थी। खुद भी पीते थे और सबको पिलाते भी थे। हर कोई एक घूंट चाय पीना चाहता था। आगे बताऊं तो उनका एक गाना था- चल मेरे भाई तेरे हाथ जोड़ता हूं, हाथ जोड़ता हूं तेरे पांव पड़ता हूं। उन्होंने यह गाना अमिताभ बच्चन के साथ गाया था।

यह गाना जब गाकर आए, तब सारे बच्चों को बुलाते हुए कहा- पास आओ, तुमसे कुछ कहना है। वे खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। उन्होंने कहा- क्या आपको पता है कि आज किसके साथ मैंने गाना गाया। मैंने अमिताभ बच्चन के साथ गाया। ऐसे सादगी भरे रफ़ी साहब थे। उनको सामने वाले की पॉपुलैरिटी के बारे में पता था, पर खुद के बारे में नहीं पता था कि ऊपर वाले ने उन्हें क्या रुतबा दिया है।

रफ़ी साहब बच्चों के साथ छुट्टियां मनाने लोनावला में अपने बंगले पर जाते थे।
रफ़ी साहब बच्चों के साथ छुट्टियां मनाने लोनावला में अपने बंगले पर जाते थे।

किन बातों पर सहज खुश हो उठते थे और खाने में क्या पसंद था?
उन्हें अपने बच्चों को लेकर इतना इंटरेस्ट था कि उन्हें हंसता-खेलता देखकर खुश हो उठते थे। उनका लोनावाला में बंगला था। बच्चों के साथ छुट्‌टी मनाने वहां जाते थे। वहां छोटा-सा स्विमिंग पूल था, उसमें बच्चों को लेकर कूद जाते थे। बच्चों के साथ बहुत एन्जॉय करते थे। उनके साथ कैरम खेलते और पतंग उड़ाते थे। बच्चों के साथ बच्चों की तरह ही पेश आते थे। उनसे ज्यादा फिल्मी बातें नहीं करते थे। खाने-पीने के बड़े शौकीन थे। उन्हें मीठा, लस्सी और नॉनवेज बहुत पसंद था।

ऐसा कहा जाता है कि एक बार गाते समय उनके गले से खून आ गया था?
यह लोगों ने अफवाह फैलाई है। नौशाद साहब ने एक इंटरव्यू में कहा कि गले से खून नहीं आया था। उन्होंने तारीफ में कहा कि वह गाना इतने ऊंचे सुर का था कि रफ़ी साहब ने आठवां सुर लगा दिया। नौशाद साहब ने उस गाने के बाद रफ़ी साहब से कहा था कि गला थोड़ा सूज जाएगा, इसलिए बहुत ज्यादा गाना अभी मत गाना। थोड़ा गले को आराम देना। इस तरह उन्होंने गले को थोड़ा आराम दिया था।

उनके गले से खून निकल आया, यह तो कहना ही बहुत गलत बात है। एक और अफवाह है कि रफ़ी साहब मक्का गए थे, तब वहां पर अजान दी थी, लेकिन उन्होंने कुछ अजान नहीं दिया था। ऐसा था कि एक फिल्म आई थी- सन ऑफ गॉड। इस फिल्म में अल्लाह हु अकबर... जैसी एक-दो लाइन उन्होंने गाईं। इसे लोगों ने कनेक्ट कर दिया कि जहां हज करने जाते हैं, वहां जाकर अजान दिया। लेकिन ऐसा कुछ नहीं था।

इस बार रफ़ी साहब की 41वीं पुण्यतिथि पर क्या खास करने वाली हैं?
इस बार हम ऑनलाइन मोहम्मद रफ़ी म्यूजिकल इंस्टीट्यूट के जरिए उन्हें ट्रिब्यूट दे रहे हैं। इसमें इंस्टीट्यूट के टीचर और बच्चे भी गाएंगे। रफ़ी साहब के पोते और मेरे बेटे फुजैल रफ़ी इस ऑनलाइन इंस्टीट्यूट को खोलकर उन्हें ट्रिब्यूट दे रहे हैं। इससे नामी-गिरामी म्यूजिक घरानों के लोग जुड़े हैं। कविता कृष्णमूर्ति, जावेद अली, तलत अजीज, रहमान नौशाद, रोहन कपूर, सिद्धांत कपूर, अंदलीब सुलतानपुरी, जावेद बदायूं, म्यूजिक डायरेक्टर रविशंकर की बेटी ऑनलाइन जुड़कर मो. रफ़ी साहब को ट्रिब्यूट देंगे। इस बार लॉकडाउन के चलते लोग रफ़ी मेंशन नहीं आ सकते, इसलिए फैन्स और चाहने वालों के घर ऑनलाइन ट्रिब्यूट लेकर आ रहे हैं, जो एकदम फ्री होगा।

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