फिल्म रिव्यू- अंतिमः द फाइनल ट्रुथ:सलमान खान- आयुष शर्मा का पूरा प्रयास, पर मास फिल्‍म के नाम पर अधूरी रह जाती है फैंस की आस

मुंबई2 महीने पहलेलेखक: अमित कर्ण
  • अवधि:- दो घंटे 20 मिनट

सलमान खान और आयुष शर्मा की यह फिल्‍म मराठी में आई ‘मुल्‍शी पैटर्न’ की एडेप्‍टेशन है। दोनों के किरदार राजवीर और राहुल्‍या किसान के बेटे हैं। महाजनों, कॉरपोटरों, विधायकों और सिस्‍टम के बाकी तंत्रों से उनके बाप दादा परेशान रहे। राहुल्‍या के पिता (सचि‍न खेडेकर) पहलवान महाराष्‍ट्र केसरी हैं, पर उनकी जमीनें कौड़ियों के दामों पर बिक चुकी हैं। फिर भी उनका ईमानदारी से भरोसा नहीं डिगा नहीं है। वह सब्‍जी मंडी में हमाल बन मेहनत मजदूरी करने को राजी हैं। राहुल्‍या को गरीबी और नाइंसाफी पसंद नहीं। वह भाईगिरी में चला जाता है। राजवीर भी किसी किसान का बेटा है, वह मगर ईमानदार पुलिस बनता है। राहुल्‍या रॉबिनहुड टाइप का है। बेईमानी से पैसे कमाओ, पर जरूरतमंदों की मदद करता है। उसकी इस अदा पर हीरोइन मंदा(महिमा मकवाना) फिदा होती है। अंत में आखिरकार उसके आतंक की जीत होती है या कानून व्‍यवस्‍था की, वह इसकी कहानी है।

राहुल्या के किरदार में वास्तव के संजय दत्त की छाया

फिल्‍म को महेश मांजरेकर ने डायरेक्‍ट किया है। इसमें राहुल्‍या के किरदार पर ‘वास्‍तव’ में संजय दत्‍त के रघु की छाया है। बतौर राजवीर सलमान ने अपनी इमेज बदली है। वो सीरियस सरदार कॉप हैं। उन्‍होंने चुलबुल पांडे का चोला उतारा है। राहुल्‍या बने आयुष का फिजि‍कल ट्रांसफॉर्मेशन कमंडेबल है। हाड़ तोड़ एक्‍शन कोरियोग्राफी और उन्‍हें सपोर्ट करने वाले बैकग्राउंड स्‍कोर डिसेंट हैं। दोनों कलाकारों ने अपने एंड से प्रयास किया है कि दर्शकों को एक प्रॉमिसिंग मास फिल्‍म दी जाए, पर असल में वह आस अधूरी रह जाती है। कारण इसकी पैकेजिंग और डिजायनिंग है। इसे देख लगता है कि एक अर्से से मेकर्स ने ग्राउंड जीरो पर जाकर दर्शकों के मन की बात नहीं जानी है।

वह इसलिए कि फिल्‍म की रायटिंग, ट्रीटमेंट और प्रेजेंटेशन उस जमाने की है, जि‍से गुजरे 20 से 22 साल हो चुके हैं। इसमें यकीनन किसानों की बदतर हालत को बयान किया गया है, मगर स्‍क्रीनप्‍ले न एंगेज, न सरप्राइज और न इंप्रेस कर पाती है। एक भी ऐसे डायलॉग नहीं, जो याद रह जाएं। सलमान खान, मिलाप झावेरी या जॉन अब्राहम जैसे कलाकारों, फिल्‍मकारों को मास फिल्‍मों की अपनी परिभाषा, व्‍याकरण और हिसाब किताब को बदलना चाहिए, वरना वो उसी घिस चुके फॉर्मूले के दोहराव के शिकार होते रहेंगे।

अदाकारी के लिहाज से सलमान, आयुष, महिमा मकवाना, सचिन खेडेकर, जीशू सेनगुप्‍ता, शयाजी सेनगुप्‍ता अपने किरदार में रहें हैं। महिमा अपनी स्‍क्रीन प्रेजेंस और अदायगी से इंप्रेस करती हैं। उनके बेवड़े पिता का रोल महेश मांजरेकर ने प्‍ले किया है, जो दबंग में सोनाक्षी के पिता के रिपीट टेलीकास्‍ट लगे हैं। बाकी ज्यादातर कलाकार खानापूर्ति करते नजर आते हैं। कहानी की तरह इसके गाने भी बेअसर हैं। सलमान के हार्डकोर फैंस भी उनसे चाहेंगे कि उन्हें एंगेज करने के लिए सलमान खान मसाला सिनेमा की अपनी पिछली लर्निंग्‍स को अनलर्न करें। कुछ नया लेकर आएं। वह यकीनन एक्‍सेप्‍टेबल होगा।

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