पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

फिल्म रिव्यू-14 फेरे:कहानी स्लो, पर क्लाइमैक्स दमदार: कट्‌टरपंथी कास्ट को आईना दिखाती है विक्रांत-कीर्ति की फिल्म

2 महीने पहलेलेखक: उमेश कुमार उपाध्याय
  • कॉपी लिंक
  • स्टार- विक्रांत मैसी, कीर्ति खरबंदा, गौहर खान, जमील खान, विनीत कुमार, यामिनी दास, प्रियांशु सिंह, सुमित सूरी, सोनाक्षी बत्रा
  • निर्देशक- देवांशु सिंह
  • अवधि- 1 घंटा, 52 मिनट
  • प्लेटफॉर्म- जी5
  • रेटिंग्स -2.5/5 (ढाई स्टार)

कहावत तो सुनी होगी कि एक झूठ को छिपाने के लिए और 100 झूठ बोलने पड़ते हैं, यही फिल्म 14 फेरे की कहानी शुरू होने से लेकर क्लाइमैक्स के पहले तक चलता है। इसके क्लाइमैक्स में एक संदेश मिलता है कि झूठी शान में नहीं, बल्कि वास्तविकता में जीना चाहिए।

ऐसी है 14 फेरे की कहानी
फिल्म की शुरुआत थिएटर में काम कर रहे संजय लाल सिंह (विक्रांत मैसी) और उनकी मां जुबिना (गौहर खान) के बीच संवाद से होती है। संवाद के दौरान संजय अपने आपको गोली मार लेता है। मां रोती-बिखलती है, तभी संजय का फोन बजता है और वह स्टेज छोड़कर चला जाता है। आगे चलकर संजय को अपने साथ काम करने वाली लड़की अदिति (कीर्ति खरबंदा) से प्यार हो जाता है। लेकिन दोनों की शादी में अड़चनें तब आती हैं, जब इनके घरवाले अलग-अलग कास्ट के होते हैं।

इसके चलते दोनों कभी घर से भागने तो कभी नकली मां-बाप और बाराती को जुटाकर शादी करने का ढोंग रचते हैं। इस दौरान सच्चाई खुलने और उसे ढंकने की एक के बाद एक नाकामयाब कोशिश चलती रहती है। कहानी तक दिलचस्प मोड़ लेती है, जब एक-दूसरे के परिवार आमने-सामने होते हैं। संजय और अदिति की शादी में क्या-क्या बखेड़े होते हैं, शादी हो पाती है या नहीं, यह जानने के लिए फिल्म देखने पड़ेगी।

एक्टिंग और फिल्म का क्लाइमैक्स जान
फिल्म से जुड़े कलाकारों की अदाकारी की बात करें, तब कहानी के मुताबिक विक्रांत, कीर्ति, गौहर सहित जमील खान, विनीत कुमार, यामिनी दास, प्रियांशु सिंह आदि सबने ठीकठाक एक्टिंग की है। सभी अपनी किरदार में जंच भी रहे हैं। हां, दुल्हन के भेष में कीर्ति गजब लग रही हैं। देवांशु का निर्देशन काबिल-ए-तारीफ है, क्योंकि मनोरंजन के आईने से फिल्म देखी जाए, तब कहीं कोई ओवर एक्टिंग करता नहीं दिखाई देता।

हां, कहानी की शुरुआत ठीक-ठाक होती है, लेकिन आगे चलकर जिस तरह दो-दो शादी रचाने का ढोंग संजय और अदिति करते हैं, वहां कहानी और कुछ पात्रों को समझने के लिए दिमाग पर जोर डालना पड़ता है। कहानी भी धीरे-धीरे आगे बढ़ती है, लेकिन पूरी फिल्म में क्लाइमैक्स जान डाल देता है।

क्लाइमैक्स के बारे में बताने पर फिल्म देखने का मजा किरकिरा हो जाएगा। लेकिन यह कट्‌टरपंथी कास्ट को एक आईना दिखाने की सीख जरूर देता है। पारिवारिक, सामाजिक ड्रामा जोनर की फिल्म देखने में रुचि रखने वाले इसे देख सकते हैं।

खबरें और भी हैं...