नौशाद का जन्मदिन:पिता ने म्यूजिक से दूर करना चाहा तो नौशाद ने छोड़ दिया था घर, मुंबई में फुटपाथ पर सोए और संघर्ष से बने 'संगीत सम्राट'

5 महीने पहले
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संगीत को अपने हुनर से सजाने वाले नौशाद बॉलीवुड का सबसे कीमती रत्न रहे हैं। उन्हें बचपन से ही संगीत से प्रेम था। मगर धार्मिक पाबंदियों के चलते उनके पिता ने उन्हें विकल्प दिया था कि अगर वो घर पर रहेंगे तो उन्हें अपना 'संगीत प्रेम' त्यागना पड़ेगा। 25 दिसंबर, 1919 को जन्मे नौशाद ने संगीत की तालीम उस्ताद गुरबत अली, उस्ताद यूसुफ अली, उस्ताद बब्बन साहेब से ली।

19 साल की उम्र में आ गए थे मुंबई

1937 में नौशाद घर से भागकर मुंबई चले गए। मुंबई आने के बाद वे कुछ दिन अपने एक परिचित के पास रुके, उसके बाद वे दादर में ब्रॉडवे थिएटर के सामने रहने लगे। नौशाद की जिंदगी में एक ऐसा वक्त भी आया जब वे फुटपाथ पर भी सोए। उन्होंने सबसे पहले म्यूजिक डायरेक्टर उस्ताद झंडे खान को असिस्ट किया था और इस जॉब के लिए उन्हें 40 रुपए तनख्वाह मिलती थी।

वे मूक फिल्मों के समय से सिनेमा पसंद करते थे। जल्दी ही कुछ निर्देशकों के साथ समय काम करने के बाद उन्हें 1940 में 'प्रेम नगर' पहली फिल्म मुख्य संगीतकार के रूप में मिली। इसके कुछ समय बाद उनका घर फिर से आना-जाना हो गया, लेकिन उनके पिता इस बात से नाराज थे कि वो संगीत से संबंधित काम करते हैं।

शादी के लिए घरवालों ने बना दिया दर्जी

घरवालों ने जब उनकी शादी करवानी चाही तो परिवार लड़की वालों को ये नहीं बताना चाहता था कि उनका बेटा मुंबई में संगीतकार है। उस समय फिल्मों में काम करना बुरा माना जाता था। ऊपर से उनका परिवार धार्मिक रीति-रिवाजों के कारण इसके और भी खिलाफ था। इसलिए उन्होंने बताया कि नौशाद दर्जी का काम करते हैं और उन्होंने विरोध भी नहीं किया।

शादी के दिन जब उनकी बारात जाने लगी तो बैंड वाले उनकी ही फिल्म 'रतन' के गानों की धुनें बजा रहे थे। कहा जाता है कि उनके ससुर और पिता संगीतकार को उस समय कोस रहे थे, कि फिल्मों में किस तरह का संगीत दिया जाता है। मगर नौशाद ये भी न कह पाए कि ये संगीत उन्हीं ने तैयार किया है। '

इन फिल्मों में दिया म्यूजिक

नौशाद ने 'कोहिनूर' (1960), 'गंगा-जमुना' (1961), 'सन ऑफ इंडिया' (1962), 'लीडर' (1964), 'दिल दिया दर्द लिया' (1965), 'पाकीजा' (1971), 'तेरी पायल मेरे गीत' (1989) सहित कई फिल्मों में संगीत दिया। उन्होंने 2005 में आई फिल्म 'ताज महल: एन इटरनल लव स्टोरी' में आखिरी बार म्यूजिक दिया था। उन्होंने बीआर चोपड़ा की फिल्म 'हुब्बा खातून' में भी संगीत दिया था, हालांकि ये फिल्म कभी रिलीज नहीं हो पाई।

उनको संगीत में एक्सपेरिमेंट करना बेहद पसंद था। उन्होंने 1952 में आई फिल्म 'बैजू बावरा' में क्लासिकल रागों का यूज किया था। संगीत के लिए उन्होंने 1954 में बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर का पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता था।

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