अंग्रेजों की खिलाफत करने वालीं राजलक्ष्मी:हर नाटक के बाद अंग्रेज भेज देते थे जेल, इनकी फिल्म ना देखने के लिए लोगों को डराते थे

2 महीने पहलेलेखक: ईफत कुरैशी

आजादी। ये वो शब्द है जो आपने कई बार सुना होगा, लेकिन इस आजादी को हासिल करने में कई भारतीयों का खूब खून और पसीना बहा। इनमें तीन हिंदी सिनेमा के सितारे भी शामिल थे। नाम है, टीपी राजलक्ष्मी, दीना पाठक और सुबोध मुखर्जी। जहां दीना को अंग्रेजों का विरोध करने पर कॉलेज से निकाल दिया गया, वहीं टीपी राजलक्ष्मी को आवाज उठाने पर 7 बार जेल भेजा गया। सुबोध मुखर्जी को भी स्वतंत्रता सेनानी बनने की भारी कीमत चुकानी पड़ी। आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वाले इन सेलेब्स का संघर्ष लंबा रहा, लेकिन इनका हुनर और कामयाबी का डंका ऐसा बजा कि सालों तक इसका शोर सुनाई देता रहा।

आज आजादी के खास मौके से ठीक पहले अनसुनी दास्तानें में पढ़िए 3 ऐसी हस्तियों की कहानी, जिन्होंने देशप्रेम के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया-

बचपन में शादी हुई, दहेज के पैसे नहीं थे तो ससुराल वालों ने ठुकराया

सबसे पहले बात तमिल एक्ट्रेस टीपी राजलक्ष्मी की…जो आजादी के लिए कई बार जेल गईं। बचपन में दहेज के पैसे नहीं थे तो ससुरालवालों ने घर से निकाल दिया। नाटक कंपनी से जुड़ीं तो इनके हुनर पर लोग सोना-चांदी लुटा दिया करते थे। साउथ की पहली महिला फिल्म डायरेक्टर बनीं और कई जबरदस्त हिट फिल्में बनाईं, अभिनय किया और गाने गाए, लेकिन अफसोस इनका आखिरी समय पाई-पाई को तरसते हुए गुजरा। आइए पढ़ते हैं बुरे बचपन, कामयाबी और आर्थिक तंगी भरी जिंदगी की दास्तान-

मंच पर ब्रिटिशों के खिलाफ आवाज उठाने पर गईं जेल

टीपी राजलक्ष्मी ने मंच को सिर्फ मनोरंजन ही नहीं, बल्कि लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का भी जरिया बनाया और नेशनल कांग्रेस मूवमेंट से जुड़ीं। नाटकों के दौरान टीपी राजलक्ष्मी अंग्रेजों के खिलाफ बयान देतीं और गाने गातीं। इनकी आवाज कई लोगों को आजादी की लड़ाई में जोड़ने का काम कर रही थी, लेकिन इससे राजलक्ष्मी अंग्रेजों की नजर में भी आ रही थीं। एक समय ऐसा भी आया जब हर अंग्रेज विरोधी नाटक के बाद राजलक्ष्मी को जेल भेजा जाने लगा। राजलक्ष्मी अपनी नवजात बच्ची को छोड़कर कई बार देश के लिए जेल गईं और हर बार उनकी नाटक मंडली के लोग उन्हें छुड़वा लाया करते थे।

ब्रिटिशों के विरोध के बावजूद नहीं बदला फैसला

देशप्रेम के लिए राजलक्ष्मी ने इंडिया थाई (Indhiya Thaai) फिल्म बनाई, जिसका हिंदी अर्थ था भारत माता। ब्रिटिशर्स को ये टाइटल इतना खटका कि ब्रिटिश सेंसर बोर्ड ने फिल्म का नाम बदलने की चेतावनी दी और इस पर प्रतिबंध लगाने की खूब कोशिश की, लेकिन राजलक्ष्मी ने टाइटल न बदलने का फैसला किया और उनके खिलाफ जाकर फिल्म रिलीज की। अंग्रेजों के डर से कई जगह फिल्म रिलीज नहीं हुई और डरी-सहमी जनता फिल्म देखने नहीं पहुंची। ये फिल्म फ्लॉप हुई और लाखों का नुकसान हुआ। राजलक्ष्मी को भारी नुकसान तो हुआ, लेकिन उन्होंने अफसोस करने की बजाय इसे देशप्रेम का नाम दिया।

11 नवम्बर 1911। तंजोर जिले के सलियामंगलम गांव में जन्मीं टीपी राजलक्ष्मी की महज 11 साल की उम्र में शादी करवा दी गई थी। गरीब घरवाले जब दहेज के लिए पैसे नहीं जमा कर सके तो ये शादी टूट गई। राजलक्ष्मी को मां के पास भेज दिया गया। जब पिता की मौत हुई तो राजलक्ष्मी पर घर की पूरी जिम्मेदारियां आ गईं। राजलक्ष्मी ने चंद लोगों की मदद से नाटक कंपनी में काम करना शुरू कर दिया। इन्हें नाटकों से इतनी कामयाबी मिली कि नाटक देखने पहुंचे लोग इन पर सोने-चांदी के गहने लुटा दिया करते थे।

कैसे बनीं सिनेमा रानी?

नाटक मंडली का हिस्सा रहते हुए ही राजलक्ष्मी 1931 की फिल्म कालीदास से तमिल फिल्मों में आईं और स्टार बन गईं। डेट्स ना मिलने पर प्रोड्यूसर्स इन्हें फिल्मों में लेने के लिए कई महीनों तक इंतजार किया करते थे। स्टार बनीं तो इन्हें नाम मिला सिनेमा रानी। संघर्षों से ऊपर उठकर राजलक्ष्मी उस जमाने की सबसे अमीर हस्ती थीं, जिनके नाम कई बड़े घर, पैलेस, गाड़ियां और कीमती सामान थे।

बच्ची की जान बचाने के लिए ले लिया गोद

20 साल की उम्र में टीपी राजलक्ष्मी अपने को-स्टार टीवी सुंदरम को दिल दे बैठीं। दोनों ने शादी की। जब बेटे की चाह करने वाले एक दंपती को बेटी हुई तो उन्होंने उसे मारने का फैसला किया। राजलक्ष्मी ने इस बात का विरोध किया और उस बच्ची को घर ले आईं। इसके बाद राजलक्ष्मी ने लड़कियों को जन्म के बाद मार दिए जाने का विरोध शुरू किया और समाज सेवा में जुट गईं। कई लोगों को राजलक्ष्मी ने सहारा दिया और लड़कियों को शिक्षा का अधिकार दिलाने के लिए आवाज बुलंद की।

गरीबी आई तो अवॉर्ड का सोना पिघलाकर किया गुजारा

देखते-ही-देखते राजलक्ष्मी के फिल्मों में लगाए गए सारे पैसे डूब गए और ये कंगाली की कगार पर आ खड़ी हुईं। हालात इतने बदतर हुए कि राजलक्ष्मी आर्थिक तंगी का शिकार हो गईं। अपने बेटे को सोने की अंगूठी पहनाने के लिए इन्होंने अपना अवॉर्ड तक पिघला दिया था। महज 52 साल की उम्र में राजलक्ष्मी का हाइपरटेंसिव स्ट्रोक से निधन हो गया।

ब्रिटिश रूल के खिलाफ आवाज उठाने पर सेंट जेवियर कॉलेज से निकाला गया।

दूसरी कहानी है दीना पाठक की….वही दीना पाठक जो सालों तक हिंदी सिनेमा का जाना-माना चेहरा रहीं। इनकी दोनों बेटियां सुप्रिया पाठक और रत्ना पाठक भी नामी एक्ट्रेस हैं। नाटक के जरिए दीना ने ब्रिटिश नियमों के खिलाफ आवाज उठाई, नतीजा कि उन्हें कॉलेज से ही निकाल बाहर कर दिया गया, लेकिन दीना रुकी नहीं। आइए शुरू करते हैं कहानी…..

4 मार्च 1922 को दीना गांधी का जन्म हुआ, जो शादी के बाद दीना पाठक बनी थीं। दीना को बचपन से ही अभिनय में रुचि थी तो उन्होंने थिएटर ग्रुप जॉइन कर लिया। कम उम्र में ही दीना इंडियन नेशनल थिएटर से जुड़ीं और भवानी थिएटर में शामिल हुईं। आजादी की लड़ाई जारी थी और दीना भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ थीं। वे अपने नाटकों के जरिए लोगों को ब्रिटिशर्स के खिलाफ आवाज उठाने के लिए जागरूक किया करती थीं।

जब दीना का झुकाव स्वतंत्रता संग्राम की तरफ बढ़ा तो उन्हें सेंट जेवियर कॉलेज से निकाल दिया गया। दीना ने कॉलेज तो बदल लिया, लेकिन उनका कॉन्ट्रीब्यूशन अब भी आजादी की लड़ाई में था। दीना की शादी बलदेव से हुई, जिनकी दर्जी की दुकान गेटवे ऑफ इंडिया के पास थी। वो दिलीप कुमार और राजेश खन्ना के लिए कपड़े सिलते थे। थिएटर से दीना फिल्मों में आईं और अपने अभिनय से हर किसी के दिल में बस गईं। इन्होंने अपने करियर में करीब 120 फिल्मों में काम किया, जिनमें से गोल-माल, खूबसूरत सबसे बड़ी हिट रहीं।

स्वतंत्रता सेनानी बनने पर 3 महीने के लिए भेजे गए जेल।

तीसरी कहानी जो आप पढ़ेंगे, वो है सुबोध मुखर्जी की... वही सुबोध जिन्हें शम्मी कपूर और देव आनंद को कामयाबी दिलाने का क्रेडिट दिया जाता है। इनकी दूसरी पहचान है कि ये पॉपुलर फिल्ममेकर शशधर मुखर्जी के भाई हैं। बचपन से फिल्में बनाने का शौक रखने वाले सुबोध अपने सपनों को पूरा करने नहीं, बल्कि मजबूरी में मुंबई पहुंचे, लेकिन टैलेंट के दम पर इन्होंने नामी फिल्ममेकर्स में अपना नाम जोड़ लिया। चलिए तीसरी और आखिरी कहानी शुरू करते हैं…….

14 अप्रैल 1921 को सुबोध का जन्म झांसी में हुआ। पढ़ाई में अव्वल और टेनिस में इनका कोई तोड़ नहीं। टेनिस का शौक पूरा करने के लिए सुबोध झांसी से लखनऊ आ गए। यहां आजादी की लड़ाई लड़ रहे लोगों के बीच उठना-बैठना शुरू किया और खुद भी स्वतंत्रता सेनानी बन गए। 1942 में अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई तो इन्हें जेल भेज दिया गया। तीन महीने तक अंग्रेजों ने इन्हें जेल में रखा। जब घर खर्च चलाने का कोई जरिया नहीं बचा तो सुबोध मुंबई पहुंच गए, जहां इनके बड़े भाई शशधर मुखर्जी फिल्मिस्तान स्टूडियो का हिस्सा थे। सुबोध भी फिल्में बनाने लगे।

सुबोध ने 1955 में फिल्म मुनीमजी से डायरेक्टोरियल डेब्यू किया। ये फिल्म सुपरहिट साबित हुई, जिससे देव आनंद को भी खूब कामयाबी मिली। शम्मी कपूर को स्टार बनाने वाली फिल्म जंगली में भी इन्हीं का निर्देशन था। 70 का दशक आते-आते सुबोध की फिल्में फ्लॉप होने लगीं और उन्होंने 1985 में इंडस्ट्री छोड़ दी। 85 साल की उम्र में 21 मई 2005 को सुबोध का निधन हो गया।

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