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पं. जसराज बर्थ-डे स्पेशल:बापूजी कहते थे मुझे सौ साल उम्र होने की बद्दुआ मत दो, यह दुआ करो कि आखिरी सांस तक गले में सुर रहे: दुर्गा जसराज

मुंबई3 महीने पहलेलेखक: उमेश कुमार उपाध्याय
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  • पं. जसराज की मृत्यु 17 अगस्त 2020 को न्यूजर्सी में 90 साल की उम्र में हुई, मृत्यु के बाद आज उनका पहला जन्मदिन है

भारतीय शास्त्रीय संगीत में पं. जसराज एकमात्र गायक रहे, जिन्हें न सिर्फ भारत सरकार ने पद्मविभूषण से विभूषित किया, बल्कि नासा और इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन ने उनके नाम पर एक ग्रह का नाम पं. जसराज रखा। सुरों के रसराज कहे जाने वाले पं. जसराज ने संगीत की दुनिया को अपने जीवन के 75 साल दिए। शास्त्रीय संगीत का इतिहास पं. जसराज के नाम के बिना अधूरा है। उन्होंने 17 अगस्त 2020 को अमेरिका के न्यू जर्सी में अंतिम सांसें लीं। स्वर्गवास के बाद आज उनका पहला जन्मदिन है। अगर वे होते, तो 28 जनवरी यानी आज उनका 91वां जन्मदिन होता। पं. जसराज के जन्मदिन के मौके पर दैनिक भास्कर ने उनकी बेटी और शिष्या पं. दुर्गा जसराज से बातचीत की। बेटी दुर्गा के शब्दों में पढ़िए, सुरों के सम्राट पं. जसराज के जीवन की खास बातें:

कोई ऐसी बात, जो पंडित जी के जन्मदिन पर हमेशा​​​​​ याद आएगी?
जवाबः उनका जन्मदिन हमेशा बहुत लोगों के बीच में ही मनाया गया है। कभी ऐसा नहीं रहा कि परिवार के साथ या घर के अंदर ही अंदर उनका बर्थडे सेलिब्रेट किया गया हो। हर जन्मदिन पर बाहर गांव से लोग 24 -25 जनवरी से ही मुंबई आना शुरू कर देते थे। कई बार बापूजी 27 जनवरी को पहुंचते थे, लेकिन लोग पहले से ही यहां जम कर बैठ जाते थे। कई बार तो लोगों ने 28 को बहुत बड़े-बड़े प्रोग्राम किए। उनके 60वें जन्मदिन पर बहुत बड़ा प्रोग्राम पुणे में हुआ था।

इसे बापू जी के फैन पंडित जसराज मित्र मंडल, पुणे ने अरेंज किया था। पंडित रविशंकर, पंडित भीमसेन जोशी, पंडित जीतेंद्र अभिषेकी, डॉ. बालामूर्ति कृष्णा, पंडित शिवकुमार शर्मा, पंडित प्रताप नारायण, उस्ताद जाकिर हुसैन आदि आए थे। मुझे याद नहीं कि ऐसा कोई बड़ा कलाकार हो, जो वहां पर न आया हो। इतने भव्य पैमाने पर जन्मोत्सव मैंने किसी कलाकार का देखा ही नहीं है। इस साल पोस्टल डिपार्डमेंट ने बापूजी के नाम पर पोस्टर भी निकाला था।

हर बर्थडे धूमधाम से सेलिब्रेट करते थे। ऐसा कोई सेट पैटर्न नहीं था कि इसी तरह से सेलिब्रेट करेंगे। जैसा भी उनका कमिटमेंट रहता था, उस तरह से मनाते थे। 3-4 साल पहले पीली मंदोरी गांव, हरियाणा में जहां उनका जन्म हुआ था, वहां पर भी बड़े पैमाने पर मनाया गया था। पिछले 10 साल की बात करूं तो दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में धूमधाम से उनका जन्मदिन मनाया गया। कई बार 26 जनवरी को पद्मश्री, पद्मभूषष, पद्मविभूषण अवॉर्ड अनाउंस होने की अच्छी न्यूज आ जाती थी। उसका भी सेलिब्रेशन 28 तारीख को हो जाता था। ये इतनी सारी यादें हैं, जिसे भूल नहीं सकते।

पंडित जी को क्या खास पसंद था, जो जन्मदिन पर करते थे?
जवाबः उनसे जो मिलने आता था, उन सबसे मिलते थे। उन्होंने ऐसा कभी नहीं कहा कि अब थक गया हूं, मुझे और भी काम है। हर एक इंसान से मिलते थे, बैठकर बात करते और खातिरदारी करते थे। उन्होंने कभी किसी का दिल नहीं दुखाया। इतनी बिजी और उम्र होने के बावजूद न कभी थके और न ही आखिर वक्त तक कभी रिटायर हुए। 90 साल की उम्र में भी इतने बिजी थे, जैसे 50-60 साल की लाइफ में थे।

पिछले साल भी जब उनका 90वें बर्थडे मुंबई में मनाया, तब दूसरे दिन सुबह उठकर दिल्ली की फ्लाइट पकड़ ली, क्योंकि प्रधानमंत्री ने बुलाया था। महात्मा गांधी की डेथ एनिवर्सरी पर शांति स्थल पर गाना गाया, जो लाइव टेलिकास्ट हुआ। उसके दो दिन बाद जयपुर में म्यूजिक प्रोग्राम था। एज ए पर्सनालिटी, बिजी रहना उनकी खासियत रही है।

आपका पिता-पुत्री का रिश्ता, गुरु-शिष्या के रिश्ते से कितना अलग था?
जवाबः उनकी बेटी हूं, इसलिए बहुत सारी चीजें उनकी मेरे समझ में आती है और उनके जैसी हूं। मतलब मेरा स्वभाव, बातचीत करने का अंदाज वगैरह। मेरी मां भी कहती हैं कि तुम अपने बाप जैसी हो। मैं समझती हूं कि वे कैसे हैं। लेकिन, मंच पर बैठते ही एक सेकंड में पिता से गुरु हो जाते थे। फिर तो बातचीत करने और देखने का अंदाज सब कुछ बदल जाता था। यह बात बचपन से ही मेरे और मेरे भाई सारंग के दिमाग में एकदम क्लीयर थी। मंच से उतरते ही वे मेरे पिता, दोस्त, मेंटर…सब कुछ हो जाते थे क्योंकि, चेस खेलना, टेबल टेनिस खेलना, हंसी-मजाक हमारे बीच लगातार होता था।

उनकी पांच शिक्षाएं, जिन्हें न सिर्फ अपने जीवन में उतारना चाहेंगी, बल्कि उसे लोगों तक भी पहुंचाना चाहेंगीं?
जवाबः वैसे तो उनसे जीवन भर ही सीखा है। लेकिन, खास 5 गुरु मंत्र जो सीखें हैं, वे ये हैं।
पहला- नो रिटायरमेंट। वे कभी रिटायर नहीं होना चाहते थे। 90 साल की उम्र में भी लगातार म्यूजिक ट्रैवल कर रहे थे। अपने शिष्यों को गाना सिखा भी रहे थे। हर कलाकार कभी न कभी रिटायर हो जाता है। पिछले पांच-दस सालों से जन्मदिन या प्रोग्राम वगैरह में लोग कहने लगे थे कि पंडित जी आप शतायु हों लेकिन, वे कहते थे कि शतायु होने की बद्दुआ मत दो, यह दुआ करो कि आखिरी सांस तक गले में सुर रहे। उनकी इस इच्छा को ईश्वर ने पूरा किया।

दूसरी- डाइट डिसिप्लिन। बचपन से डाइट को लेकर बहुत डिसिप्लिन रखते थे। उन्होंने कभी सिगरेट, शराब, तम्बाकू, ड्रग्स आदि की लत नहीं लगाई। खाने-पीने में भी बड़ी डिसिप्लिन रखते थे। कभी किसी के बहकावे में नहीं आए कि मीठा पसंद है, तब ज्यादा मीठा खाता हूं। डाइट पर इतना नियंत्रण रखते थे, जैसे योगी का होता है। इसकी वजह से उनकी सांस कभी फूली नहीं और न ही गाते वक्त वे कभी हांफे। गाने से लेकर उठने-बैठने में कभी किसी को पता ही नहीं चला कि वे 90 साल के हो गए। उनका कहना था कि डाइट पर कंट्रोल होता है, तब आपके गले, माइंड और पूरे बॉडी पार्ट पर कंट्रोल रहता है। उनकी इच्छा थी कि स्टेज पर हमेशा पालथी मारकर बैठूं। वह कभी पैर नीचे करके नहीं बैठे।

तीसरी - त्याग। आखिर समय तक वे कभी घर पर नहीं बैठे। जब दुनिया छोड़े, तब अमेरिका में थे। उनके नाम पर वहां सात-आठ ट्रूप थे। न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, टेंपा फ्लोरिडा, टोरंटो, अटलांटा आदि जगहों पर उनके स्कूल चलते हैं, जहां पर जाकर सिखाते थे। उन्होंने सिखाने के लिए न तो अमेरिका और न ही इंडिया में कभी पैसा लिया। जब उनकी आमदनी कुछ भी नहीं थी, एकदम फक्कड़ गिरधारी थे, तब भी विद्या दान के लिए पैसा नहीं लिया। आखिरी सांस तक विद्या दान किया।

ऐसा करने के लिए बहुत बड़ा जिगर चाहिए। एक वक्त ऐसा भी था कि पैसे देने लिए लोग पागल थे। बड़े-से-बड़ा चेक दे रहे थे। थाल के थाल भरकर पैसे दे रहे थे। लेकिन, बापूजी ने वापस कर दिया। यह मैंने खुद अपनी आंखों देखा है। वे कहते थे- अगर गाना सिखाना है, तब उसके पैसे नहीं लूंगा। हां, प्रोग्राम करेंगे तो जरूर लूंगा, क्योंकि वह मेरा प्रोफेशन है। लेकिन, विद्या दान के लिए एक पैसा नहीं लूंगा। दोनों बातें गाने से ही जुड़ी हैं, लेकिन दोनों के बीच उन्होंने एक लकीर खींच रखी थी।

चौथा- कमिटमेंट। कभी प्रोग्राम कैंसिल नहीं किया। कई बार तबीयत ठीक न होने पर भी प्रोग्राम किया है। डॉक्टर आराम करने की सख्त हिदायत देते थे, तब उनसे कहते थे कि प्रोग्राम करने के बाद आराम कर लूंगा, लेकिन प्रोग्राम करने की इजाजत दे दीजिए। एक-दो बार तो हॉस्पिटलाइज थे। तब डॉक्टर से बोले- आप मेरे साथ स्टेज पर बैठ जाना। अगर मुझे कुछ हुआ तो देख लेना। लेकिन, एक दिन गाने की इजाजत दे दीजिए। उन्होंने डॉक्टरों को बहुत मनाया। उनसे कहा- मेरा लोगों के साथ कमिटमेंट है। अगर गाना नहीं गाया, तब ऑर्गेनाइजर मर जाएगा, क्योंकि उसके पैसे लगे हैं।

उनकी बात से डॉक्टर मजबूर हो गए। फिर तो बगल में डॉक्टर को स्टेज पर बैठाकर डेढ़-डेढ़ घंटे का दो पार्ट में प्रोग्राम किया। यह बात एक-दो बार अमेरिका में ही नहीं, इंडिया में भी हुई है। लेकिन, उन्होंने कभी बहानेबाजी नहीं की। उनका कमिटमेंट अलग लेवल का होता था। फिजिकल तकलीफ सहकर भी प्रोग्राम करके लोगों को खुश रखते थे। इस बात पर लोग रोए भी हैं। लेकिन, पंडित जी ने कहा कि अगर आपको गाना अच्छा नहीं लगा, तब रोइए। अगर अच्छा लगा, तब मत रोइए।

पांचवां- क्लीन ड्रेसअप। हमेशा कहते थे कि कपड़ों को इज्जत दोगे, तब कपड़ा तुम्हें इज्जत देगा। साफ-सफाई से रहना बहुत पसंद करते थे। जब उनके पास एक ही धोती होती थी, तब नहाने के बाद गमछा पहनकर धोती को सुखाते थे। तब तक वे अंदर ही बैठे रहते थे। सूखने के बाद पहनकर बाहर जाते थे। यह शादी के पहले की बात है और काफी लंबे समय तक यही हाल था। खैर, इसका मतलब यह था कि अगर गरीब हो तो ठीक है, लेकिन साफ-सुथरे कपड़े पहनो और लोगों के सामने खुद को अच्छे से पेश करो। अगर खुद को बेचारा दिखाओगे, तो लोग भी मिलना नहीं चाहेंगे।

उन्होंने घनघोर मेहनत की है। पांच से सात घंटे खुद रियाज करते थे, उसके बाद लोगों को सिखाते थे। उसमें भी एक अलग तरह का रियाज होता था। कुल मिलाकर 18-18 घंटे, 20 घंटे संगीत में बिताते थे। इतने बड़े-बड़े कलाकार हुए, लेकिन पं. जसराज की शिष्य मंडली बहुत बड़ी खड़ी हुई। पिछले पचास साल में इतनी बड़ी शिष्य मंडली किसी ने नहीं खड़ी की। उनके 15-20 शार्गिद एकदम प्रोफेशनल सिंगर्स-म्यूजिशियन​​​​​​ हो गए। उन्होंने भी अपने नीचे तमाम लोगों को सिखाया।

आपने बताया कि एक समय उनके पास सिर्फ एक धोती थी। फिर तो खाने-पीने की भी दिक्कत रही होगी?
जवाबः आप सोच सकते हैं कि जब कपड़े नहीं थे तो उस वक्त खाने-पीने की स्थिति क्या रही होगी। मेरी मां वी. शांताराम की बेटी हैं। वे बताती थीं कि वे नाना के घर जिस कलर की साड़ी पहनती थीं, उसी कलर की गाड़ी से जाती थीं। उस माहौल से निकलकर उन्होंने ऐसे कलाकार से शादी की। उन्होंने ही क्या, बापूजी भी बताते थे कि हम लोग एक टाइम खाना खाते थे, तब पता नहीं होता था कि अगला भोजन कब मिलेगा। इस स्थिति से दोनों गुजरे हैं।

खैर, मैं दोनों को जहां तक जानती हूं, उन्होंने कॉमर्शियल सक्सेस के लिए गाना नहीं गाया। मेरी मां ने कभी उनके ऊपर इस बात का जोर भी नहीं दिया। उन्होंने कभी नहीं कहा कि जसराज जी, घर में खाना नहीं है और तुम फ्री में लोगों को सिखा रहे हो। कभी एक बार भी नहीं। लाइफ पार्टनर ऐसी थीं कि कभी मनोबल नहीं टूटने दिया। वे मनोबल बढ़ाती थीं। खैर, कई वर्षों तक यही हाल रहा, फिर आहिस्ता-आहिस्ता हालात सुधरने लगे। फिलहाल ये सारी बातें और किस्से प्रेरित करते हैं कि अगर आप मेहनत करते हैं, तब सारी चीजें साकार होती चली जाती हैं।

उन्होंने इंटरव्यू में कभी नहीं कहा कि संगीत के अलावा किसी अन्य क्षेत्र में जाना चाहते थे। क्या इस बारे में आपसे कुछ कहा?
जवाबः नहीं, कभी नहीं। लेकिन इंडिया-पाकिस्तान का वॉर के टाइम पर जब कभी प्रोग्राम कैंसिल हो जाता था। तब कहते थे कि अब हमारा प्रोग्राम कौन सुनेगा, चलो बटाटा-वड़ा की गाड़ी लगाते हैं, उसे तो लोग खाना बंद नहीं करेंगे। मगर यह मस्ती-मस्ती में कहते थे। मुझे नहीं लगता है कि उनके दिमाग में और कोई प्रोफेशन करने का ख्याल भी रहा होगा।

उन्हें स्पोर्ट्स का बहुत शौक था। खासकर क्रिकेट पहले नंबर पर और टेनिस दूसरे नंबर पर पसंद था। वैसे चेस, टेबल टेनिस भी खेलते थे। अकेले में चिंतन-मनन उनके दिमाग में चलता रहता था। स्पोर्ट्स का शौक था, लेकिन उन्होंने कभी नहीं कहा कि इसे प्रोफेशन के तौर पर भी अपना सकता हूं।

पंडित जी के कुल कितने स्कूल चल रहे हैं?
जवाबः अमेरिका में सात-आठ हैं। मुंबई में है, केरल में चार-पांच हैं और भी कई जगहों पर हैं। मैंने कभी इसकी गिनती नहीं की है। मुझे लगता है कि कुल 20-25 स्कूल होंगे। उनके नाम से न्यूयॉर्क, यूएस, औरंगाबाद, हैदराबाद, पीली मंदोरी में ऑडिटोरियम है। इसके अलावा उनके नाम से कई अवॉर्ड भी दिए जाते हैं।

उनके नाम पर तो अंतरिक्ष में एक ग्रह का नाम भी है।
जवाबः जी हां, उनके नाम पर नासा और इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन ने एक ग्रह का नाम पं. जसराज रखा है। उसका अंक पंडित जी के बर्थडे के अंक से उल्टा है यानी 300128 है। बापूजी का जन्म 28-01-30 (1930) को हुआ था। उनके नाम पर कई पार्क आदि भी हैं।

इतने ऊंचे स्थान पर पहुंचने के बाद म्यूजिक और लोगों को देखने का उनका नजरिया कैसा होता था?
जवाबः इंसान को इंसान के रूप में देखते थे। मन में कभी विचार नहीं लाते थे कि यह कुछ और है, मैं कुछ और हूं। बहुत हम्बल थे। इतने हम्बल कि मुझे अभी भी समझ में नहीं आता। मगर थे, यह उनकी इच्छा थी। उनको ऐसा लगता था कि मैं तो कुछ भी नहीं हूं, यह सब कुछ ईश्वर की इच्छा से है, जो हो रहा है, वह हो रहा है। कहते थे, मैं ही क्या, ये पूरी दुनिया जानती है।

संगीत को देखने का नजरिया ऐसा था कि उनके ही शब्दों में कहूं तो पिछले 20 सालों से यही कहने लग गए थे कि मुझे तो कुछ भी नहीं आता। न तो मैं गाता हूं, न तो आप सुनते हैं, गाने वाला भी वह है, सुनने वाला भी वह है, सुनाने वाला भी वह है, मुझे तो कुछ भी नहीं आता। उन्हें कभी घमंड ही नहीं था।

उनकी लाइफ स्टाइल के बारे में कुछ बताइए?
जवाबः न तो वे शराब पीते थे, न ही तम्बाकू-सिगरेट। खाने पर बड़ा नियंत्रण था। तली-भुनी चीजें नहीं खाते थे, नमक कम खाते थे। वेजिटेरियन थे। दाल-चालव, रोटी के अलावा लौकी का सूप, गाजर का सूप आदि खाते-पीते थे। आखिर तक ये सब बरकरार रहा। उनकी लाइफ का एक पार्ट जिम भी है।

हम जब मुंबई में होते थे, तब साथ में जिम जाते थे। अमेरिका में एक जिम में उनकी लाइफ मेंबरशिप थी, मगर उनको वहां पर ज्यादा अच्छा नहीं लगता था। क्योंकि वहां पर सारी चीजें मशीन के जरिए होती थीं, कोई ह्यूमन विंग ट्रेंड नहीं करता था। इंडिया में ट्रेनर या फिजियोथेरेपिस्ट साथ में रहते हैं, इसलिए यहां अच्छा लगता था।

पिताजी को गिफ्ट या पार्टी दी हो, तो वे भावुक हो गए हों, क्या ऐसा कभी हुआ?
जवाबः मुझे पता था कि उन्हें गाड़ियों का बहुत शौक था। उन्होंने अच्छी गाड़ियां ली थीं, लेकिन लग्जरी गाड़ियां नहीं ली थीं। मैं जब कमाने लग गई, तब सबसे पहले उनको गिफ्ट में होंडा, फिर सोनाटा, उसके बाद मर्सडीज, बीएमडब्ल्यू और फिर एसयूवी दी। लेकिन, जब पहली बार उन्हें होंडा गिफ्ट की, तब दो-तीन दिन मुझसे बात ही नहीं की। मैंने पूछा, बापूजी क्या हो गया। आप बात ही नहीं कर रहे हैं। बोले- मैं यह सोच रहा हूं कि इसकी ईएमआई तुम भर पाओगी न?

मैंने कहा कि अगर गिफ्ट दिया है, तब ऊपर वाला मेरे लिए रास्ता खोल देगा। बाद में सोनाटा दी, तब उन्हें ठीक लगा। लेकिन, जब बीएमडब्ल्यू दिया, तब फिर सोच में पड़ गए। खैर, हर बार गाड़ी का सरप्राइज होता था। फिर तो उन्हें लगने लगा कि आगे भी गाड़ी ही देगी। मैं कहती थी कि बापूजी आपके लिए कुछ लेकर आई हूं। पलटकर कहते थे कि गाड़ी लेकर आई है। मैं कहती थी कि नहीं, इस बार कुर्ते का जैकेट लेकर आई हूं। फिर कहते थे कि तब तो ठीक है। तुम गाड़ियां लाती हो, तब मुझे बड़ा टेंशन होता है। लेकिन, जब उनके पास गाड़ियां आती थीं, तब बहुत खुश भी होते थे।

लॉकडाउन के दौरान पंडित जी से क्या बातें हुईं?
जवाबः हां, उस दौरान वे अमेरिका में थे, तब उन्हें बताया कि बापूजी 22 मार्च से इंडिया में लॉकडाउन शुरू हो रहा है। उन्होंने कहा- अपने मनोबल को इतना बढ़ाओ कि दुनिया से खुशियां छीनकर ले आओ। उसी दिन मैंने रातोंरात कहा कि कल से सोशल मीडिया पर शो शुरू कर रही हूं। जब से वह शो शुरू हुआ तो आज की तारीख में पांच मिलियन लोग जुड़ गए हैं।

खैर, पं. जसराज के जन्मदिन पर पूरा एक सप्ताह महा-उत्सव होगा और इसे स्पॉन्सर करने एलआईसी आ गया है। यह संयोग की बात है, क्योंकि लंबे समय से कोशिश कर रही थी कि कोई आ जाए। पीली मंदोरी, इंदौर, अमेरिका, हैदराबाद आदि जगहों पर लोग अपने-अपने तरीके से उनका जन्मदिन मना रहे हैं।

उनके जीवन में सबसे रोचक क्या था, इस बारे में कुछ बताइए?
जवाबः रोचक बात क्या बताऊं? उनका हर दिन बहुत हेक्टिक होता था। आज अमिताभ बच्चन को देखकर लोग कहते हैं कि बड़ा हेक्टिक शेड्यूल है। लेकिन, 90 साल की उम्र में पं. जसराज का उतना ही हेक्टिक शेड्यूल रहा है। कभी अमेरिका, कभी कनाडा तो कभी दुबई में होते थे। जब 89 साल के हुए थे, तब अमेरिका से सीधे घर न आकर कोलकाता में लैंड किए थे।

वहां दो दिन का प्रोग्राम करने के बाद मुंबई आए। ऐसा कभी नहीं कहा कि घर पर आराम करूंगा, फिर प्रोग्राम करूंगा। हमेशा कट-टू-कट शेड्यूल रखते थे। उनके बर्थडे के बाद हम चार-पांच दिन की छुट्‌टी लेते थे। लेकिन, वे कभी छुट्‌टी नहीं लेते थे।

धरती से लेकर आसमान तक पंडित जी का नाम था। फिर भी क्या उन्हें किसी बात का रंज रहा?
जवाबः इंसान को रंज होना स्वाभाविक है। इसमें कोई अपवाद नहीं है कि उनको कोई रंज नहीं था, लेकिन उसको लेकर बैठे नहीं रहते थे। उसे सकारात्मक रूप में ढालने की कोशिश करते थे। उन्होंने सीख दी है कि अगर तुम्हें दुःख है, तब उसे दूर करने का उपाय भी तुम ही करो। उसे ऐसा मोड़ दो कि लोग देखते रह जाएं। लोगों से ज्यादा अपनी आत्मा की खुशी के लिए करो।

रंज के पीछे उनका यह नजरिया रहा है कि अगर तुम दुःखी हो, तब उसके लिए तुम ही कुछ सोचो कि क्या कर सकते हो। उनकी यह सीख मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी सीख है। इसके लिए मैं सदैव नतमस्तक रहूंगी। एक बार उन्होंने कहा था कि अगर मेंटल बैलेंस सही होगा, तब बॉडी का बैलेंस अपने आप सही रहेगा। यह लाइफ में फिजिकली चलने की बात नहीं है। उनकी वन लाइनर बातों का बड़ा गहरा अर्थ होता था।

पंडित जी का कोई ऐसा सपना, जो अधूरा रह गया हो?

जवाबः उन्होंने अपनी जिंदगी बहुत कंप्लीट तरीके से जी है। अगर कोई सपना अधूरा रहा होगा, तब उसके बारे में कभी किसी को बताया नहीं। क्योंकि, वे हमेशा लोगों को खुशियां देने के बारे में सोचते थे। उनका ऐतिहासिक जीवन रहा। बहरहाल, बता दूं कि 47 ‌‌वर्षों से लगातार पं. जसराज हैदराबाद में 30 नवंबर को चार-पांच दिन का प्रोग्राम करते रहे, क्योंकि उनके पिताजी का स्वर्गवास हैदराबाद में हुआ था। दरअसल, उनके पिताजी को पगड़ी कोर्ट म्यूजिशियन बनने के लिए पांच बजे पगड़ी पहनाई जाने वाली थी, लेकिन दिन में 11-12 बजे ही उनका देहांत हो गया। उस समय पं. जसराज चार साल के थे। पिताजी को लेकर उनकी याद हमेशा हैदराबाद से जुड़ी रही।

यही वजह है कि 47 साल तक हैदराबाद और उसके आसपास फ्री में प्रोग्राम करते रहे। साल 2020 से 48वें वर्ष से इस परंपरा को उनका आदेश और सपना मानते हुए आगे बढ़ा रही हूं। इस बार आठ म्यूजिशियंस ने ढाई घंटे तक लाइव परफॉर्मेंस दी। इसे तेलंगाना गवर्नमेंट ने सपोर्ट किया। ऑनलाइन इसे छह करोड़ लोगों ने देखा। इसे पंडित जी की इच्छा ही मानती हूं। आगे भी उनकी ये इच्छा पूरी करती रहूंगी।

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