पापा का अंतिम संस्कार करने तक के पैसे नहीं थे:एक्टिंग के लिए छोड़ी 50 लाख की नौकरी, ऑडिशन देने 50 KM पैदल जाता था

2 महीने पहलेलेखक: अरुणिमा शुक्ला
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‘पापा के निधन से मैं पूरी तरह से टूट गया था। एक वो ही थे, जिन्होंने मेरे सपनों को समझा। हर कदम पर मेरे साथ खड़े रहे। मेरे पास इतने भी पैसे नहीं थे कि मैं उनका अंतिम संस्कार कर सकूं। ये सब मेरी बेवकूफियों का ही नतीजा था। आखिरकार, मुझे अपने दोस्तों से पापा के अंतिम संस्कार के लिए पैसे मांगने पड़े। ये मेरी जिंदगी का सबसे खराब पल था। आज भी जब इस घटना को याद करता हूं, तो सिहर जाता हूं।’

ये कहना है सानंद वर्मा का, जो पिछले 5 साल से फेमस टीवी शो ‘भाबी जी घर पर है’ में अनोखे लाल सक्सेना की भूमिका निभा रहे हैं। सानंद आज नामी स्टार हैं। टीवी शो के साथ-साथ सेक्रेड गेम्स, अपहरण, गिल्टी माइंड्स जैसी वेब सीरीज और छिछोरे, रेड और मर्दानी जैसी फिल्मों का हिस्सा रहे हैं। कड़ी मेहनत के दम पर सानंद ने ये मुकाम तो हासिल कर लिया, लेकिन उनका यहां तक का सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। पर्दे पर अपने चुलबुलेपन से सबको हंसाने वाले सानंद को संघर्ष की कई बेड़ियों को तोड़ना पड़ा था।

आज की स्ट्रगल स्टोरी में जानते हैं सानंद वर्मा के संघर्ष की दास्तां उन्हीं की जुबानी….

मेरा जन्म पटना में हुआ था। मैं मां-बाप की पहली संतान था। कुछ सालों बाद मेरी छोटी बहन का जन्म हुआ। पापा साहित्यकार थे, बड़ी-बड़ी कवि गोष्ठियों में जाया करते थे, लेकिन वो इतने फक्कड़ किस्म के आदमी थे कि उन्हें पैसे कमाना नहीं आता था। उनका प्रिंटिंग प्रेस भी था, जहां वो खुद लिखी हुई कृतियों को छापते थे।

मेरे जन्म के बाद पूरा परिवार दिल्ली आकर रहने लगा था। पापा अपनी इसी कला से थोड़ी-बहुत कमाई कर लेते थे। जब मैं सात साल का हुआ था तो पूरा परिवार पटना वापस आ गया, लेकिन यहां आने के बाद बचपन क्या होता है, मुझे पता नहीं चला। पटना आने से पहले की जिंदगी के वो 7 साल ही थे, जिसे मैं कह सकता हूं कि मैंने बचपन जिया है।

पापा अपनी साहित्य कला से इतने पैसे नहीं कमा पाते थे कि परिवार का भरण-पोषण हो सके, इसलिए उन्होंने गांव में खेती करनी शुरू कर दी। 8 साल की उम्र में उनके इस काम में मैं भी हाथ बंटाता था। भरी दोपहर में मोटे-मोटे गट्ठर सिर पर रखकर ले जाया करता था।

दिन भर पापा के साथ खेती में लगा रहता। इस वजह से मेरा कोई दोस्त नहीं था, जिसके साथ मैं खेल सकूं। काम करने के बाद सीधे घर जाता, खाना खाता और बिस्तर पर लेट जाता। लेटते ही मेरी आंख लग जाती थी क्योंकि दिन भर की थकान ही इतनी ज्यादा रहती।

कुछ समय बाद पापा ने खेती छोड़ दी। किताब छापने और बेचने का काम शुरू किया। पापा किताबें छापते थे, मैं उन्हें झोले में ले जाकर आसपास के शहरों-कस्बों में बेचता था। ना साइकिल, ना कोई साधन, किताबें बेचने भी मुझे पैदल ही जाना पड़ता। तभी से मुझे कई किलोमीटर पैदल चलने की आदत हो चुकी थी।

10 से 15 रुपए की कमाई इससे होती थी। जिस दिन 20-30 रुपए कमाता, उस दिन परिवार वालों को ये उम्मीद हो जाती थी कि आज घर में दाल-चावल और पूरा खाना बनेगा। वर्ना रोटी- सब्जी, रोटी-दाल या रोटी-अचार खाकर गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो मुझे भूखा भी सोना पड़ा।

इतनी दिक्कतों के बावजूद मैंने पढ़ाई पूरी की। कई बार ऐसा भी हुआ कि पैसे नहीं थे तो स्कूल फीस नहीं भर पाए, स्कूल ने मेरा और मेरी बहन का रिजल्ट ही रोक दिया। दसवीं की पढ़ाई के दौरान मैं दिन भर जगह-जगह जाकर किताबें बेचता था और फिर देर रात एग्जाम की तैयारी करता था। जब मैंने दसवीं की परीक्षा दी, तब 500 में से उन 50 बच्चों में मेरा नाम था जो पास हुए। शायद मेरी मेहनत और ऊपरवाले का आशीर्वाद ही था कि बिना क्लास अटैंड किए मैं पास हो गया।

इस पढ़ाई और कमाने के बीच एक दूसरी चीज भी थी, जिसे लेकर मैं थोड़ा जुनूनी था, वो थी एक्टिंग और फिल्मों से प्यार। पापा को भी फिल्में देखने का बहुत शौक था। शौक ऐसा कि पैसे नहीं होने के बावजूद वो पड़ोसी से उधार लेकर पूरे परिवार को पिक्चर दिखाते थे। इन्हीं सब चीजों की वजह से मैं भी एक्टर बनना चाहता था।

देव आनंद का बहुत बड़ा फैन था। गर्मियों में भी शर्ट का कॉलर बटन लगाकर रखता था। दसवीं की पढ़ाई के दौरान मैंने कालिदास रंगालय में दो नाटक किए थे। इनमें से एक नाटक ‘धूप और छांव’ था। गानों का भी मुझे शौक था। पापा इन आदतों से खफा नहीं होते थे, बल्कि मुझे बहुत प्रोत्साहित करते थे।

अपने दोस्तों के सामने मुझे गाने के लिए कहते थे, फिर सराहते थे। गरीबी ज्यादा थी, परिवार का पेट पालना मेरी ही जिम्मेदारी थी, क्योंकि पापा की उम्र ज्यादा थी। इसी वजह से उस समय मैं एक्टिंग में आने की सोच नहीं सकता था। सपनों पर मैंने विराम लगा दिया और दसवीं की तरह ही मैंने 12वीं की पढ़ाई भी पूरी की।

12वीं के एग्जाम के बाद फिर से मेरा पूरा परिवार दिल्ली शिफ्ट हो गया। यहां मैंने अपनी मेहनत के दम पर दिल्ली यूनिवर्सिटी से डिस्टेंस लर्निंग के जरिए कोर्स किया। घर की माली हालत खराब थी, जिस वजह से यहां पर भी मुझे पढ़ाई के साथ काम करना पड़ा। गुजारे के लिए मैंने एक न्यूज पेपर में काम किया। वहां पर मेरा काम प्रूफ रीडिंग करने का होता था, लेकिन पहले तो मेरी वो नौकरी अस्थाई थी। हालांकि मेरा काम अच्छा था, इस वजह से काफी दिनों तक मैंने वहां काम किया। इसके बाद कई बड़े मीडिया संस्थान में काम किया।

मैं जो कमाता था, उसमें से कुछ बचा नहीं पाता था। सेविंग करने की मेरी आदत नहीं थी। इसी दौरान पापा की हार्ट अटैक से मौत हो गई, अंतिम संस्कार के लिए मुझे दोस्तों के सामने हाथ फैलाने पड़े। हालांकि, उनकी मौत के बाद भी सेविंग नहीं कर पाया। इसके बाद ही मैंने फैसला किया और मुंबई आ गया।

मुंबई में भी मैंने शुरुआत में बतौर जर्नलिस्ट ही काम किया। एक मीडिया कंपनी में वीडियो सेगमेंट शुरू हुआ था, वहां पर बड़े-बड़े स्टार्स का इंटरव्यू लेता था। महमूद का इंटरव्यू भी मैंने इसी प्लेटफॉर्म के जरिए लिया था। यहां काम अच्छा ही चल रहा था कि एक दिन मेरी सीनियर से लड़ाई हो गई जिसके बाद वो नौकरी छोड़कर घर वापस आ गया।

फिर वही सवाल मेरे सामने आया कि परिवार का गुजारा कैसे होगा, लेकिन मेरी किस्मत अच्छी रही। जिस दिन मैंने ये नौकरी छोड़ी, उसी दिन मुझे सोनी चैनल से ऑफर आया। फिर मैंने वहां काम किया। जहां पर मेरी सैलरी 50 लाख रुपए सालाना थी। इन पैसों से मैंने अपने लिए एक कार और बंगला खरीदा था, लेकिन ये काम भी मैंने कुछ दिनों बाद छोड़ दिया। जाॅब छोड़ने के बाद PF से जो भी पैसे मिले, उससे मैंने होम लोन चुका दिया, लेकिन कार की EMI के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे, जिस वजह से मुझे कार बेचनी पड़ी।

इन सबके बाद शुरू हुआ मेरा असली संघर्ष। मैंने सब कुछ छोड़कर एक्टिंग फील्ड में खुद को समर्पित कर दिया। 6 महीने तक, रोज 50 किलोमीटर पैदल चलकर ऑडिशन देने जाया करता था। पैदल इसलिए जाता था क्योंकि ट्रेन और बस में धक्के खाकर जाना मुझे पसंद नहीं था। वजह ये थी कि इससे पहले मैंने एक अच्छी लाइफ स्टाइल जी थी, फिर से ये संघर्ष का दौर थोड़ा मुश्किल था। टैक्सी के लिए भी इतने पैसे नहीं थे, इसलिए पैदल जाकर ऑडिशन देता था।

6 महीने बाद मुझे IDEA के ऐड में काम करने का मौका मिला। एक ऐड फिल्म में मैंने आमिर खान के साथ काम किया था, जिसे डायरेक्टर नितेश तिवारी ने डायरेक्ट किया था। मेरा काम आमिर खान को बहुत पसंद आया था। उन्होंने मेरे काम की सराहना नितेश तिवारी के सामने की थी।

ऐड फिल्मों में काम करने की वजह से लोग मुझे पहचानने लगे थे। इसी पॉपुलैरिटी की वजह से मुझे डायरेक्टर प्रदीप सरकार ने फिल्म मर्दानी में साइन किया। इस फिल्म के साथ मैं टीवी शो FIR भी कर रहा था। बाद में प्रदीप सरकार की मदद से भाबी जी घर पर हैं में रोल ऑफर हुआ और आज मैं इस शो का हिस्सा हूं। इस शो के तिवारी जी के रोल के लिए ऑडिशन दिया था, लेकिन रोल सक्सेना जी का मिला। जिस सनकी किस्म का किरदार सक्सेना जी का है, रियल लाइफ में काफी हद तक मैं वैसा ही सनकी हूं। ये वो शो है जिससे करोड़ों लोग मुझे पहचानते हैं। जब तक ये शो चलेगा, तब तक मैं इसमें सक्सेना का रोल प्ले करूंगा।

वेब सीरीज ‘अपहरण’ में दुबे जी का रोल किया था। इस रोल से भी बहुत पहचान मिली। एक बार कहीं बाहर जाना था। मैं एयरपोर्ट पहुंचा, वहां एक गेट पर बहुत भीड़ थी, वहीं दूसरे गेट से सिर्फ VIP की एंट्री होनी थी, जहां पर बिल्कुल भीड़ नहीं थी। देरी से बचने के लिए मैं VIP गेट से निकलने के लिए बढ़ा, तभी वहां के सिक्योरिटी गार्ड ने रोक कर कहा- दूसरे गेट से जाएं। फिर जैसे उसने मुझे थोड़े करीब से देखा, खुशी से उछलकर बोला- अरे दुबे जी आप! (अपहरण का रोल)। इसके बाद उसने हाथ मिलाया और उसी VIP गेट से मैंने एंट्री ली।

जब डायरेक्टर नितेश तिवारी फिल्म छिछोरे बना रहे थे, तब उन्होंने मुझे फिल्म में काम करने के लिए अप्रोच किया। मुझे इसलिए अप्रोच किया था क्योंकि उन्होंने मेरा काम ऐड फिल्मों में देखा था। फिर मैंने छिछोरे में काम किया, लेकिन रोल के लिए फीस नहीं ली।

शूटिंग के दौरान मैंने सुशांत सिंह राजपूत के साथ काफी वक्त बिताया था। वो एक अच्छे इंसान थे, लेकिन पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि उनके साथ इतना बड़ा हादसा हो गया। आज भी जब मैं उनके साथ बिताए पलों को याद करता हूं, तो भावुक हो जाता हूं।

मैंने कई बेहतरीन फिल्में की हैं। साथ ही आने वाले समय में किंग स्वीटी, कैप्सूल गर्ल, गगन हूं और सुपर वुमन जैसी वेब सीरीज और फिल्मों में नजर आने वाला हूं। अब मेरे पास सब कुछ है और यही कामना है कि आने वाला समय भी मेरे और परिवार के लिए अच्छा ही रहे। ….