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अनसुने किस्से:ट्रांसपोर्ट कंपनी, रेडियो में की मामूली नौकरी, इंटरव्यू लेने पहुंचे तो मिली पहली फिल्म, दो बार कंगाल होकर की जबरदस्त वापसी

एक महीने पहलेलेखक: ईफत कुरैशी

एक्टर, डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, राजनेता और सोशल वर्कर सुनील दत्त की आज 17वीं डेथ एनिवर्सरी है। पंजाब के झेलम जिले में जन्में सुनील का ज्यादातर बचपन भारत-पाकिस्तान का बंटवारा और इस बीच हुए दंगे देखते हुए गुजरा। बंटवारे में इनका पूरा परिवार पाकिस्तान के हिस्से चला गया और सुनील अकेले भारत में रह गए। 5 साल की उम्र में पिता का भी निधन हो गया। सुनील ने पढ़ाई के बाद रेडियो में काम किया जहां से उनके लिए हिंदी सिनेमा के दरवाजे खुले। बेहतरीन अभिनय के लिए सुनील को नेशनल अवॉर्ड, लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड, पद्मश्री समेत करीब 12 अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। 100 से ज्यादा फिल्मों में नजर आने के बाद सुनील ने राजनीति में भी बड़ा योगदान दिया। उन्होंने 2004-05 में कांग्रेस की सरकार के दौरान सुनील यूथ अफेयर और स्पोर्ट्स मिनिस्टर भी रहे।

76वें जन्मदिन के ठीक दो हफ्ते पहले सुनील दत्त का हार्ट अटैक से 25 मई 2005 को निधन हो गया। सुनील ने अपने एक्टिंग करियर में खूब नाम कमाया, लेकिन कई बार ये पर्सनल लाइफ और परिवार के चलते सुर्खियों में रहे। आज डेथ एनिवर्सरी के मौके पर आइए जानते हैं सुनील दत्त का उतार-चढ़ाव से भरा खूबसूरत सफर-

5 साल की उम्र में उठा पिता का साया

सुनील दत्त का जन्म 6 जून 1929 को नाका खुर्द, पंजाब के झेलम जिले में हुआ था। ब्राह्मण परिवार में दीवान रघुनाध और कुलवंती देवी के घर जन्म के समय सुनील को बलराज दत्त नाम मिला। महज 5 साल की उम्र में सुनील ने पिता को खो दिया। 18 साल की उम्र में भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के समय सुनील को खूब संघर्ष करना पड़ा। सभी हिंदुओं को भगाया जा रहा था और उनका बेरहमी से कत्ल किया जा रहा था। उस समय सुनील के पिता के दोस्त याकूब ने उनके परिवार को अपने घर में शरण देकर सबकी जान बचाई थी।

खर्च चलाने के लिए ट्रांसपोर्टेशन कंपनी में की नौकरी

बंटवारा हुआ तो पूरा परिवार पाकिस्तान चला गया, लेकिन सुनील का परिवार भारत में रह गया। सुनील अपने परिवार के साथ हरियाणा के यमुना नगर स्थित मंडोली गांव में आकर बस गए। 1947 में सुनील ने एक साल तक बतौर हवलदार आर्मी में नौकरी की। लखनऊ से ग्रेजुएशन कर सुनील मुंबई के जय हिंद कॉलेज गए। घर खर्च चलाने के लिए सुनील ट्रांसपोर्टेशन कंपनी ‘B.E.S.T’ में नाइट शिफ्ट की नौकरी करने लगे। यहां सुनील सभी बसों की देखरेख करते थे। पैसों की कमी के कारण सुनील कुर्ला के एक छोटे से कमरे में रहा करते थे।

छोटी-मोटी नौकरी कर निकालते थे कॉलेज की फीस

कॉलेज के दिनों में सुनील दत्त ने थिएटर में दिलचस्पी दिखाई। इनकी दमदार आवाज और उर्दू में गहरी पकड़ के चलते इन्हें खूब तारीफें मिलती थीं। प्ले के दौरान सुनील की आवाज से इम्प्रेस होकर रेडियो प्रोग्रामिंग हेड ने उन्हें रेडियो चैनल में नौकरी का ऑफर दिया। सुनील झट से राजी हो गए। नौकरी के दौरान सुनील फिल्मी दुनिया के सितारों का इंटरव्यू लिया करते थे जिसे लिए उन्हें 25 रुपए मिलते थे।

नरगिस से इंटरव्यू लेते हुए कोई सवाल ही नहीं पूछ सके सुनील

सुनील दत्त एक बार उस समय की सबसे पॉपुलर एक्ट्रेस रहीं नरगिस का इंटरव्यू लेने पहुंचे। सुनील इस समय इतने नर्वस थे कि वो नरगिस से कोई सवाल ही नहीं पूछ सके। घबराए हुए सुनील को नरगिस ने शांत करवाया और इंटरव्यू हो सका। किसे पता था कि रेडियो के लिए इंटरव्यू ले रहा ये आम लड़का एक दिन नरगिस का हमसफर बन जाएगा।

सबसे पहले सुनील ने निम्मी का इंटरव्यू किया था दिलीप कुमार, देव आनंद जैसे कई बड़े सितारे भी इनके मेहमान बने और ये सिलसिला महीनों तक जारी रहा। इस सिलसिले में कई बार सुनील का फिल्मों के सेट पर भी जाना होता था।

दिलीप कुमार का इंटरव्यू लेने पहुंचे तो मिल गई पहली फिल्म

एक दिन दिलीप कुमार का इंटरव्यू लेने पहुंचे सुनील दत्त पर डायरेक्टर समेश सहगल की नजर पड़ी। उनके लुक और आवाज से इम्प्रेस होकर रमेश ने उन्हें फिल्मों में हाथ आजमाने को कहा। सुनील राजी हो गए और तुरंत दिलीप साहब की कॉस्ट्यूम पहनकर स्क्रीन टेस्ट दे दिया। सुनील का अभिनय रमेश को इतना पसंद आया कि उन्होंने वहीं अगली फिल्म रेल्वे प्लेटफॉर्म का ऑफर दे दिया।

कैसे बलराज से बन गए सुनील दत्त

डायरेक्टर रमेश सहगल ने ही बलराज दत्त को स्क्रीन नाम सुनील दिया था। दरअसल उस समय बलराज साहनी पहले ही इंडस्ट्री में मशहूर थे। ऐसे में कन्फ्यूजन से बचने के लिए रमेश ने बलराज से नाम बदलकर सुनील कर दिया।

मदर इंडिया से मिली देशभर में पहचान

रेल्वे प्लेटफॉर्म के बाद सुनील कुंदन, एक ही रास्ता, राजधानी, किस्मत का खेल जैसी फिल्मों में आए, लेकिन इन्हें असल पहचान 1957 की फिल्म मदर इंडिया से मिली। फिल्म में सुनील, नरगिस के बेटे के रोल में थे।

शूटिंग में हुआ हादसा तो जान पर खेलकर बचाई नरगिस की जान

मदर इंडिया की शूटिंग के दौरान सेट पर आग लग गई जिसमें नरगिस बुरी तरह फंसी। सुनील ने तुरंत अपनी जान की परवाह किए बिना नरगिस की जान बचाई। दरअसल सुनील नरगिस को पसंद किया करते थे, लेकिन उस समय नरगिस और राज कपूर का रिश्ता खत्म ही हुआ था। सेट पर हुए हादसे में जब सुनील ने जान की बाजी लगा दी तो नरगिस भी उन्हें चाहने लगीं। मदर इंडिया की रिलीज के अगले साल 1958 में दोनों ने शादी कर ली। इस शादी से इन्हें तीन बच्चे हुए।

प्रोडक्शन और डायरेक्शन में आजमाया हाथ

1960 तक सुनील दत्त हिंदी सिनेमा के एक मशहूर अभिनेता बन चुके थे। एक्टर ने एक के बाद एक हिट फिल्में दीं। 1968 की पड़ोसन से फिर एक बार सुनील की चर्चा देशभर में हुई। एक्टिंग के अलावा सुनील ने अजंता आर्ट्स प्रोडक्शन हाउस शुरू किया। 1964 की फिल्म यादें से सुनील ने डायरेक्टोरियल डेब्यू किया।

प्रोडक्शन में हुए नुकसान से कर्जे में दबे एक्टर

1971 में सुनील ने दत्त ने बड़े बजट में वहीदा रहमान के साथ रेशमा और शेरा बनाई। इस फिल्म के लिए वहीदा को बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल अवॉर्ड मिला, हालांकि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बड़ी फ्लॉप रही। फिल्म से हुए नुकसान के चलते सुनील बुरी तरह कर्जे में डूब गए। नुकसान की भरपाई के लिए सुनील ने कमर्शियल फिल्में बनाना जारी रखा।

सुनील ने 1981 की फिल्म रॉकी से बेटे संजय दत्त को फिल्मों में लॉन्च किया, लेकिन इसकी रिलीज से चंद दिनों पहले ही नरगिस की कैंसर से मौत हो गई। एक तरफ पत्नी को खोने का गम था और दूसरी तरफ रॉकी की कामयाबी की खुशी। सुनील ने फिल्मों से दूरी बना ली और वो अपना नरगिस दत्त फाउंडेशन शुरू कर ज्यादातर समय कैंसर पीड़ितों की मदद और समाज सेवा में देने लगे। ऑफर मिलते रहे तो सुनील दर्द का रिश्ता, बदले की आग, राज तिलक जैसी फिल्मों में नजर आते रहे।

संजय दत्त को हुई जेल तो बदनामी के डर से बना ली लोगों से दूरी

मुंबई बॉम्ब ब्लास्ट के समय संजय दत्त के पास एके-47 मिली थी, जिसके चलते उन्हें जेल की सजा हुई थी। बेटे के जेल जाते ही सुनील दत्त बुरी तरह टूट गए और लोगों से दूर रहने लगे। वो अपना ज्यादातर समय संजय दत्त को जेल से बाहर निकालने में लगाया करते थे। गरीबी का ऐसा दौर आया कि सुनील को पैसों की कमी के कारण अपना घर भी बेचना पड़ा था।

राजीव गांधी के कहने पर रखा राजनीति में कदम

एक लंबे अंतराल के बाद संजय ने करीबी दोस्त राजीव गांधी के कहने पर राजनीति में कदम रख लिया। सुनील 5 बार संसद चुने गए। कांग्रेस सरकार के राज में सुनील 2004 में मिनिस्टर ऑफ यूथ मिनिस्टर एंड स्पोर्ट्स रहे।

48 सालों के एक्टिंग करियर में 12 बड़े अवॉर्ड

सुनील दत्त को पहली बार मुझे जीने दो फिल्म के लिए 1963 में बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड मिला। इसके बाद इन्हें यादें के लिए पहली बार नेशनल अवॉर्ड मिला। 1968 में इन्हें पद्मश्री और 1995 में लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। 48 सालों के एक्टिंग करियर में सुनील को फिल्मफेयर, नेशनल अवॉर्ड, राजीव गांधी अवॉर्ड जैसे करीब 12 बड़े अवॉर्ड मिले। आखिरी बार सुनील 2003 की फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस में संजय के पिता के रोल में नजर आए थे। 25 मई 2005 में सुनील दत्त का हार्ट अटैक से बांद्रा स्थित घर में निधन हो गया।

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