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101वीं बर्थ एनिवर्सरी:पायलट की नौकरी छोड़ बने एक्टर, पश्तूनी पगड़ी बांधने पर मिली पहली फिल्म, जिस आवाज की दुनिया थी फैन वो कैंसर के कारण गई

10 दिन पहलेलेखक: प्रियंका जोशी

आज महान एक्टर रहमान की 101वीं बर्थ एनिवर्सरी है। रहमान प्यार की जीत, बड़ी बहन, परदेस, प्यासा जैसी फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। 1940 से 1970 के दशक तक रहमान ने कई बॉलीवुड फिल्मों में काम किया। उनके चेहरे की मासूमियत और आवाज के लोग दीवाने थे।

रहमान पाकिस्तान की एक रॉयल पश्तून फैमिली से थे और काफी पढ़े-लिखे भी थे। रहमान की इंडियन एयर फोर्स में नौकरी लग गई थी लेकिन उनके एक्टिंग के जुनून के चलते उन्होंने वो नौकरी छोड़ दी और बॉम्बे आकर एक्टर बन गए। उन्हें पहली फिल्म मिलने की कहानी भी खासी दिलचस्प है। दरअसल, एक दिन डायरेक्टर को एक ऐसे शख्स की तलाश थी जो पश्तूनी पगड़ी बांध सके। रहमान पश्तून थे तो उन्हें इसका फायदा मिल गया। फिर क्या था रहमान को पगड़ी बांधने के साथ उनका पहला रोल भी मिल गया और इसी के साथ उनके करियर की शुरुआत हो गई। तो चलिए आज इस बेहतरीन एक्टर को याद करते हुए उनके बॉलीवुड के सफर को जानते हैं।

रॉयल फैमिली में हुआ जन्म

जब भारत में ब्रिटिशर्स की हूकूमत थी तब एक रॉयल पश्तून फैमिली में 23 जून 1921 को रहमान खान का जन्म हुआ। लाहौर में जन्मे रहमान देश के आजाद होने पर भारत में आकर बस गए। वो पढ़ाई में शुरू से ही काफी अच्छे थे सो जबलपुर के रॉबर्टसन कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद वो इंडियन एयर फोर्स की ट्रेनिंग लेकर फोर्स में शामिल हो गए। यहां रहमान की पॉयलेट के तौर पर नौकरी भी लग गई।

एक्टिंग के लिए एयरफोर्स छोड़ बॉम्बे आए

रहमान का मन एयरफोर्स में तो लगता नहीं था क्योंकि उन्हें अपनी कद, काठी और बुलंद आवाज एक एक्टर होने का एहसास कराती थी। फिर क्या था रहमान ने एयरफोर्स की नौकरी छोड़ दी और बॉम्बे यानी मुम्बई का रुख कर लिया। यहां आकर वो डायरेक्टर और राइटर विश्राम बेडेकर के साथ थर्ड असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम करने लगे।

पश्तूनी पगड़ी बांधने पर मिली पहली फिल्म

रहमान को पहली फिल्म मिलने का किस्सा भी काफी दिलचस्प है। दरअसल एक दिन विश्राम बेडेकर को अपनी फिल्म के लिए पश्तूनी पगड़ी बांधने वाले की तलाश थी और रहमान ठहरे पश्तून। जाहिर है उन्हें पश्तूनी पगड़ी बांधना भी आता था। बस फिर क्या था रहमान दिखते तो अच्छे थे ही, साथ ही उनकी आवाज भी काफी बुलंद थी। इसी के चलते उन्हें उनकी पहली फिल्म मिल गई।

गुरु दत्त की टीम से जुड़े

काम के दौरान ही रहमान की मुलाकात गुरु दत्त से हुई। ऐसे में वो उनकी टीम से जुड़ गए और कई बेहतरीन फिल्में बनाईं। जिनमें 1948 में आई प्यार की जीत, 1949 में आई बड़ी बहन, 1950 में आई परदेस 1960 में आई चौधवी का चांद, 1962 में साहिब बीबी और गुलाम जैसी बेहतरीन फिल्में शामिल हैं।

सुरैया से करना चाहते थे शादी

रहमान की लीड एक्टर के तौर पर प्यार की जीत और बड़ी बहन बड़ी हिट थीं। इन दोनों ही फिल्मों में रहमान एक्ट्रेस सुरैया के साथ नजर आए थे। ऐसे में शूटिंग के दौरान ही रहमान को सुरैया से प्यार हो गया। रहमान सुरैया से शादी भी करना चाहते थे पर सुरैया अपना दिल पहले ही देव आनंद को दे चुकी थीं जिसके चलते दोनों की शादी नहीं हो सकी। सुरैया के साथ फिल्म प्यार की जीत का उनका गाना "एक दिल के तुकड़े हजार हुए, एक यहां गिरा एक वहां गिरा" अमर हो गया। बाद में रहमान ने मधुबाला के साथ फिल्म पारस और परदेस में काम किया। दोनों ही फिल्में हिट साबित हुईं।

परिवार पाकिस्तानी फिल्मों में एक्टिव पर रहमान को भाया भारत

रहमान की ज्यादातर फैमिली बंटवारे के बाद पाकिस्तान में रही लेकिन रहमान अपने परिवार के साथ भारत आ गए। उनके भांजे फैजल रहमान पाकिस्तान के बेहतरीन एक्टर हैं। उनके दूसरे भांजे फासीह उर रहमान पाकिस्तान में क्लासिकल डांसर हैं। उनके भतीजे मासूद उर रहमान पाकिस्तान के फेमस सिनेमैटोग्राफर हैं।

कैंसर से गई आवाज

रहमान को उनकी आवाज के लिए जाना जाता था। उनकी बुलंद आवाज उनके होने का एहसास करा देती थी। 1977 तक उन्हें 3 हार्ट अटैक आ चुके थे लेकिन फिर भी उनका हौसला बरकरार था जो कैंसर ने तोड़ दिया। दरअसल रहमान शराब पीने के आदी थे जिसकी वजह से उन्हें गले का कैंसर हो गया और उनकी जादुई आवाज चली गई। रहमान ने लंबी बीमारी से जूझने के बाद 1984 में इस दुनिया को अलविदा कर दिया। लेकिन मलाल ये रहा कि उनके आखिरी वक्त में उनके मुंह से एक शब्द न निकला।