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  • The Planning Was That I Would Watch The Film 83 Sitting Next To Yashpal Ji, But Due To His Departure, Everything Remained Incomplete.

भास्कर एक्सक्लूसिव:प्लानिंग थी कि यशपाल जी के पास बैठकर ही फिल्म 83 देखूंगा, लेकिन उनके जाने से सब अधूरा सा रह गया है

मुंबई2 महीने पहले
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  • फिल्म 83 में भारतीय क्रिकेटर यशपाल शर्मा का रोल निभा रहे जतीन सरना ने दैनिक भास्कर से साझा की दिल की बातें

1983 की विश्वकप विजेता भारतीय क्रिकेट टीम के सदस्य रहे क्रिकेटर यशपाल शर्मा का मंगलवार को निधन हो गया। इस विश्वकप विजय पर डायरेक्टर कबीर खान की बहुप्रतीक्षित फिल्म 81 में यशपाल जी का किरदार एक्टर जतिन सरना ने निभाया है। यशपाल जी के निधन पर दैनिक भास्कर की ओर से हिरेन अंतानी ने जतिन से बात की। जतिन ने यशपाल जी के बारे में कई बातें भास्कर के साथ शेयर कीं। प्रस्तुत है, इस बातचीत के कुछ खास अंश जतिन सरना के ही शब्दों में...

मैं बहुत ही सच्चाई से कहता हूं कि जब मुझे फिल्म ‘83’ के लिए यशपाल शर्मा जी का किरदार ऑफर किया गया तो मै उनके बारे में कुछ खास नहीं जानता था। शुरू में मुझे मदनलाल जी का रोल ऑफर किया गया था। उनके बारे में तो थोड़ा भी पता था, पर यशपाल जी के बारे में, 83 के विश्व कप में उनके कांट्रिब्यूशन बारे में बहुत जानकारी नहीं थी।

मुझे लगा था कि यशपाल जी के किरदार में तो मेरा रोल कितना रह जाएगा। मगर, फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबडा और फिल्म के डायरेक्टर कबीर खान ने मुझे पूरी तरह से समझाया कि कैसे यशपाल शर्मा ने उस विश्वकप में अहम भूमिका निभाई थी। उसके बाद मैने उनके बारे में पढ़ा, स्क्रिप्ट भी पढ़ी, तब रिलाइज़ हुआ कि मैं सचमुच में एक बहुत ही अहम और मजेदार किरदार करने जा रहा हूं।

यशपाल जी फिल्म में बहुत एग्रेसिव थे लेकिन ऑफ दी फील्ड वह बहुत ही मौजी किस्म के आदमी थे। अपने खेल को लेकर उनमें एक जज्बा था। वह देश के लिए कुछ करना चाहते थे। और, सही में उन्होंने वह कर दिखाया था।

मुझे आज भी याद है कि धर्मशाला में फिल्म के लिए क्रिकेट की प्रैक्टिस हो रही थी और तब मैं उन्हें पहली बार मिला था। मुझे देखकर वह बड़े खुश हुए थे। वह यह जानने के लिए काफी उत्सुक थे कि मेरा किरदार कौन कर रहा है। मैं भी स्क्रीन पर जिनको जीने वाला था, उसने मिलने के लिए बेताब था।

हमने साथ डिनर किया। दूसरे दिन फील्ड में आए। एक-एक चीज मुझे बारीकी से सिखाई। सब से पहले तो मैदान में अपने अंदाज से एंट्री लेना ही सिखाया। अपने सारे शॉट्स, अपनी बॉडी लैंग्वेज, अपने बोल-चाल का तरीका, किसी शॉट पर या कोई गेंद पर रिएक्ट करने का तरीका सब मुझे बड़े मन से बताया।

कैसे उन्होंने माइकल होल्डिंग का सामना किया था, कैसे एंडी रॉबर्ट्स की बॉल पर एक छक्का लगा दिया था। विश्वकप की पहले ही मैच में वेस्टइंडीज को हराया और उन्हें ‘मैन ऑफ दी मैच’ घोषित किया गया। सच में मुझे यह सारी बातें पता नहीं थी। उस इवेंट में पूरी भारतीय टीम अंडरडॉग थी। और, सब ने वह पहले मैच से ही ठान लिया था कि कुछ करिश्मा दिखा कर ही वतन वापस जाना है। वह सारा जुनून, वह जोश समझने में उन्होंने मेरी पूरी मदद की।

मैं एक-एक पल उनको ऑब्जर्व करता रहता था। वह क्या वे लाइनर बोलते थे। कभी ओवररिएक्ट नहीं करते। वे ऑथेरीटेटिव तरीके से मतलब की मुझ में यह करने की क्षमता है और मै करके ही दिखाऊंगा, ऐसे निश्चय से मेहनत करते थे। इन सब बातों को मैं अपने अंदर डाल रहा था।

वह बताते थे कि मिडल ऑर्डर में कभी उनका तो कभी दिलीप वेंगसरकर का चयन होता था। वो एक ऐसे इंसान थे, जो अपने आपको प्रूव करना चाहते थे। सारी टीम बहुत दबाव में थी, लेकिन साथ-साथ इस बात का पूरा ख्याल था कि वह एक ऐतिहासिक इवेंट में शामिल हो रहें हैं। आक्रामकता और जोश मुझमें बिलकुल यथार्थ तरीके दिखे, उसका वे बहुत ख्याल रखते थे।

हम दोनो पंजाबी होने की वजह से मुझे उनकी बोलने की शैली पकड़ने में जरा भी देर नहीं लगी। हम फोन पर लंबी बातें करते थे। कई बार तो मैं शॉट देने के बाद उन्हें फोन करता था। उन्हें बताता रहता था कि मै कैसे उनकी तालिम को स्क्रीन पर पेश कर रहा हूं।

फिल्म की शूटिंग खत्म हो जाने के बाद भी हमारे रिश्ते कायम रहे। अक्सर बात किया करते थे। पिछले साल होली पर मैं उनके घर जाने वाला था। तब उनके घर का रिनोवेशन हो रहा था इसलिए नहीं जा पाया। बाद में कोविड आ गया। मुझे अफसोस है कि मैं पिछले समय में इन सब वजह से उन्हें नहीं मिल सका।

वे फिल्म देखने के लिए बहुत उत्सुक थे। पूछते रहते थे कि फिल्म कब आ रही है। जब हम सबका, पूरी टीम का फर्स्ट लुक सार्वजनिक किया गया था, तब बहुत खुश हुए थे। बोल पड़े थे अरे मैं तो तुम तो बिलकुल एक जैसे दिखते हैं। उसके बाद तो वह फिल्म देखने के लिए बहुत बेताब हो गए थे।

हम दोनों ने फिल्म देखने के लिए बहुत कुछ प्लान किया था। साथ-साथ बैठकर फिल्म देखेंगे, एक-एक शॉट पर बात करेंगे, यह तय हुआ था। उन्हें बहुत खुशी थी कि उन यादगार पलों को फिर से सजीव किया जा रहा है। मैं भी खुश था कि इतने बड़े आदमी का किरदार निभाने का मौका मिला, पर अब उम्र भर अफसोस रहेगा कि उनके साथ फिल्म नहीं देख पाया।

वह अपनी विश्वकप की पूरी टीम के साथ भी फिल्म इंजॉय करना चाहते थे। आज 30 साल के बाद भी उन सबके बीच इतना याराना, एक-दूसरे के प्रति लगाव था कि हम भी ये देखकर और सुनकर भावुक हो जाते थे। पूरी की पूरी टीम, वैसे ही रिश्ता निभा रही थी।

मुझे पता है, आज कपिल जी के दिल पर क्या गुज़र रही होगी, कीर्ति आजाद जी, संधु जी, सब कितने शोक में होंंगे। इस टीम का साथ बैठकर खुद को स्क्रीन पर फिर से उन्हीं पलों को देखना, कैसा सुनहरा अवसर होता। ईश्वर को यह नहीं करना चाहिए था।

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