भास्कर इंटरव्यू:फिल्ममेकर तिग्मांशु धूलिया बोले- 'द ग्रेट इंडियन मर्डर' में प्रतीक का किरदार इंडिया के नए पावर एलीट को रिप्रेजेंट कर रहा है

4 महीने पहलेलेखक: अमित कर्ण

वेब सीरीज के मैदान में लगातार बड़े नाम शुमार हो रहे हैं। अजय देवगन और प्रीति सिन्हा के को-प्रोडक्शन में चार फरवरी को 'द ग्रेट इंडियन मर्डर' नामक सीरीज OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज हो रही है। इसे तिग्मांशु धूलिया ने डायरेक्ट किया है। 'स्कैम' के बाद से लगातार सुर्खियों में रहे प्रतीक गांधी इसमें सीबीआई अफसर सूरज यादव के रोल में हैं। ऋचा चड्ढा इसमें डीसीपी सुधा भारद्वाज की भूमिका में हैं।

यह इंडियन डिप्लोमैट विकास स्वरूप के नॉवेल 'सिक्स सस्पेक्ट्स' पर बेस्ड है। दैनिक भास्कर से तिग्मांशु धूलिया ने इसकी मेकिंग के साथ साथ स्पोर्ट्स ड्रामा की फिल्मों के लिए जरूरी एलिमेंट्स पर खास बातचीत की है। पढ़िए बातचीत का प्रमुख अंश:

आपने टीवी और फिल्में भी की हैं। क्या ओटीटी टीवी की ऑडिएंस छीन रहा है?
जी हां। खुद मुझे याद नहीं कि मैंने आखिरी बार कब अपना टीवी खोला है कुछ देखने के लिए? टीवी की ऑडिएंस बिखरी तो है। मोबाइल के चलते तो अब हाथों में ही टेलीविजन है। यकीनन ओटीटी पर भी नए शोज आने में वक्त लगता है। लेकिन उनके इतने सारे प्लेटफॉर्म आ रहे हैं, जिसका टीवी पर असर पड़ा है।

इस सीरीज की क्या कायनात है?
यह सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री तो नहीं है। मर्डर के पीछे मोटिव से लेकर मर्डर के बाद जो आसपास रिपल इफेक्ट्स होते हैं, वो मर्डर से भी ज्यादा खतरनाक हैं। वो सारी वजहें फिर दर्शकों को पूरा हिंदुस्तान घुमाएंगी। बहुत सारे किरदार हैं इसमें। यह देश की सामाजिक स्थिति और उसके इतिहास को भी छूते हुए चलती है। इसमें वैसे आप कोई कंट्रोवर्सी मत ढूंढिएगा। इसमें तगड़ी पॉलिटिक्स है, पर मैंने कहीं किसी के तार नहीं छेड़े हैं। मैंने इसे सिर्फ टिपिकल थ्रिलर तक सीमित नहीं रखा है।

यहां मेन लीड प्रतीक गांधी हैं। वो यहां इसलिए हैं कि स्कैम के बाद वो नेशनल सेंसेशन हैं?
प्रतीक और ऋचा का कैरेक्टर नॉवेल में तो नहीं था। हमने दोनों को ऐड किया है। ऋचा का किरदार अपने तरीके से मर्डर मिस्ट्री को इनवेस्टिगेट करता है। उससे अलग एंगल पर केस इनवेस्टिगेट करने वाला किरदार तो होना चाहिए न। स्कैम ने जरूर हलचल मचाई थी पिछले साल। हमने उनसे बात की। वो भी थिएटर और प्ले के बैकग्राउंड से आते हैं। हमें बातचीत में कॉमन बैकग्राउंड मिल गए। चंद्रकांत बख्शी गुजराती के बड़े राइटर थे। वो अब नहीं रहे, उनकी एक कहानी पर मैंने शॉर्ट फिल्म बनाई थी। तो हमारी उन पर बातें होने लगीं। उस पर प्रतीक ने हां बोल दी।

प्रतीक के किरदार का सरनेम यादव है। इसकी कोई खास वजह?
सूरज यादव जो है, वह इंडिया के नए पॉवर एलीट रिप्रेजेंट कर रहा है। राजनीति में जब डिसीजन लिए जाते हैं तो वो धीरे धीरे समाज में जाता है। फिर हम जीते हैं। इंडिया में MNC को अलॉउ किया गया तो ही हम उनके प्रॉडक्ट यूज कर पा रहें हैं। यह पार्लियामेंट में डिसाइड हुआ था। हमारा आप का नहीं था। तो 90 के दशक में पिछड़े तबकों का जैसे इमरजेंस हुआ, उससे प्रतीक के किरदार जैसे युवाओं को मजबूती मिली। इसलिए हमारे शो में उनका नाम सूरज यादव है। सूरज बहुत सक्सेसफुल और शॉर्प है। उसका कैरेक्टर बड़ा नुआंस है।

OTT बड़ा हुआ है। पुष्पा के कलेक्शन बड़े हैं। OTT और साउथ से हिंदी सिनेमा के लिए क्या खतरे हैं?
थिएटरों में तो अब बड़ी पिक्चरें ही बनेंगी। यह मैं दस साल से बोल रहा हूं। लेकिन OTT का बड़ा होना साइंटिफिक डेवलपमेंट है। इससे आप बच नहीं सकते। यह ऐसा है कि सिनेमाघरों में दो महीने तक बैन था। डिस्ट्रीब्यूटरों ने स्ट्राइक कर दी थी तो ओटीटी बड़ा हो गया। जब डिजिटल कैमरा आया तो पुरानी तकनीक वाले लैब बंद हुए न। मल्टीप्लेक्स में पिक्चरें देखना बहुत एक्सपेंसिव है। तो वैसे ही वहां दर्शक सीमित हो रहें हैं। OTT हॉलीवुड और साउथ का बड़ा होना साइंटिफिक डेवलमेंट है। बॉलीवुड के मेकर्स इससे बच नहीं सकते। उन्हें उनसे बेहतर कंटेंट लाने के रास्ते ढूंढने होंगे।

'अंतिम' और '83' कमर्शियल पॉटबॉयलर थीं। वो कम चलीं। सेम माहौल में पुष्पा, स्पाइडरमैन चलती रहीं। हिंदी के मेकर्स कहां मिस कर रहें हैं?
देखिए ये दो सवाल हैं। कोविड केसेज नहीं होते तो 'अंतिम' और '83' दोनों चलतीं। यहां परसेंटेज का चक्कर है। यह बात जरूर है कि साउथ की फिल्में सैटेलाइट में बहुत अच्छा बिजनेस करती रही हैं। उससे साउथ के मेकर्स को अंदाजा हुआ कि टीवी पर हमारी ऑडिएंस है यानी सिनेमाघरों में भी वह आएगी। उनकी फिल्में अच्छी बनती भी हैं। हॉलीवुड ने तो हिंदी फिल्मों को डेंट किया था, अब साउथ भी है। हॉलीवुड वालों को जेम्स बॉन्ड तक का स्टाइल बदलना पड़ा, जबसे वहीं अवेंजर्स और फास्ट एंड फ्यूरियस फ्रेंचाइजी ने विजुअली और एक्शन से उन्हें टक्कर देनी शुरू की तो। जेम्स बॉन्ड को इमोशनल बनाना पड़ा। गर्लफ्रेंड के किरदार बड़े करने पड़े।

यहां हम उनके विजुअल इफेक्ट्स से टक्कर तो ले नहीं सकेंगे। साउथ में तकरीबन सभी फिल्में इसलिए चल रहीं कि वो काफी जमीनी किरदार बनाते हैं। अब सर्कल घूम गया है। फिल्म 'दिल से' UK में बहुत चली थी। तो हिंदी के मेकर्स ओवरसीज की ऑडिएंस की पसंद के मद्देनजर फिल्में बनाने लगे। जमीनी किरदार गुम होने लगे। उसके चलते भोजपुरी सिनेमा और रीजनल सिनेमा का उभार हुआ। अब हिंदी भी वापस वहीं आ गए।

खबरें और भी हैं...