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गीतकार समीर के शब्दों में श्रवण:संगीत के जितने माहिर कलाकार थे, उतने ही बेहतरीन दोस्त भी थे श्रवण, कोई दोपहर ऐसी नहीं होती थी जो उनके बिना गुजरी हो

मुंबई3 महीने पहलेलेखक: राजेश गाबा
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गीतकार समीर और दिवंगत संगीतकार श्रवण दोनों प्रोफेशनल साथी तो थे ही, बहुत गहरे दोस्त भी थे। - Dainik Bhaskar
गीतकार समीर और दिवंगत संगीतकार श्रवण दोनों प्रोफेशनल साथी तो थे ही, बहुत गहरे दोस्त भी थे।
  • गीतकार समीर ने दैनिक भास्कर के साथ साझा कीं श्रवण राठौर से जुड़ी कुछ खास बातें और यादें

‘नहीं ये हो नहीं सकता कि तेरी याद ना आए’ श्रवण के संगीत के लिए ये बोल लिखने वाले समीर, श्रवण कुमार राठौड़ के बहुत अच्छे दोस्तों में से एक हैं। श्रवण के कोरोना से निधन के बाद वे बहुत दुखी हैं, उन्होंने श्रवण के लिए कहा था- मेरा दोस्त चला गया। साथ ही समीर ने दैनिक भास्कर से श्रवण की कई यादें साझा कीं।

तेरी आशिकी ये क्या रंग लाई
'श्रवण राठौड़ का बेस क्लासिकल फैमिली से रहा। उनके पिता पंडित चतुर्भुज राठौड़ बहुत बड़े क्लासिकल सिंगर थे। उन्होंने कल्याण जी को म्यूजिक सिखाया था। इसी से आप अंदाजा लगा सकते हो कि वो कितने बड़े कलाकार थे। इनकी पूरी फैमिली क्लासिकल म्यूजिक से जुड़ी हुई थी। श्रवण जी के सभी भाई भी म्यूजिक में रहे। श्रवण से मेरी पहली मुलाकात ऊषा खन्ना जी के यहां एक रिकॉर्डिंग में हुई थी। तब वो वहां पर रिदम बजाते थे। जब मैं नदीम से 1984-85 में मिला तब तक नदीम-श्रवण अपनी जोड़ी बना चुके थे। काफी काम कर रहे थे, लेकिन तब कोई सिलसिला बना नहीं। फिर हम लोग आशिकी फिल्म में जुड़े और ये सिलसिला चल निकला। मेरे लिखे गीत और नदीम-श्रवण का संगीत। हम तीनों दोस्त बन गए।

सफलता मिलने के बाद भी न बदले थे
श्रवण जी व्यवहार कुशल इंसान थे। अच्छे लोग बहुत कम आते हैं। सक्सेसफुल लोग काफी आते हैं। सक्सेसफुल और एक अच्छा इंसान होना ये अलग बात होती है, लेकिन श्रवण जी में ये दोनों खूबियां थीं। सफलता आने से पहले और बाद में भी उनकी सहजता वैसी की वैसी रही। अपने दोस्तों-यारों को हेल्प करना, आउट ऑफ वे जाकर करना ये उनकी क्वालिटी थी। उनके कितने दोस्त सालों उनके पैसे से सर्वाइव किए होंगे। अपने पास पैसे हों न हों, लेकिन दोस्तों की मदद जरूर करते थे। ये तमाम खूबियां थीं मेरे दोस्त में।

हम म्यूजिकल फैमिली कहते थे
फैमिली कमाल की थी श्रवण भाई की। पत्नी भी घरेलू महिला। सभी का आत्मीयता के साथ स्वागत सत्कार करने वाली। दो बच्चे, बहू नाती- पोते भी हो गए। सभी संगीत से जुड़े हुए। हम इनकी फैमिली को म्यूजिकल फैमिली कहते हैं। बच्चे भी संगीत में अच्छा काम कर रहे हैं।

श्रवण सबकी सेवा में लगे रहते थे। कई बार श्रवण और मैं मराठा मंदिर बॉम्बे सेंट्रल की तरफ नदीम भाई के घर साथ में जाते थे। श्रवण का एक बहुत मोटा ड्राइवर था। वह बहुत तेज गाड़ी चलाता था। श्रवण को मैं बोलता था कि मैं तुम्हारे साथ नहीं चलूंगा तुमको फास्ट गाड़ी का शौक है मुझे घबराहट होती थी। जब मैं आऊं तो उसको श्रवण बोलते थे कि भाई देखो तेज मत चलाना नहीं तो पंडित जी नाराज होकर उतर जाएंगे। कभी-कभी सिटिंग के अलावा भी श्रवण भाई के घर में फैमिली के साथ गप भी मारते थे। उनके भाइयों रूपकुमार राठौड़ और विनोद राठौड़ के साथ कई बार म्यूजिकल सिटिंग होती थी।

संगीतकार जोड़ी नदीम-श्रवण 90 के दशक की सबसे सफल जोड़ी मानी जाती थी।
संगीतकार जोड़ी नदीम-श्रवण 90 के दशक की सबसे सफल जोड़ी मानी जाती थी।

हर दोपहर की वो सिटिंग जिसमें कई गाने बने
श्रवण को म्यूजिक का जबरदस्त सेंस था। वो अपना हारमोनियम बहुत कमाल का बजाते थे। हमारी सिटिंग में केवल हम तीन लोग होते थे मैं, नदीम और श्रवण भाई। नदीम भाई कांगो बजाते थे, श्रवण भाई हारमोनियम और मैं सिटिंग में होता था। ये तीन लोग बस जुड़ जाएं तो कुछ भी संभव था। रोज का तकरीबन मिलना, रोज दोपहर की सिटिंग। नदीम भाई अपने घर चले जाते थे। मैं और श्रवण भाई लोखंडवाला में रहते थे तो साथ में आ जाते थे। जितना भी म्यूजिक अरेंजमेंट होता था, वो सारा काम श्रवण का होता था। श्रवण ने कंपोजिशन टोटल नदीम भाई के ऊपर छोड़ दी थी। म्यूजिक सपोर्ट श्रवण भाई करते थे। दोनों पार्टनर में ये ट्यूनिंग हो गई थी कि आप कंपोजिशन संभालो मैं म्यूजिक देखूंगा। श्रवण भाई गाते भी कमाल का थे।

ऐसा होता था कि तीनों में कोई एक भी नहीं होता तो सिटिंग नहीं होती थी। मैं तो हमेशा श्रवण को बोलता था कि आप दोनों गाते-बजाते हो। मेरी क्या जरूरत है। तब नदीम भाई बोलते थे नहीं पंडित जी आप सामने नहीं होते तो हमारा मूड नहीं बनता। आप सामने रहते हो तो हमें एक इंस्पिरेशन रहती है। मैं नदीम-श्रवण के सामने बैठकर एक गाना लिख रहा था तब श्रवण बार-बार मेरी घड़ी देख रहे थे तब मैंने पूछा कि क्या हुआ श्रवण भाई घड़ी क्यों देख रहे हो। तब श्रवण बोले - अरे भैया आपको तो गाना लिखने में 15-20 मिनट से ज्यादा नहीं लगता। आधा पौना घंटा हो गया। तब मैंने कहा कि अरे भैया आपने मुझे कंप्यूटर समझ रखा है क्या। ऐसे हम लोग खूब मस्ती करते थे।

आवाज श्रवण के हारमोनियम से निकलती है
एक बहुत अच्छा पीरियड हम लोगों ने साथ में देखा। आज भी लोग जब 90 का नाम लेते हैं। तब शीर्ष पर नदीम-श्रवण की जोड़ी का नाम आता है। उस दौर में सबसे अच्छा काम इन दोनों ने किया। दोनों ने क्या कमाल का संगीत सिनेमा को दिया। दुर्भाग्य था कि नदीम भाई के साथ हादसा हो गया और उन्हें देश छोड़कर जाना पड़ा। टीम बिखर गई। तब भी श्रवण जी म्यूजिक में लगे रहे। फिर उन्होंने प्राइवेट काम किए, फिर ट्यूशन किए। दोनों की जोड़ी क्या कमाल की लगती थी। दोनों लंबे-चौड़े दिखने में खूबसूरत।

इस जोड़ी का रिकॉर्डिंग का यह आलम था कि नदीम भाई सिंगर से रिहर्सल तब तक नहीं कराते थे जब तक श्रवण भाई हारमोनियम पर न बैठें। क्योंकि नदीम भाई को ऐसा लगता था कि गाता मैं हूं लेकिन जो आवाज निकलती है वो श्रवण के हारमोनियम से निकलती है। रिहर्सल में मौज मस्ती करते थे हम लोग। ज्यादातर डबिंग सिंगर्स से श्रवण जी कराते थे। सिंगर्स उनके साथ ज्यादा कंफर्टेबल होते थे। श्रवण जी हर मायने में प्रभाव के आदमी, नेचर बहुत अच्छा। नेचर का बैलेंस होना जरूरी होता है। जैसे एक टेढ़ा हो तो एक का सीधा होना जरूरी था। नदीम जी किसी को डांट देते या कुछ बात हो जाए तो श्रवण भाई प्यार से उसको पटा लेते थे।

लाइट चली गई और गाना बना, ‘अखियां मिलाऊं कभी अखियां चुराऊं
मुझे गाने की मेकिंग का दिलचस्प किस्सा याद आ रहा है। एक शाम हम बैठे थे। अचानक लाइट चली गई। तब नदीम भाई ने बोला कि अब क्या करें। तब श्रवण भाई ने कहा कि नहीं भाई सिटिंग तो करेंगे बहुत अच्छा मूड बना है। तब उन्होंने कहा कि आज हम कैंडल लाइट सिटिंग करेंगे। श्रवण भाई मोमबत्ती ले आए और उसकी रोशनी में हमने पूरी रात सिटिंग की। उस रात कई कमाल के गाने बने। उसमें से एक गाना था राजा फिल्म का अंखिया मिलाऊं कभी अंखिया चुराऊं क्या तूने किया जादू।'

खाना भी, गाना भी, कपूर ब्रदर्स भी आ गए
नदीम भाई को आइसक्रीम खाने का बड़ा शौक था। जो लोग इनके घर आते थे वो जुमला बोलते थे कि नदीम-श्रवण के यहां ही एक ऐसा सिटिंग रूम है जहां खाना और गाना दोनों बड़ा अच्छा मिलता था। एक बार जब हम 'आ अब लौट चले' फिल्म कर रहे थे। तब एक शाम को कपूर बंधु ऋषि कपूर, रणधीर कपूर और राजीव कपूर श्रवण भाई के यहां आ गए। फिर तो महफिल जम गई। श्रवण भाई के यहां कुक खाना जबरदस्त बनाता था। रात से शुरू हुआ शराब और म्यूजिक का दौर सुबह तक चला। कपूर भाइयों ने भी गाना गाया था।

मजेदार शो की प्लानिंग थी पर ईश्वर ने कुछ और चाहा
मेरी बात लगातार श्रवण भाई से होती रहती थी। अभी 10 दिन पहले ही मैंने श्रवण को डांटा था कि अभी बाहर मत निकलो। वो बोला कुछ अर्जेंट काम था। मैंने कहा कि जिंदगी से अर्जेंट कुछ भी नहीं। हम अभी प्लान कर रहे थे कि हम दोनों साथ में इंडियन आइडल के स्टेज पर जाएंगे। मई में शूटिंग की प्लानिंग थी। श्रवण भाई ने कहा कि मजेदार शो होगा। नदीम भाई की वीडियो कांफ्रेंसिंग करवा लेंगे, लेकिन ईश्वर की इच्छा के आगे किसी की नहीं चलती। हमारा साथ इतना ही था। श्रवण भाई का संगीत हमेशा नई जनरेशन को नई ऊर्जा और ताजगी देगा। नदीम-श्रवण के काम से लोग सीखेंगे। मैं तो ईश्वर से यही निवेदन करता हूं कि मेरे दोस्त को अपने श्री-चरणों में स्थान दे और उसके परिवार को इस दुख को सहने की शक्ति दे।

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