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मूवी रिव्यू:राजनीतिक मुद्दा बनी 'शेरनी' की सच्ची कहानी, विद्या बालन ने फिल्म में बखूबी निभाया है फॉरेस्ट ऑफिसर का किरदार

भोपालएक महीने पहलेलेखक: आकाश खरे
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रेटिंग3.5/5
स्टारकास्टविद्या बालन, शरत सक्सेना, विजय राज, इला अरुण, बृजेंद्र काला, नीरज काबी और मुकुल चड्ढा
निर्देशकअमित वी. मसुरकर
निर्माताभूषण कुमार, कृष्ण कुमार, विक्रम मल्होत्रा, अमित वी. मसुरकर
म्यूजिकबेनेडिक्ट टेलर, नरेन चंदावरकर, बंदिश प्रोजेक्ट, उत्कर्ष धोतेकर
जोनरथ्रिलर
अवधि2 घंटे 15 मिनट

राजनीति एक ऐसा खेल है जो किसी भी मुद्दे पर खेला जा सकता है। फिल्म 'शेरनी' में शेरनी एक मुद्दा और पूरी फिल्म में उस पर किस तरह राजनीति की जाती है, बड़े ही सटीक तरीके से दिखाया गया है। जो लोग इस फिल्म के नाम से भ्रमित होकर यह सोच रहे हैं कि विद्या बालन ऐसी फॉरेस्ट ऑफिसर के रूप में नजर आएंगी, जो कई विलन्स को एक साथ मारेंगी। लेकिन, उन्हें इस फिल्म को देखकर निराशा होगी, क्योंकि पूरी फिल्म में कोई हीरोइक एक्ट नहीं है। हां विद्या का किरदार तेज-तर्रार जरूर है, पर उनका किरदार भी असल दुनिया के उन अच्छे लोगों की तरह है, जो कई बुरे लोगों से घिरे हुए रहते हैं। ऐसे लोग करना तो बहुत कुछ चाहते हैं, पर समाज में उन्हें दबा दिया जाता है। कुल मिलाकर उनके किरदार को कोई एक्सट्रा ऑर्डिनरी नहीं दिखाया गया है और ऐसा इसलिए क्योंकि यहां कहानी को सच्चा रखना जरूरी था।

निर्देशक अमित वी. मसुरकर इससे पहले फिल्म "न्यूटन' लेकर आए थे। यह फिल्म भी काफी हद तक उसी तरह है। यहां भी आपको जंगल, सरकारी ऑफिस और भ्रष्ट लोगों से लड़ता एक सरकारी मुलाजिम नजर आएगा। "न्यूटन' की तरह ही 'शेरनी' में भी समाज की कुछ कड़वी सच्चईयों और बुराईयों पर कटाक्ष किया गया है। इस तरह की फिल्म बनाने का फैसला करना ही अपने आप में काबिल-ए-तारीफ है।

कहानी फॉरेस्ट ऑफिसर विद्या के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो एक शेरनी को ट्रैक कर रही हैं, जो कई गांव वालों को मार चुकी है। उनके साथ काम करने वाले कुछ लोग अच्छे हैं और कुछ लोग बुरे। विद्या की कोशिश है कि वे इस शेरनी को पकड़कर नेशनल पार्क में छोड़ दें, पर कुछ लोग उस शेरनी को मारना चाहते हैं। वहीं कुछ उस पर राजनीति कर रहे हैं। अब अंत में विद्या अपनी कोशिशों में कामयाब हो पाएंगी या नहीं पूरी कहानी इस पर बेस्ड है।

फिल्म में विद्या बालन के अलावा बृजेंद्र काला, नीरज काबी, शरद सक्सेना, विजय राज, इला अरुण और मुकुल चड्‌ढा जैसे कलाकार भी नजर आ रहे हैं। सभी ने अपने-अपने हिस्से का काम बखूबी निभाया है। जब-जब विद्या स्क्रीन पर नजर आती हैं, एक पॉजिटिव फीलिंग बनी रहती है। अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं, तो पूरी फिल्म में दिखाए जाने वाले जंगल के विजुअल्स आपका दिल जीत लेंगे। इसके अलावा फिल्म का एकमात्र गाना "बंदर बांट' भी काफी कुछ कह जाता है। कलाकारों के डायलॉग ऐसे हैं, जैसे हम आम दिनचर्या में बात करते हैं।

वहीं फिल्म में कुछ सीन ऐसे हैं, जिनमें कोई डायलॉग ही नहीं है और वो कलाकारों के एक्सप्रेशन के दम पर और जबरदस्त दिखाई दे रहे हैं। इसमें एक डायलॉग है, जहां विजय राज कहते हैं-"टाइगर उस जंगल में है और उसे इस जंगल की तरफ जाना है। अब बीच में हमने एक तरफ हाईवे बना दिया है और एक तरफ फैक्ट्री। कैसे जाएगी वो इस जंगल से उस जंगल तक?" यह हमें एहसास कराता है कि हमनें जानवरों के रहने के लिए कोई जगह खाली छोड़ी ही नहीं है। कुल मिलाकर यह फिल्म करप्शन पर बात करती है, पुरुषवादी समाज पर कटाक्ष करती है और साथ ही साथ आदमी और जानवर के बीच के रिश्ते को बड़ी ही खूबसूरती से बयां भी करती है।

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