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डेथ एनिवर्सरी:अमिताभ को पछाड़कर सुपरस्टार बनने की राह पर थे विनोद खन्ना, मां की मौत ने दिया ऐसा झटका कि ओशो के आश्रम में बन गए संन्यासी

7 महीने पहले
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60 का वो दशक जब अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा, धर्मेंद्र और जितेंद्र जैसे एक्टरों का राज था, उस दौर में एक ऐसे चेहरे की एंट्री हुई, जिसने देखते ही देखते अमिताभ के साथ साथ बाकी सभी एक्टर्स के लिए खतरा पैदा कर दिया था। ये थे एक्टर विनोद खन्ना, जिनकी 27 अप्रैल को डेथ एनिवर्सरी है। 27 अप्रैल, 2017 को उनका निधन कैंसर से हुआ था।

फिल्में छोड़ बन गए संन्यासी
आज भले ही वो इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें हमेशा हिंदी सिनेमा के इतिहास में जिंदा रहेगी। वो एक ऐसे सुपरस्टार रहे जिन्हें मेगास्टार अमिताभ बच्चन का रिप्लेसमेंट या यूं कहें उनका कट्टर प्रतिद्वंद्वी माना जाने लगा था। लेकिन एक वक्त ऐसा आया जब विनोद खन्ना की जिंदगी में सब कुछ बिखर गया और उस चक्कर में उनकी बीवी और बच्चों-अक्षय खन्ना और राहुल खन्ना को बहुत कुछ सहन करना पड़ा।

ये था 80 का दशक। फिरोज खान की फिल्म 'कुर्बानी' में काम करने के बाद विनोद खन्ना ने चंद और फिल्मों में काम किया। उनकी फिल्में लगातार हिट हो रहीं थीं और कमाई भी अच्छी कर रहीं थीं, लेकिन अचानक ही विनोद खन्ना ने फिल्मों से संन्यास लेने की घोषणा कर दी और यह कहकर सभी को चौंका दिया कि वो अपने गुरू रजनीश यानि ओशो की शरण में जा रहे हैं।

महेश भट्ट के कहने पर ओशो की शरण में गए विनोद खन्ना
80 के दशक में कहा कहा जाने लगा था कि विनोद खन्ना जल्द ही अमिताभ को पीछे छोड़ इंडस्ट्री के टॉप सुपरस्टार बन जाएंगे लेकिन इसी दौरान अपनी मां के देहांत से विनोद खन्ना टूट गए। इसी समय उनके दोस्त महेश भट्ट ने उन्हें आध्यात्म की ओर जाने की सलाह देते हुए ओशो रजनीश के बारे में बताया।

एक इंटरव्यू में महेश भट्ट ने इस बात का जिक्र करते हुए कहा था, ज्यादा लोग नहीं जानते लेकिन मैं ही विनोद खन्ना को 'ओशो' रजनीश के पुणे आश्रम ले गया था। मां की मृत्यु से दुखी विनोद को मेरे साथ उस आश्रम में काफी सुकून मिला। हम दोनों संन्यासी बन गए। हम उन दिनों भगवा चोला पहना करते थे।

कुछ समय बाद मैं आश्रम से निकल आया लेकिन विनोद वहीं रुक गए। उन्हें ओशो ने वहां रुकने के लिए मना लिया और फिर वह विनोद को अपने साथ अमेरिका ले गए। पांच वर्ष तक संन्यासी जीवन जीने के बाद विनोद फिर से मुंबई आ गए और फिल्मी दुनिया में दोबारा कदम रखा। विनोद खन्ना की फिल्मों में फिर से जगह बनाने की कोशिश नाकाम रही। ब्लेडर कैंसर के चलते 27 अप्रैल, 2017 को विनोद खन्ना का निधन हो गया था।

बेहद गहरी थी दोनों की दोस्ती
महेश भट्ट को सबसे पहले विनोद खन्ना को 1979 में आई फिल्म 'लहू के दो रंग' में डायरेक्ट करने का मौका मिला था। तब विनोद खन्ना को इंडस्ट्री में पांच साल ही हुए थे। इसके बाद दोनों दोस्त बन गए। एक इंटरव्यू में महेश भट्ट ने कहा था, 'हम करीबी दोस्त थे। हम उनकी मर्सिडीज में ओशो आश्रम जाया करते थे। मेरे पास पैसा नहीं था। वह मेरी देखभाल करते थे और मेरी ट्रेवलिंग का खर्चा उठाते थे। वह सही मायनों में मेरे सीनियर थे।' महेश भट्ट ने विनोद खन्ना के साथ जुर्म (1990) और मार्ग (1992) में काम किया था।

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