द कश्मीर फाइल्स के राइटर सौरभ एम. पांडे से बातचीत:घाटी में औरतों से सड़कों पर रेप हुआ, बच्चों की आंख पर गोली मारी गई

मुंबई7 महीने पहलेलेखक: उमेश कुमार उपाध्याय
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11 मार्च को रिलीज हुई फिल्म द कश्मीर फाइल्स लगातार बॉक्स ऑफिस पर बड़े रिकॉर्ड बना रही है। फिल्म को इंटेंस और सभी तथ्यों को सामने रखकर बनाने में डायरेक्टर विवेक रंजन अग्निहोत्री और उनकी टीम की कड़ी मेहनत और घंटों की रिसर्च लगी है। फिल्म के राइटर और रिसर्चर सौरभ एम. पांडे ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत में फिल्म से जुड़े कुछ फैक्ट्स बताए...

लोगों की कहानियां सुनकर लगा कि मेरी सामने घटनाएं घट रही हैं
जब पढ़ता और लोगों से सुनता था कि डेढ़-दो साल के बच्चे की आंख पर बंदूक रखकर मार दिया, औरतों का खुली सड़क पर रेप किया, नदी में फेंक दिया, घर छोड़कर भागने के लिए मजबूर किया, चारों तरफ नारे लगाए गए। वहां के लोगों में दहशत भर दी गई और उस दहशत, डर के बीच जम्मू कैंप तक किस हालत में पहुंचे होंगे, अंदाजा लगा सकते हैं, लेकिन वहां पर किसी ने उनके लिए कुछ नहीं किया।

इन चीजों को कहने में घिन आती है। लोगों से यह सब सुनकर ऐसा लग रहा था कि मेरी आंखों के सामने वह सब कुछ हो रहा है और असहाय होकर सुन रहा हूं। अब चीजें बन गईं, तब मुझे अजीब-सी फीलिंग आती है। लगता है कि छोटा-सा कॉन्ट्रिब्यूट किया। शायद उस चीज को एक्नॉलेज मिले, उस चीज को लोग समझें और दोबारा ऐसा कुछ न हो। भगवान से यही प्रार्थना है कि ऐसा कभी दोबारा न हो।

कहानी लिखने बैठा, तब स्वर्ग की इमेज खराब दिखने लगी
बचपन में पढ़ा था कि कश्मीर धरती का स्वर्ग है। फिर पता लगा कि पूरा परसेप्शन ही गलत था। यह जो स्वर्ग है, वह तो नर्क से भी गंदा है। वहां पर नरसंहार हो रहा है, लोग मारे जा रहे हैं। कहानी लिखने बैठा, तब एक स्वर्ग की इमेज जो बनी थी, वह खराब हो गई। ऐसा लगा कि एक अलग इल्यूजन में जी रहा हूं। वहां का एक समाज जो सबसे शिक्षित वर्ग था, जो सबसे शांति से रहने वाला समाज था, उस समाज को वहां से प्रताड़ित करके भगा दिया गया और हम चुप थे। जब लोगों का इंटरव्यू करते थे, तब उनका और बच्चों का दर्द सुनना बड़ा मुश्किल होता था।

फिल्म में एक डायलॉग है- टूटे हुए लोग बोलते नहीं, उन्हें सुनना पड़ता है। यही उनकी हालत थी। कैंप में रहने वालों के बदन पर छाले पड़ गए थे। जो घरों में रहते थे, उनके बच्चे सड़कों पर सोने को मजबूर थे। भूखे रहे। यह सब लिखते समय ऐसा लग रहा था कि उनके साथ एक जिंदगी जी रहा हूं। अंदर से आवाज आती थी कि भगवान यह सब कभी किसी के साथ मत करना। यह नहीं होना चाहिए।

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सारी चीजें न तो बोली जा सकती हैं और न ही दिखाई जा सकती हैं
फिल्म की एक समय-सीमा होती है। उसमें ही सब कुछ दिखाया जाना तय होता है। मैंने जितना पढ़ा, जितना रिसर्च किया, उस अंदाजे से बोल रहा हूं कि यह तो हमने 5-10% चीजें बोली हैं। 5% कहने का मतलब यह है कि कहानी तो 4-5 लोगों की ही दिखा सकते हैं, जबकि वहां से निकले तो लाखों लोग हैं। उन्हीं 4-5 लोगों को आधार बनाकर इमोशन को रिवील करते हैं। उसके बेसिस पर बोल रहा हूं।

खैर, वहां की सारी चीजें न तो बोली जा सकती हैं और न ही दिखाई जा सकती हैं, क्योंकि उसे बोलने मे भी शर्म आएगी और सुनने में भी शर्म आएगी। बेहतर है कि लोग जाकर उन चीजों के बारे में पढ़े, जो मौजूद हैं। जिन्होंने किया, उन्हें भी ग्लानि हो और जो पाप कर रखा है, उसका प्रायश्चित करें।

रिसर्च और स्क्रिप्टिंग में लगा साढ़े तीन साल
सौरभ ने कहा, फिल्म का आइडिया विवेक अग्निहोत्री का था। विवेक सर के साथ ताशकंद फाइल्स में भी काम कर चुका हूं। उसमें रिसर्चर और स्क्रिप्ट सुपरवाइजर था। मेरा काम अच्छा लगा, तब उन्होंने द कश्मीर फाइल्स पर काम करने के लिए कहा। हमने रिसर्च करना शुरू किया तो तकरीबन दो साल तक रिसर्च चली।

इस दौरान 700 इंटरव्यू किए। जितनी किताबें मिलीं, उन्हें पढ़ा। किताबों को काउंट तो नहीं किया, पर 15 से 20 किताबें जरूर पढ़ी होंगी। न्यूज और आर्टिकल खोजकर निकाले और जानकारियां इकट्‌ठा कीं। फाइंड आउट किया कि कश्मीरी लोगों के साथ क्या हुआ था। इसके बाद स्क्रिप्टिंग के प्रोसेस पर गए। हमें कुल साढ़े तीन साल रिसर्च करने और स्क्रिप्ट लिखने में लगा। फिर जाकर हम शूटिंग के लिए रेडी हुए।

रिसर्च के लिए एक किताब को दोबारा पढ़ना पड़ा
रिसर्च का एक पैटर्न होता है, जो हमारा स्ट्रक्चर है, पहले हम बुक पढ़ते हैं। फिर उस बुक की एक समरी बनती है। हर बुक का एक प्वाइंटर बनता है। प्वाइंटर के बाद फैक्ट चेक किया जाता है कि कितना सही है। क्या यूज करना और क्या नहीं करना है। उसके बाद एक प्रॉपर बाइबल बनता है, जिसमें प्वाइंट-दर-प्वाइंट लिखा होता है। जब कभी उस प्वाइंट को और जानने की जरूरत पड़ती है, तब उसे दोबारा-दोबारा पढ़ना पड़ता है। बेसिक रिसर्च के बाद कहानी का स्ट्रक्चर खड़ा होता है। फिर स्क्रीन प्ले तैयार किया जाता है। इस सबके लिए एक से डेढ़ साल लगे, क्योंकि इसके कई सारे ड्राफ्ट बने थे। इसमें किसी की फोटो नहीं, बल्कि कहानी ही हीरो थी।

दिल्ली, मुंबई से लेकर कनाडा, USA और जर्मनी तक इंटरव्यू लेने गए
जिन पर अत्याचार हुए थे उनसे, उनकी फैमिली से और उनके आसपास के लोगों से, जो बात करने के लिए एग्री हुए, उन सबसे बात करने के लिए दिल्ली, मुंबई, जम्मू, कनाडा, USA, जर्मनी सहित दुनिया में जहां-जहां कश्मीर से लोग गए हैं, वहां हमारी टीम गई और उनका इंटरव्यू लिया। उनके साथ क्या हुआ था, उसके बारे में विस्तारपूर्वक जाना-समझा।

सबसे चैलेंजिंग बात यह थी कि बतौर राइटर जब इन्वॉल्व हुआ, तब उस चीज को महसूस करने लगा तो वह कंटीन्यू एक पीड़ा बन गई। धीरे-धीरे यह फिल्म मेरे लिए फिल्म नहीं, हकीकत बन गई। इसके साथ अंतर्मन से जुड़ गया, तब मुझे कहीं न कहीं बहुत ज्यादा बुरा लगता था कि जो भी हुआ, वह नहीं होना चाहिए था। अगर यह नहीं हुआ होता, तब मुझे यह सब पढ़ना नहीं पड़ता।

रिसर्च के लिए दो टीम बनी, 99% वीडियो इंटरव्यू किया
रिसर्च के लिए हमारी दो टीम बनी थीं। एक टीम में मैं और दूसरी टीम के साथ विवेक सर ने काम किया। एक टीम में चार-पांच लोग थे। एक कैमरा पर्सन, एक असिस्टेंट, एक सवाल करने वाला, एक साउंड का रिकॉर्ड करने वाला और एक रिसर्चर होता था।

मैं अपनी टीम के साथ मुंबई, दिल्ली, जम्मू आदि जगहों पर रिसर्च के लिए गया, जबकि विवेक सर की टीम अब्रॉड जाकर कवर किया। 99% वीडियो इंटरव्यू किए और जहां कहीं लगा कि वीडियो पॉसिबल नहीं है, वहां ऑडियो इंटरव्यू लिया गया।

कश्मीरी हिंदू के बगैर कश्मीर अधूरा है
आज सोसायटी का बैलेंस बहुत खराब हो रहा है। इंसानी तौर पर अगर आप में सोचने-समझने की क्षमता है, तब उसको इस्तेमाल कीजिए। मैं कहूंगा कि अगर सीखना है, तब कश्मीरी हिंदुओं से सीख लें। उनके साथ इतना गलत हुआ, पर कभी बंदूक नहीं उठाई। इसके लिए पूरी कम्यूनिटी की रिस्पेक्ट करनी चाहिए। हर किसी को कोशिश करना चाहिए कि दोबारा वहां जाएं और शांति-सुकून के साथ वहां रहें। कश्मीरी हिंदू के बगैर कश्मीर अधूरा है।

आंखों के सामने एक ही तस्वीर नाच उठती थी कि क्यों हुआ
फिल्म में नाडरमर का एक एक्सीडेंट है, उसे पढ़कर शॉक लगा था, लेकिन जब उनका इंटरव्यू करने गया, तब वह परिवार का इकलौता बच्चा था, जो बच गया था। हुआ यह था कि उसके दादाजी जम्मू जाने वाले थे, लेकिन दादाजी की जगह वह चला गया, जिससे बच गया। अभी भी उन्हें देखेंगे, तब साफ लगता है कि वे कोमा से निकल नहीं पाए हैं। उनकी बातों में वह पीड़ा और दर्द साफ दिखाई दिया। ऐसा लग रहा था कि एक विक्टिम मेरी आंखों के सामने बैठा है और उसकी फैमिली और आसपास के 20-21 लोगों को एक साथ खड़ा करके मार दिया गया। आंखों के सामने एक ही तस्वीर नाच उठती थी कि क्यों हुआ? अगर हुआ, तब किसी को पता क्यों नहीं लगा? फिर सोचा कि हम यह सच बताने की कोशिश करते हैं।

फिल्म का असर यह पड़ा कि इंसानियत को मरने नहीं दूंगा
हर कहानी मन-मस्तिष्क पर कुछ न कुछ असर छोड़ जाती है। मुझ पर इस फिल्म का असर यह रहा कि अपने अंदर की इंसानियत को कभी मरने नहीं दूंगा। उम्मीद करूंगा कि इस तरह की चीजें न हों। अगर इस तरह की चीजें कहीं होती हैं, तब मेरी क्षमता में जो भी होगा, वह करूंगा। एक होता है कि ढिंढोरा पीटना, जबकि दूसरा कॉन्ट्रिब्यूट करना होता है। मैं जितना कॉन्ट्रिब्यूट कर सकता हूं, उतना कॉन्ट्रिब्यूट करूंगा। मुझे रोज बेहतर इंसान बनने की कोशिश करना है। एक-दूसरे इंसान की वैल्यू करनी है।