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खुदा हाफिज फिल्म रिव्यू:हाई एंड वाली फिल्म 'खुदा हाफिज' में मोहब्‍बत का इम्तिहान लेती मंदी और माइग्रेशन, गानों में दिखा जोर तो एक्शन सीन में नहीं दिखा फ्लो

अमित कर्णएक महीने पहले
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  • अवधि – दो घंटे 13 मिनट
  • स्‍टार- ढाई स्‍टार

साल 2008 की मंदी के बैकड्रॉप में सेट ‘खुदा हाफिज’ सच्‍ची घटना से प्रेरित है। कहानी लखनऊ के शादीशुदा दंपति समीर और नरगिस की है। जॉब की आस में नोमान गई नरगिस देह व्‍यापार के गिरोह की शिकार हो जाती है। समीर फिर किन मुसीबतों को झेलता हुआ विदेशी सरजमीं पर जाकर देह व्‍यापार के सरगनाओं से अपनी नरगिस को वापस लाता है, कहानी उसकी है।

असल कहानी पर आधारित है फिल्म

तकनीकी तौर पर इस तरह की कहानियों को ‘हाई एंड कॉन्‍सेप्‍ट’ कहा जाता है। साथ ही यह कहानी सच्‍ची घटना से प्रेरित है। हैदराबाद के एक कपल के साथ ऐसा हुआ था। वहां भी युवक एक खाड़ी मुल्‍क से अपनी पत्‍नी को वापस लाने में कामयाब हुआ था। उस युवक के विद्युत जाम्‍बाल जैसे यकीनन डोले शोले नहीं रहे होंगे। जाहिर है वह उस मुल्‍क की रक्षा और न्‍याय व्‍यवस्‍था की मदद से अपनी पत्‍नी को वापस लाने में सफल रहा होगा। यहां मगर दुश्‍मनों को धूल चटाते हुए समीर अपनी नरगिस को वापिस ले आता है।

कुछ हिस्सों में निराश करती है फिल्म

फिल्‍म बस यहीं जरा निराश करती है। इसका टॉपिक तो लार्जर दैन लाइफ है, पर ट्रीटमेंट औसत । नौकरियों के प्रलोभन देकर युवतियों को देह व्‍यापार में झोंकने वालों का जाल देश विदेश हर जगह फैला हुआ है। उस कारोबार के संचालक प्रभावशाली होते हैं। पहुंच पुलिस और आर्मी तक होती है। हमेशा हुक्‍के और सिगरेट के कश की आगोश में होता है। विदेशी सरजमीं पर कोई ऐसा दोस्‍त मिलता है, जो हीरो की मदद करता है। पुलिस पहले तंग करती है, फिर हेल्‍प भी।

फिल्म में सस्पेंस की कमी

फिल्‍म में इन्‍हीं सब क्‍लीशे का उपयोग किया गया है। इससे स्‍टोरीलाइन बड़ी प्रेडिक्‍टेबल बन जाती है। पता लग जाता है कि कहानी और घटनाक्रम किस तरह मोड़ लेगी। पूरा बोझ विद्युत और विदेश में समीर की मदद करने वाले उस्‍मान यानी अन्‍नू कपूर पर है। आगे चलकर वह फैज अबू मलिक और तमीना अल हामिद में बंटती है। नरगिस पूरी फिल्‍म में होकर भी कैमियो सी बन पड़ी है।

एक्शन सीन में दिखा उतार-चढ़ाव

देह व्‍यापार के सरगना इजक रेगिनी की लंका तक समीर बड़ी आसानी से पहुंचता है। डायरेक्‍टर फारुख कबीर इसे सधी हुई थ्रिलर नहीं बना पाते। वो दरअसल द्वंद्व में भी रहे हैं। समीर के तौर पर विद्दुत से आधे अधूरे आम आदमियों वाले एक्‍शन करवाए हैं तो कभी कभार वही टिपिकल एक्‍शन के अवतार विद्युत जाम्‍बाल के तौर पर दिखाया है। नरगिस की खोज आधे में आम आदमी के नजरिए से तो आधे में रैंबो स्‍टाइल में।

कहानी नोमान से बैतूसेफ और शर्म अल शेख घूमती रहती है। वहां के कमांडर तमीना हामिद और फैज अबू मलिक के रोल में आहना कुमरा और शिव पंडित ने उस एक्‍सेंट को पकड़ा है, पर असर छोड़ने में विफल रहे हैं। विद्युत जाम्‍बाल की कोशिश नजर आती है। अपने कंधों पर वह फिल्‍म को खींचते हैं। विलेन इजक रेगिनी बने नवाब शाह पर्दे पर बेरहमी लाते हैं। नरगिस बनी शिवालिका ओबेरॉय स्‍क्रीन प्रजेंस दर्ज करती हैं , पर किडनैप होने के बाद उनके हिस्‍से में कोई डायलॉग नहीं है। उस्‍मान अली मोराद में अन्‍नू कपूर असरदार लगे हैं।

फिल्म के गाने हैं बेहतरीन

गाने अच्‍छे बन पड़े हैं। खासकर ‘एहसास की जुबान बन गए, आप हमारी जान बन गए’। नोमान और बैतूसेफ को उज्‍बेकिस्‍तान में रीक्रिएट किया गया है, पर वहां की खूबसूरती और बंजरपन को कैप्‍चर कर पाने में सिनेमैटोग्राफर चूक गए हैं। लगा है कि जल्दबाजी में शॉट टेकिंग ली गई है। शहर के लैंडमार्क इलाके रिपीटिटिव तौर दिखाए गए हैं। कुल मिलाकर देह व्‍यापार जैसे मसले की ट्रीममेंट सतही कर दी गई है। एक संदेश है फिल्‍म में कि प्‍यार सच्‍चा हो तो मंदी हो या कोई और मुसीबत, जीत मुहब्‍बत की होती है।

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