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इंटरव्यू:'पवित्र रिश्ता-2' के स्टार शहीर शेख ने कहा-एक टीवी एक्टर के पास नहीं होते हैं ज्यादा ऑप्शन

मुंबई4 महीने पहलेलेखक: उमेश कुमार उपाध्याय
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पॉपुलर टीवी शो 'पवित्र रिश्ता-2' में इस बार अंकिता लोखंडे और शहीर शेख की जोड़ी देखने को मिलेगी। 8 एपिसोड के इस शो की शूटिंग लगभग हो चुकी है। ज्यादातर सीन रियल लोकेशन पर शूट किए गए हैं। अब हाल ही में दैनिक भास्कर को दिए इंटरव्यू में शहीर शेख ने शो में अंकिता के साथ काम करने, सेट का अनुभव और टेलीविजन को एक नई ऊंचाई पर ले जाने आदि के बारे में बताया है।

'पवित्र रिश्ता-2' में कैसा किरदार है, उसे जीवंत करने के लिए क्या खास करना पड़ा, क्या इसे फॉलो करते आए हैं ?
मानव का किरदार जो पिछले सीजन में था, इस बार भी वही है। स्टोरी लाइन भी वही है। इसे आज के दौर के हिसाब से नयेपन के साथ पेश किया जा रहा है, मगर ऑल ओवर कॉन्सेप्ट सेम है। इसका पिछला सीजन आया था, तब थोड़ा-बहुत देखा था। ऊषा ताई जो शो में मेरी मां बनी हैं। वे अक्सर सेट पर मुझे मराठी बोलना सिखाती थीं, क्योंकि मानव एक महाराष्ट्रीयन लड़का है। मराठी में कुछ शब्द को बोलना और उसका लहजा पकड़ना जरूरी था, इसलिए उनके साथ अक्सर प्रैक्टिस किया करता था। कुछ असिस्टेंट डायरेक्टर ने भी मदद की। इसके साथ में कैरेक्टर को प्रोट्रे करने के लिए उसकी सोच, फीलिंग और इमोशनल ग्रॉफ को समझना ज्यादा जरूरी था। मेकर्स जो चाह रहे थे, उनसे समझने की भी कोशिश की।

सुशांत सिंह राजपूत को हितेन तेजवानी ने रिप्लेस किया था, अब हितेन को आप रिप्लेस कर रहे हैं, ऑडियंस आपको एक्सेप्ट करे, इसका प्रेशर और चुनौतियां किस तरह से रहीं ?
ऑफ कोर्स, उसका एक एडिट प्रेशर होता है। वैसे तो हर शो में होता है कि दर्शक पसंद करेंगे या नहीं। मगर किसी ने पहले अच्छे से कैरेक्टर प्ले किया है, तब उसका एडिट प्रेशर जरूर होता है। मैं इससे इनकार नहीं करूंगा, लेकिन मैंने सोचा कि इसे 100 पर्सेंट के साथ एक अलग फ्रेशनेस दूंगा। ऑडियंस एक्सेप्ट करे या नहीं, वह मेरे हाथ में नहीं है, इसलिए उसका ज्यादा प्रेशर नहीं ले सकता। यह सोचकर अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है। डायरेक्टर ने कभी कैरेक्टर को कॉपी करने के लिए नहीं कहा। उन्होंने यह जो आजादी दी, वह अच्छी लगी। शायद यह ऑडियंस को पसंद आएगी।

अंकिता लोखंडे के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा, उनसे जुड़ा कोई स्पेशल किस्सा है ?
अंकिता के साथ सीन शूट करने से पहले बहुत नर्वस था। नर्वस इसलिए था कि वे मुझे बतौर मानव एक्सेप्ट कर पाएंगी या नहीं। लेकिन, पहली बार जब साथ में हमारा फोटो शूट हुआ, तब उन्होंने थम्सअप दिखाकर पॉजिटिव रिस्पांस दिया। उनके रिस्पांस से पता चला कि मानव जैसा दिख रहा हूं और वे एक्सेप्ट कर पाएंगी, तब जाकर रिलीफ मिला कि मैंने कहीं तो कुछ सही किया। मुझे जहां तक पता था कि यह शो अंकिता के दिल के बहुत करीब है।

इस शो के सेट पर का कोई रोचक किस्सा ?
शो की पुरानी कास्ट का मानना है कि रोमांस, बारिश और गणपति बप्पा, ये तीनों पवित्र रिश्ता के लिए मेन हैं। हमें ऑल मोस्ट रोज शूट में भिगाया जाता है। रोजाना एक न एक सीक्वेंस बारिश का होता ही है, जिसमें भीगना पड़ता है। चैलेंजिंग बात यह है कि रात में दो-तीन बजे शूट कर रहे होते हैं और उस समय बारिश के ठंडे-ठंडे पानी में भीगना पड़ता है। अब यह स्थिति समझ सकते हैं। यह मेरे और अंकिता, दोनों के लिए चैलेंजिंग होता है, क्योंकि ज्यादातर हम दोनों के ही बारिश के सीन होते हैं। लेकिन, सीन शूट करने के बाद स्क्रीन पर देखते हैं, तब बड़ा खूबसूरत लगता है। हां, जब बारिश के सीन चल रहे होते हैं, तब आग जलाकर उसके सामने बैठने और मसाला चाय पीने का मौका मिलता है। ये बातें हमेशा याद रहेंगी।

देखा जाए, तब टेलीविजन पर आपकी रोमांटिंक इमेज बनी है, करियर को लेकर यह रणनीति है या फिर संयोगवश ऐसे कैरेक्टर निभाते चले गए ?
मुझे जो भी मिलता गया, उसे निभाता चला गया। मैं खुद सरप्राइज होता हूं कि यह इमेज कब और कैसे बनी। पीछे मुड़कर देखता हूं, तब दो-तीन शोज में जो रोमांटिक कैरेक्टर प्ले किया, शायद इस वजह से रोमांटिक इमेज बन गई। लेकिन, ऐसा प्लान तो बिल्कुल नहीं था। दरअसल, एक टीवी एक्टर के पास ज्यादा ऑप्शन नहीं होते हैं। मेरे पास जब जो ऑप्शन आया, उसे लेता चला गया।

टेलीविजन की अपेक्षा वेब शो की शूटिंग करने पर कितना रिलेक्स महसूस हुआ ?
अच्छा एक्सप्रीरियंस रहा, क्योंकि वेब शो में सीन पर ज्यादा काम करने का मौका मिलता है। टेलीविजन में जहां आधे घंटे में सीन खत्म करना होता है, वहां वेब शो में दो-ढाई घंटे मिल जाते हैं। एक्स्ट्रा टाइम जो मिलता है, उसमें अपने कैरेक्टर में और निखार ला सकते हैं। छोटी-छोटी बातों पर डायरेक्टर के साथ सलाह-मशविरा कर सकते हैं। अच्छे से शूट करने के लिए क्रिएटिव और डीओपी को भी टाइम मिलता है।

एक दशक से टेलीविजन पर सक्रिय हैं, फिल्म, शॉर्ट फिल्म और अब वेब सीरीज का इफेक्ट टेलीविजन पर किस तरह से देखते हैं ?
टेलीविजन की एक अपनी जगह है। उसकी अपनी ऑडियंस है। मुझे लगता है कि टेलीविजन बहुत इंपोर्टेंट है। शायद लोग वेब सीरीज को उतनी इंपोर्टेंस नहीं देते हैं। मुझे इतने लोग पहचानते हैं, वे इतनी दुआएं देते हैं, क्योंकि रोज शाम को उनकी टीवी पर आता हूं और उन्हें एंटरटेन करता हूं। उनके साथ एक रिश्ता जुड़ जाता है। आइ थिंक, यह बात टीवी में ही है। अगर एक कैरेक्टर डेढ़ साल तक आपको नया एपिसोड देकर एंटरटेन कर रहा है, वह बहुत बड़ी बात होती है। इसे कर पाना भी अपने आपमें एक चैलेंज है और लोग इसे अप्रिशिएट भी करते हैं।

आपके अनुसार, टेलीविजन को एक अलग ऊंचाई पर ले जाने के लिए क्या किया जाना चाहिए ?
आइ थिंक, 30 साल पहले टेलीविजन के लिए जिस तरह का कंटेंट बनाते थे। अब शो का जो मूल मुद्दा होता है, वह उतना स्ट्रांग नहीं होता है। इसका एक रीजन यह भी है कि हमारे शोज बहुत लंबे होते हैं। पहले बहुत अमेजिंग शो आते थे। नुक्कड़, हमलोग, मालगुडी डेज आदि शोज मुझे आज तक याद हैं। हां, वे इतने लंबे नहीं चलते थे, पर अच्छे शोज होते थे। अभी भी अच्छे शोज बनते हैं, पर हमारे लिए आगे जाने के लिए रास्ता काफी लंबा है। टेलीविजन में अभी बहुत सुधार आना बाकी है। मुझे लगता है कि मेरे जैसे एक्टर्स, प्रोड्यूसर्स और राइटर्स खुद कोशिश करें, तब टेलीविजन में सुधार आ सकता है। हमारी इंडस्ट्री क्वांटिटी में ज्यादा विश्वास करती है, जबकि क्वालिटी में नहीं। अगर यह उल्टा हो जाए, तब बहुत अच्छा होगा।

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