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कांग्रेस मुक्त नहीं, युक्त गुजरात, यह भाजपा की जीत नहीं, हार है

bhaskar news | Last Modified - Dec 18, 2017, 07:53 PM IST

गुजरात के 22 वर्ष के इतिहास में भाजपा को सबसे कम सीटें मिली हैं
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    150 प्लस का टारगेट की बात करने वाली भाजपा को 99 सीटों से ही संतोष करना पड़ा।

    अहमदाबाद। गुजरात की जनता ने पुनरावर्तन को बढ़ावा दिया है, राज्य में एक बार फिर भगवा फहराया है। परंतु इस बार भगवे का रंग थोड़ा फीका है। गुजरात के 22 साल के इतिहास में इस बार भाजपा को सबसे कम सीटें मिली हैं। दूसरी ओर कांग्रेस ने पहले की अपेक्षा 20 सीटें अधिक प्राप्त की हैं। कांग्रेस मुक्त का सपना हुआ चूर-चूर...

    अपने भाषण में भाजपा नेता नागरिकों से यही अपील करते थे कि उन्हें कांग्रेस मुक्त राज्य बनाना है, पर अब कांग्रेस ने यह साबित कर दिखाया कि कांग्रेस मुक्त करने का भाजपा का सपना चूर-चूर हो गया है। अब कांग्रेस युक्त की बात की जाए, तो ही बेहतर होगा। जब राज्य में मोदी लहर नहीं थी, तब भी भाजपा को 100 से कम सीटें कभी नहीं मिली। अब इस चुनाव को 2019 के पहले का सेमीफाइनल मान लिया जाए, तो इस बार भाजपा के दो अंकों में ही सीमित होना पड़ा। इस बार चुनाव में भाजपा को एक प्रतिशत अधिक वोट मिले, पर सीट कम हो गई। दूसरी ओर कांग्रेस का वोटिंग प्रतिशत बढ़कर दो प्रतिशत हो गया है। साथ ही सीट में भी बढोत्तरी हुई है।

    गुजरात मॉडल में दरार

    भाजपा वर्ष 2014 पहले से देश में गुजरात मॉडल की बातें करती थीं। उसी आधार पर ही केंद्र में सत्ता प्राप्त करने में कामयाब रही। गुजरात विधानसभा की 2017 के चुनाव गुजरात मॉडल में ही दरार देखने को मिली।इस बार के चुनाव पीएम मोदी की आर्थिक नीतियों के परिणामों को उजागर करता है।भाजपा की सीटें दो आंकड़ों में ही सिमट गई हैं। इसका कारण व्यवसायी वर्ग में भाजपा के प्रति असंतोष है। इन हालात में मोदी और भाजपा के सामने भविष्य में इस वर्ग को अपने साथ लाना एक बड़ी चुनौती है। यदि इस बार आर्थिक नीतियों में सुधार किया जाता है, तो नाराज व्यवसायी वर्ग भाजपा के साथ जुड़ सकता है। इससे 2019 का चुनाव भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण नहीं होगा।

    भाजपा जीत कर भी हारी

    गुजरात में भाजपा सत्ता परिवर्तन कराने में विफल रही, परंतु एक तरह से भाजपा की यह जीत सीट की दृष्टि से हार ही मानी जाएगी। गुजरात में भाजपा को पाटीदार आंदोलन, जीएसटी, नोटबंदी या अन्य जातियों की नाराजगी के असर के चलते भाजपा को 100 सीटें पाने में भी मशक्कत करनी पड़ी। गुजरात में भाजपा दो दशक से भी अधिक समय से सत्ता पर है, ऐसे में पार्टी को अब किसानों की नाराजगी दूर करनी होगी। ग्रामीण इलाकों में भाजपा को अपेक्षाकृत कम सीटें मिली हैं। ऐसे में 2019 के चुनाव जीतने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा को अपना आधार स्तंभ मजबूत करना होगा।

    जहां से शुरुआत, वहीं लगा ब्रेक

    गुजरात विधानसभा के चुनाव में भाजपा ने 150 प्लस का टारगेट रखा था, परंतु उसे 100 सीटें प्राप्त करने में ही पसीना आ गया। 2014 में लोकसभा चुनाव में भाजपा ने गुजरात की सभी 26 सीटें जीतने के बाद कांग्रेस मुक्त भारत की घोषणा की। 2014 के बाद बिहार, पंजाब के बाद भाजपा का ही भगवा लहराया है। यदि बिहार में जोड़तोड़ कर भाजपा के गठबंधन वाली सरकार बनी हे, तो यह अलग बात है। गुजरात विधानसभा 2017 के चुनाव परिणाम भाजपा के लिए कांग्रेस मुक्त देश के अभियान पर ब्रेक कहा जा सकता है। क्योंकि भाजपा की सीटें कम हुई हैं। दूसरी ओर कांग्रेस मजबूत हुई है। 2012 की तुलना में कांग्रेस को 20 सीटें अधिक मिली हैं। कांग्रेस मुक्त सरकार बनाने की घोषणा गुजरात से हुई थी, तो 2017 के इस विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद भाजपा के अभियान पर ब्रेक भी वहीं लग गया है।

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    गुजरात में भाजपा पहली बार दो आंकड़ों में ही सिमट गई।
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    22 साल के इतिहास में भाजपा को सबसे कम सीटें मिली।
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Web Title: BJP Not Save Their Seat And Decearse Their Seats In 22 Years
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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