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गुजरात विधानसभा चुनाव : पुरानों की मुसीबत, नए का ज़माना

स दौर में जो चुनावों के पुराने खिलाड़ी हैं, उन्हें बड़ा डर लग रहा है। जहां भी जाते हैं, उनकी बदनामी पहले पहुंच जाती है।

Dainik Bhaskar

Dec 03, 2017, 03:38 AM IST
Challenges in front of old candidates in Gujarat elections

किताबें बताती हैं- ग्रीस में सिकंदर और उसकी चंदन की कुर्सी के बारे में कई गीत लिखे गए। ज़ाहिर है ये गीत यहां मेसीडोनिया से आए होंगे। लेकिन भारत में तो वह आक्रांता था, इसलिए यहां के लोकगीतों में उसके प्रति कड़वाहट है। होनी ही थी। इसी का उल्टा वाक़या इज़्ज़त बेग के बारे में मिलता है। जब वह हमारे देश में आया और उसने एक सुंदर कुम्हारन से प्रेम किया तो हमने उसके बारे में कई तरह के गीत लिखे। जब समरकंद वालों से पूछा गया कि क्या आपने भी ऐसा कुछ लिखा है तो जवाब मिला- हमारे देश में तो वह बस, एक अमीर सौदागर का बेटा था। और कुछ भी नहीं। प्रेमी तो वो आपके देश जाकर बना। सो गीत आपको ही लिखने थे। हम कैसे लिखते?


कम अंतर की जीत के इस दौर में जो चुनावों के पुराने खिलाड़ी हैं, उन्हें बड़ा डर लग रहा है। जहां भी जाते हैं, उनकी बदनामी पहले पहुंच जाती है। उनमें अच्छाई भी होगी लेकिन सब जानते हैं कि बुराई कहीं भी जल्दी पहुंच जाती है। ऐसे में नए प्रत्याशियों की बड़ी मौज है। उनकी अच्छाइयां बेशक लोगों के सामने नहीं होती, लेकिन बुराइयां भी नहीं होतीं। यही वजह है कि जिस पार्टी की सरकार होती है, कहा जाता है कि जितने टिकट काटे जाएंगे, जीत उतनी ही ज़्यादा पक्की होगी। यही हुआ भी है। दरअसल, जो व्यवस्था के खिलाफ वोट होते हैं, नए प्रत्याशियों की वजह से उनसे पार पाना आसान हो जाता है।

पुराणों की चर्चा लोग कुछ इस तरह करते हैं- एक ने कहा- हमारे इलाके के बड़े नेता हैं, वोट इन्हीं को देना। दूसरी तरफ़ से बुजुर्ग बोले- नेता होंगे तुम्हारे लिए। हमारे लिए तो गांव के दर्जी का बेटा भर है। बाप लोगों के कपड़े सी-सी कर बूढ़ा हो गया और ये बड़ा सफ़ेदी लगाए घूमते हैं। बड़े आए नेता। अब दर्ज़ी के घर पैदा होना कोई पाप तो नहीं है। बुराई भी नहीं। लेकिन बुजुर्गवार जानते थे। सो मार दिया ताना। भला, किसकी जुबान कौन पकड़े! जितने मुंह। उतनी बातें।

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