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इनके पिता और चाचा बनाते थे फर्नीचर, अब अर्टिटेक्चर की फील्ड में मिला नोबल प्राइज

बीबी ( बालकृष्ण विट्‌ठलदास) दोषी को हाल ही में आर्किटेक्चर का नोबेल पाने वाले पहले भारतीय बने हैं।

Bhaskar News | Last Modified - Mar 10, 2018, 03:22 AM IST

इनके पिता और चाचा बनाते थे फर्नीचर, अब अर्टिटेक्चर की फील्ड में मिला नोबल प्राइज

अहमदाबाद.बीबी ( बालकृष्ण विट्‌ठलदास) दोषी को हाल ही में आर्किटेक्चर का नोबेल पाने वाले पहले भारतीय बने हैं। इन्होंने अपनी एजुकेशन जेजे स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर मुंबई से की है। बता दें, बांग्लादेश की नेशनल असेम्बली अहमदाबाद आईआईएम की डिजाइन में ज्यादा अंतर नहीं मिलेगा। इन्हें लुई कान ने डिजाइन किया था। अहमदाबाद आईआईएम में बीवी दोशी भी लुई के साथ थे। इसके बाद दोशी ने आईआईएम बेंगलुरू भी डिजाइन किया। बेंगलुरु आईआईएम को उन्होंने फतेहपुर सीकरी की तर्ज पर डिजाइन किया। इससे फायदा यह हुआ कि कक्षाएं और संस्थान का प्रशासन दोनों ही प्रकृति का आनंद लेते हुए कार्य कर सकते हैं। पिता और चाचा बनाते थे फर्नीचर

- बालकृष्ण विट्‌ठलदास दोशी का जन्म 26 अगस्त 1927 को हुआ था। इनके पिता और चाचा फर्नीचर बनाते थे। लिहाजा बालकृष्ण की भी ड्राइंग अच्छी थी, दोस्तों के कहने पर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में पढ़ने चले गए।

- जेजे से पासआउट होने के बाद फ्रांस के ली कार्ब्यूसिए के साथ काम किया। चार वर्ष काम करने के बाद उन्होंने नई दिल्ली में किफायती घरों को डिजाइन किया। फिर नई दिल्ली स्थित फैशन इंस्टीट्यूट बनाया।

- इसी के चलते 1976 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। अहमदाबाद के इनके अपने बालकृष्ण ट्रस्ट के लिए बनाई गई इमारत ‘संगत’ उनकी बेहतरीन कारीगरी का नमूना है।

- इसकी छत गोल है, ऊपर चाइना मोजइक टाइल्स लगी हैं, जो न पानी रुकने देती है और न ही गर्मी होने देती है। प्रकाश इस तरह से भवन में आता है कि वह टकराकर पूरे कमरे में उजाला करता है। चूंकि छत गोल है, इसलिए इनके पास कुंड बनाए हैं, ताकि ऊपर से पानी गिरकर इन कुंडों में जमा हो जाए।
- बात 1980 के दशक की ही है। अहमदाबाद में दोषी के घर पर ही कुमुदिनी लाखिया का कत्थक नृत्य था। इसमें कोलकाता के कनोरिया परिवार की उर्मिला कनोरिया भी थीं।

- कनोरिया को दोशी का काम इतना जमा कि उन्होंने शांतिनिकेतन की तर्ज पर अहमदाबाद में भी आर्ट सेंटर शुरू करने का फैसला किया। काम सौंपा गया बीवी दोशी को।

- दोषी ने इसे इतनी तल्लीनता से बनाया है हर कमरे में मध्ययुग की कारीगरी झलकती है। पुणे के रविवार पेठ में पले बढ़े दोशी बताते हैं कि उस दौर में लकड़ियों की बालकनी, खिड़कियां और भवन होते थे।

- इसका उन पर गहरा असर रहा है। इनकी तीन बेटियां हैं। बड़ी बेटी तेजल ने पारसी परिवार में विवाह किया है, जबकि दूसरी राधिका ने पंजाबी परिवार में और तीसरी मनीषा ने केरल के परिवार में शादी की है।

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Web Title: inke pitaa aur chaachaa banate the frnichr, ab artitekchr ki feeld mein milaa nobl praaij
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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