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विजय रूपाणी का चयन मजबूरी या व्यूहरचना का हिस्सा?

‘नो रिपीट’ के बदले ‘नो रिस्क’ की थ्योरी से साबित होता है कि गुजरात में मोदी की पकड़ ढीली पड़ गई है।

Danik Bhaskar | Dec 23, 2017, 05:06 PM IST
2019 के चुनाव तक गुजरात का राजनीतिक वातावरण सुधारने की व्यूह रचना। 2019 के चुनाव तक गुजरात का राजनीतिक वातावरण सुधारने की व्यूह रचना।

अहमदाबाद। विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता पर आसीन होने के बाद भी भाजपा ने जनादेश को अच्छी तरह से समझ लिया है। इसका प्रमाण मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के चयन से मिल जाता है। विजय रूपाणी और नीतिन पटेल को उसी पद पर रिपीट करना यही दर्शाता है कि गुजरात में मोदी की पकड़ ढीली पड़ गई है। अब नई चुनौती को स्वीकारने के बदले 2019 के चुनाव की तैयारियों में लग जाना है। ‘नो रिपीट’ के बदले ‘नो रिस्क’ की थ्योरी…

एक समय ऐसा भी था, जब नो रिपीट जैसी थ्योरी को अपनाकर चुनावी जंग जीतने वाले नरेंद्र मोदी इस बार चुनाव में शुरू से ही फूंक-फूंक कर कदम रखा। पिछले तीन साल में राज्य में बदलती राजनीति और भाजपा के सामने बढ़ती चुनौतियों को समझते हुए मोदी-शाह ने उम्मीदवारों के चयन में कागजी शेरों को प्राथमिकता दी थी। अब इस प्रकार का कोई खतरा लेना दोनों ने ही टाला था। मुख्यमंत्री के चयन तक यह सिलसिला जारी रहा।

आखिर वजू-रूपाला क्यों नहीं?

ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि राज्य में भाजपा के नेतृत्व में किसी प्रकार की खोट है। रूपाणी या नीतिन पटेल के विकल्प के रूप में वजूभाई वाला से लेकर पुरुषोत्तम रूपाला समेत कई नामों की चर्चा थी। परंतु इन नामों के साथ-साथ कुछ मर्यादाएं भी थीं। वजूभाई सीनियर मोस्ट होने के अलावा पूरे राज्य में व्यापक जनाधार रखते हैं। परंतु 75 पार होना माइनस पाइंट बन गया। रूपाला सौराष्ट्र में पाटीदारों पर प्रभुत्व होने का भ्रम इस चुनाव में टूट चुका है। क्योंकि उनके गृह जिले अमरेली की पांचों सीटें कांग्रेस को मिली है।

रूपाणी-पटेल क्यो रिपीट हुए

नए नेतृत्व को राज्य की बागडोर सौंपी जाती, तो पार्टी में कलह बढ़ जाती। उधर हार्दिक का आंदोलन अभी भी एक चुनौती के रूप में सामने है। अब तो विधानसभा में भी भाजपा के खिलाफ अल्पेश-जिग्नेश समेत कांग्रेस के कई विधायकों की संख्या भी है। इन हालात में नेतृत्व परिवर्तन के कारण सरकार और संगठन में सेट होने का टाइम नहीं दिया जा सकता था। क्योंकि लोकसभा चुनाव के लिए अब ज्यादा वक्त नहीं बचा। इसलिए अगले मैच में अच्छा नहीं तो ठीक-ठाक प्रदर्शन करने वाली जोड़ी को बरकरार रखते हुए कैप्टन पर अधिक भरोसा किया जा रहा है। इसलिए मोदी-शाह ने नए नेतृत्व का खतरा उठाने के बजाए रूपाणी-नीतिन की जोड़ी को ही रिपीट करना पसंद किया।

सभी के नामों की विशेषताओं के साथ मर्यादाएं भी जुड़ी थीं। सभी के नामों की विशेषताओं के साथ मर्यादाएं भी जुड़ी थीं।
मोदी-शाह नए नेतृत्व का खतरा उठाने को तैयार नहीं थे, इसलिए रूपाणी-नीतिन रिपीट किए गए। मोदी-शाह नए नेतृत्व का खतरा उठाने को तैयार नहीं थे, इसलिए रूपाणी-नीतिन रिपीट किए गए।