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ब्रेन ट्यूमर के लास्ट स्टेज पर पहुंचकर भी जाग्रत है सेवा भावना

2 वर्ष पहले
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श्रुचि की पहले की तस्वीर, अभी की तस्वीर - Dainik Bhaskar
श्रुचि की पहले की तस्वीर, अभी की तस्वीर
  • दो साल में रोपे 1100 पौधे
  • मौत के बाद लोगों की सांसों में जिंदा रहना चाहती हैं श्रुचि
  • वायु प्रदूषण से किसी को भी कैंसर न हो, यही चाहत
  • आज भी पौधों का रोपण करती रहती हैं

सूरत. शहर की 27 वर्षीय श्रुचि वडालिया को ब्रेन ट्यूमर है, जो अब अंतिम स्टेज पर है। इसके बाद भी बिना किसी डर के वह शान से अपनी जिंदगी जी रही है। खुद गंभीर बीमारी से ग्रस्त है, परंतु वायु प्रदूषण से किसी को कैंसर न हो, इसलिए वह पर्यावरण बचाने के अभियान में जुट गई हैं। दो साल में वह 1100 पौधों का रोपण कर चुकी है। उसकी अंतिम इच्छा है कि मैं भले मर जाऊं, पर पेड़ लगाकर मैं लोगों की सांसों में जिंदा रहना चाहती हूं।

शहरवासियों के लिए लिखा खत
प्रिय शहरवासियों….
मेरी जिंदगी का कितना समय बचा है, मुझे नहीं पता। जब मैं अपने दोस्त से बात कर रही थी, तब मुझे अचानक ही दिखना बंद हो गया। मैं बेहोश हो गई। मुझे हॉस्पिटल ले जाया गया। जांच के बाद डॉक्टर ने बताया-ब्रेन ट्यूमर है…! मुझे लगा कि डॉक्टर मेरे साथ मजाक कर रहे हैं। मुझे उनकी बात पर भरोसा ही नहीं हुआ। उसके बाद हमने करीब 25 डॉक्टरों से जांच कराई। सभी का यही कहना था कि मुझे ब्रेन ट्यूमर है। आपको कोई कहे कि आपको कैंसर है, तब आपको कैसा लगेगा? मैं ब्रेन ट्यूमर वाली बात को स्वीकार ही नहीं कर पा रही थी। दूसरे दिन मुझे आईसीयू से बाहर लाया गया, तब मैं जिंदगी के प्रति सचेत हो गई। क्योंकि मैंने अपनी जिंदगी में अनेक सपने देखे थे। अपने सपने के बारे में किसी से कुछ कहूं, इसके पहले ही मेरी जिंदगी सिमट गई। मेरे दिलो-दिमाग में तेज दर्द हो रहा था।

36 बार किमोथेरेपी
अपनी सिमटती जिंदगी के बीच मैंने सोचा कि आखिर ये बीमारी मुझे ही क्यों हुई? दिन धीरे-धीरे बीतने लगे। सब कुछ नार्मल हो रहा था। जो आपको अच्छा न लगे, वही रोज-रोज करना भला किसे अच्छा लगेगा? कई दवाओं का भारी डोज मुझे रोज लेना पड़ रहा था। किमोथेरेपी, रेडिएशन थेरेपी के कारण रोज अस्पताल जाना बहुत की तकलीफदेह था।  36 बार किमोथेरेपी और उतनी ही बार रेडिएशन थेरेपी लेकर मैं एकबारगी टूट ही गई।

मेरे पूरे बाल झड़ गए
किमोथेरेपी के कारण मेरे पूरे बाल झड़ गए। मुझे कैंसर हो गया है, यह जानकर मैंने तय कर लिया कि अब जिंदगी कुछ अलग तरह से गुजारनी है। जब मैं आठवीं में पढ़ रही थी, तब सारंग ओझा मेरे जीेवन में आया। हम दोनों अच्छे दोस्त बन गए। मुझे कैंसर है, इसकी जानकारी होते हुए भी उसने मुझसे शादी की थी। हमेशा मुझे सपोर्ट किया। यह तो मेरी जिंदगी की कहानी है, पर जब आप कैंसर हॉस्पिटल जाएंगे, तो आपकी कंपकंपी छूट जाएगी। जब मैं इलाज के लिए जाती, तो अस्पताल में मुझे नन्हें बच्चे मिलते, जिन्हें कैंसर होता। मैं रो पड़ती, हे! ईश्वर, इन मासूमों ने किसका क्या बिगाड़ा था? दुनिया में ऐसा क्यों होता है?

पौधे लगाकर अनेक जिंदगियां बचा सकते हो
मुझे विचार आया कि कैंसर को तो रोका नहीं जा सकता। तो क्या कैंसर को रोकने के लिए पौधे रोपे जा सकते हैं? मेरी जिंदगी तो खराब हो गई, पर भावी पीढ़ी की जिंदगी खराब न हो, इसके लिए मैंने पौधों को रोपने का काम शुरू किया। ब्रेन ट्यूमर होने के बाद मुझे लगा कि मुझे पर्यावरण बचाने की दिशा में कुछ करना चाहिए। वायु प्रदूषण के कारण कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां हो रही हैं। मुझे कैंसर हो गया, पर लोगों को अब कैंसर नहीं होना चाहिए। इसलिए पिछले दो साल से पौधरोपण कर रही हूं। अब तक 1100 पौधों का रोपण किया है। आप एक पौधा लगाकर अनेक लोगों की जिंदगी बचा सकते हैं।

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