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हमले का असर / उत्तर भारतीयों पर हमले से गायब हुई ‘पानी-पूरी’ से ‘पूरी’



Attacks On Non Gujarati, Rate Increased Of Pooris From Rs 50 To 100
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Attacks On Non Gujarati, Rate Increased Of Pooris From Rs 50 To 100
Attacks On Non Gujarati, Rate Increased Of Pooris From Rs 50 To 100
Attacks On Non Gujarati, Rate Increased Of Pooris From Rs 50 To 100

  • पूरी बस्ती की बस्ती ही हो गई खाली
  • सबसे ज्यादा असर इसी व्यवसाय पर
     

Dainik Bhaskar

Oct 11, 2018, 06:35 PM IST

 

अहमदाबाद. गुजरात में उत्तर भारतीयों पर हुए हमलों के कारण सबसे ज्यादा असर पानी-पूरी के व्यवसाय पर पड़ा है। इस व्यवसाय में अधिकांश उत्तर भारतीय ही जुड़े हैं। इसलिए उन पर हो रहे हमलों के बाद कई लोगों का पलायन हो गया है। पूरी बस्ती की बस्ती ही खाली हाे गई है।


महंगी हो गई पूरी: पहले जो पूरी 50 रुपए में 100 नग मिलती थी, आज वही 100 रुपए में मिल रही है। रास्ते में कहीं भी पानी-पूरी वाले अब दिखाई नहीं दे रहे हैं। पानी-पूरी गुजरातियों के जीवन-चर्या का अभिन्न हिस्सा है। इसके बिना वे अपने चटाखेदार जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकते। इस धंधे के मास्टर लोग अब अपने प्रांत में चले गए हैं, इसलिए गुजरातियों के लिए यह बहुत ही मुश्किल भरे दिन हैं।


बल्क में पूरी बनाने वाले हो गए गायब: शहर के बोपल,गोता, वाणीनाथ चौक, अमराईवाड़ी, शाहपुर, रखियाल, ओढ़व, वस्त्राल और नरोडा समेत कई इलाकों में बल्क में पूरी बनाई जाती थी। यहां उत्तर भारतीयों की आबादी भी अधिक थी। लेकिन अब जो यहां रह गए हैं, उनमें डर बैठ गया है। इसलिए वे अपना धंधा नहीं कर रहे हैं। जो बचे हैं, वे भी अब अपने प्रांत में जाने का मन बना रहे हैं।


पूरी टीम ही चली गई: शहर के पूर्व इलाके में पानी-पूरी की पूरी सप्लाई करने वाले व्यापारी चंद्रप्रकाश तिवारी ने भास्कर काे बताया कि हमारे पास करीब 80 से 100 लोगों की टीम थी, जो एक दिन में करीब 10 हजार पूरी बनाती थी। इसे हम पूरे शहर में सप्लाई करते थे। पर उत्तर भारतीयों पर हमले के कारण कोई काम पर नहीं आ रहा है। लोग हमारे माल का डबल भाव देने को तैयार हैं, पर हम माल बना ही नहीं पा रहे हैं।


गृहणियां परेशान: घर में हाईजेनिक पानी तो बना लिया, पर पूरी के अभाव में इसका कोई मतलब ही नहीं रहा। इस वजह से गृहणियां परेशान हैं। वे घर में एक दिन केवल पानी-पूरी का ही कार्यक्रम रखती थी, पर पूरी के अभाव में वे ऐसा नहीं कर पा रही हैं। इस तरह से कई परिवार परेशान हैं।

 

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