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फैसला / पीड़िता के मुकर जाने पर अारोपी को बरी नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट



Can not acquitted Aaropi when retracted the victim
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Can not acquitted Aaropi when retracted the victim

  • 9 साल की बच्ची से दुष्कर्म के आरोपी की याचिका खारिज 
  • 14 साल बाद आया फैसला, यह है रफ्तार, दुष्कर्म मामले की
     

Dainik Bhaskar

Oct 11, 2018, 01:44 PM IST

 

अहमदाबाद. सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात में 9 साल की बच्ची से दुष्कर्म के एक मामले में पीड़िता के मुकरने के बावजूद आरोपी को दी गई 10 साल की सजा को सही ठहराया है।

 

आरोपी के खिलाफ पुख्ता सबूत: सुप्रीम कोर्ट ने दोषी हेमुदन ननभा गढ़वी की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि अगर दुष्कर्म केस में आरोपी के खिलाफ पुख्ता सबूत हैं तो गवाह के मुकरने और कोर्ट में पीड़िता के बयान बदलने के आधार पर ट्रायल कोर्ट उसे बरी नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस नवीन सिन्हा और जस्टिस केएम जोसेफ की बेंच ने 28 सितंबर को यह अहम फैसला सुनाया।

 

आरोपी की पहचान को प्राथमिकता: जस्टिस नवीन सिन्हा ने अपने फैसले में कहा कि अमूमन कोर्ट के कटघरे में पीड़ित द्वारा आरोपी की पहचान को विशेष तरजीह दी जाती है, क्योंकि यह उसके द्वारा पुलिस में दिए गए बयान की पुष्टि करता है। पर इसे न्यायिक प्रक्रिया का आम नियम नहीं कहा जा सकता। अगर अन्य साक्ष्य अपराध की पुष्टि करते हैं तो उनके साथ पहचान परेड महत्वपूर्ण है, लेकिन जरूरी नहीं है।

 

दुष्कर्म हुआ है: इस मामले में सबूत साबित करते हैं कि आरोपी ने पीड़िता से दुष्कर्म किया था। सिर्फ इस आधार पर आरोपी को छोड़ दिया जाए कि पीड़िता अपने बयान से मुकर गई है तो यह न्याय के साथ खिलवाड़ होगा। आरोपी या किसी पीड़ित को झूठ बोलकर या अन्य बातों का सहारा लेकर केस खराब करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट को एक ऐसे मंच में तब्दील होने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जहां अनर्गल बातें की जाए। जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस नवीन सिन्हा और जस्टिस केएम जोसेफ की बेंच ने फैसला सुनाया।

 

यह है पूरा मामला : गुजरात में 20 फरवरी 2004 को एक 9 वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म के मामले में पुलिस ने हेमुदन ननभा गढ़वी को गिरफ्तार किया था। 22 फरवरी 2004 को बच्ची ने मजिस्ट्रेट के समक्ष शिनाख्त परेड में आरोपी को पहचान लिया। मेडिकल रिपोर्ट में भी दुष्कर्म की पुष्टि हुई और एफएसएल रिपोर्ट में भी आरोपी की अपराध में संलिप्तता साबित हुई। छह महीने बाद 31 अगस्त 2004 को कोर्ट में पीड़िता की गवाही हुई तो उसने न केवल आरोपी को पहचानने से इनकार कर दिया, बल्कि कोर्ट में कहा कि उससे दुष्कर्म हुआ ही नहीं। उसे गिरने से चोट लगी। कोर्ट ने पीड़िता को झूठा करार देते हुए आरोपी को बरी कर दिया। इस फैसले को गुजरात पुलिस ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए हेमुदन ननभा गढ़वी को 10 साल कैद व 5 हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई।

 

दुष्कर्म पीड़िता ने कोर्ट में झूठ बोला:  हम उसे सीआरपीसी की धारा 344 के तहत सजा देना चाहते थे। फिर हमने गौर किया कि जब घटना हुई थी, तब पीड़िता 9 साल की थी। अब 14 साल बीत गए हैं। उसकी शादी हो गई होगी, वह नई जिंदगी में रच-बस गई होगी और अगर अब उसे सजा दी गई तो जो हम देना चाहते थे, उससे उसके जीवन में सब कुछ उलट-पुलट हो जाएगा। इसलिए हम उसे सजा नहीं दे रहे। - सुप्रीम कोर्ट

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