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खेड़ा सत्याग्रह के 100 साल: सत्याग्रह की प्रतिज्ञा तोड़कर मुझे आघात मत देना, इसके बदले मेरी गर्दन काट लेना

खेड़ा सत्याग्रह विशेष:वह सब कुछ जो आप जानना चाहते हैं, पहला पाटीदार आंदोलन, राजस्व माफ कराने के लिए तीन महीने तक सत्याग्र

Bhaskar News | Last Modified - Mar 22, 2018, 02:14 AM IST

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    एक साल में गांधी के तीन रूप- काठियावाड़ी पगड़ी उतारी, खादी पहनी और फिर खुले सिर से महात्मा

    दैनिक भास्कर, खेड़ा. भारत के स्वतंत्रता इतिहास में खेड़ा सत्याग्रह महत्वपूर्ण घटना है। ऐसा नहीं है कि इस सत्याग्रह ने केवल किसानों को स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए तैयार किया हो, इस सत्याग्रह ने गांधीजी को निखारा। खादी और अहिंसा की शुरुआत यहीं से की और पगड़ी को त्याग दिया। यह वही सत्याग्रह था जिसमें एक पाटीदार वकील जुड़ा और गांधी जी के रंग में रंग गया। आज हम उस वकील को सरदार के नाम से जानते हैं। आज से 100 साल पहले 22 मार्च 1918 को दैनिक भास्कर अखबार नहीं था। लेकिन यदि उस समय प्रकाशित होता तो गुजरात के जन जीवन में एक नया तेज, उत्साह और आत्मविश्वास जगाने वाले पहले पाटीदार आंदोलन यानी कि खेड़ा सत्याग्रह का कवरेज किस प्रकार करता इसे आज के अंक में बताने का प्रयास किया गया है।

    प्रतिज्ञा का पालन मेरी मौत से होती हो, तो देह जाए तो भले ही जाए...

    गांधीजी ने नडियाद में दशा श्रीमाली की बाड़ी में विशाल सभा में सत्याग्रह का ऐलान किया। उन्होंने लोगों से शपथ पत्र भरवाया। प्रतिज्ञा दिलाने से पहले कहा कि ईश्वर के नाम पर ली गई प्रतिज्ञा तोड़ी नहीं जा सकती। हजारों लोगों की प्रतिज्ञा का पालन मेरी मौत से होती हो, तो देह जाए तो भले ही जाए। प्रतिज्ञा तोड़कर मुझे आज्ञात पहुंचाने के बदले रात में मेरी गर्दन काट लेना। मेरी गर्दन काटने वाले को माफ करने के लिए मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा। पर प्रतिज्ञा तोड़कर आघात पहुंचाने वाले के लिए मैं माफी नहीं मांग सकूंगा।


    मोहनदास करमचंद गांधी अहमदाबाद में मिल मजदूरों को उनका हक दिला रहे थे तभी उन्हें सूचना मिली कि खेड़ा के किसान बड़ी मुसीबत में हैं। उनकी फसल चौपट हो गई है, इसके बावजूद उनसे टैक्स वसूला जा रहा है। विट्‌ठलभाई और गांधीजी ने जांच की तो पता चला कि किसानों की मांग उचित है। नियमानुसार संपूर्ण टैक्स माफ होना चाहिए। गांधीजी ने तुरंत आदेश दिया कि हमें खेड़ा जाना चाहिए।
    गांधीजी नडियाद पहुंच गए। वहां जाने के बाद पता चला कि पूरे जिले की फसल बर्बाद हो गई है।

    किसानों ने बताया कि चौथाई फसल भी नहीं पैदा हुई। इस स्थिति को देखते हुए टैक्स माफ हो जाना चाहिए पर सरकारी अधिकारी किसानों की बात सुनने को तैयार नहीं थे। किसानों के सभी प्रयास बेकार होने के बाद गांधीजी ने सत्याग्रह करने की सलाह दी। गांधीजी ने नडियाद में खेड़ा आंदोलन का ऐलान कर दिया। ग्रामीणों को सत्याग्रह का अर्थ समझाते हुए गांधीजी ने कहा कि हम मनुष्य हैं, पशु नहीं हैं, सत्य के लिए अाग्रह पूर्वक न कहना ही सत्याग्रह है।


    पहली बार अहिंसा का नारा देते हुए गांधीजी ने कहा कि हम किसानों को उनका हक दिलाएंगे पर मेरी एक शर्त है। अंग्रेज सरकार डंडा बरसाए या गोली तुम हिंसा नहीं करोगे। हिंसा का जवाब हिंसा से देने पर हम बीच में ही सत्याग्रह छोड़ देंगे।


    उन्होंने वल्लभभाई को गांव-गांव में जाकर शपथ पत्र भराने के लिए कहा। प्रतिज्ञा पत्र में लिखा था कि हमारे गांव में फसल चार आने से भी कम हुई है, इस वजह से हमने राजस्व वसूली अगले साल तक स्थगित करने की सरकार से अर्जी की। इसके बावजूद कर वसली बंद नहीं की गई। इसलिए हम सरकार का इस साल का पूरा या बकाया राजस्व कर नहीं भरेंगे। कर वसूलने के लिए सरकार जो भी कदम उठाएगी उसे उठाने देंगे और इससे होने वाली परेशानी को सहन करेंगे।

    ये थी गांधीजी की 4 सार्वजनिक मांगें
    बाढ़ग्रस्त खेड़ा का राजस्व स्थगित करने का प्रयास निष्फल होने के बाद गांधीजी ने 9 मार्च 1918 को 4 सार्वजनिक मांगें की।
    1 . पूरे जिले में राजस्व कर की पूरी रकम स्थगित करने की मांग करना किसानों का हक है।
    2. हमारी ओर से तैयार आंकड़े स्वीकार न हो तो पूरे जिले की आधी कर स्थगित रखें, क्योंकि बड़े पैमाने पर फसल चौपट हो गई है। इतना ही नहीं बढ़ती महंगाई और प्लेग से लोगों का संकट बढ़ रहा है।
    3. कलमबंदी गांवों का राजस्व कर पूरा स्थगित करे और कुदरती आफत में सरकार दया दिखाए।
    4. महुडा का कानून लागू करना स्थगित करें और इसकी जानकारी गांव-गांव में किसानों तक पहुंचाने की व्यवस्था करें। ताकि महुडा का उपयोग कर सकें।

    महिलाओं को इकट्‌ठा किया : तुम पशु या गहने से नहीं ब्याही हो, पतियों को सत्याग्रह से नहीं रोकना

    गांधीजी ने महिलाओं को भी सत्याग्रह में जोड़ लिया था। उन्हें पता था कि महिलाओं की इस सत्याग्रह में भागीदारी बहुत जरूरी है। गांधीजी ने महिलाओं का आह्वान करते हुए कहा कि तुम अपने पति के साथ ब्याही हो पशु या गहने से नहीं। पति की प्रतिज्ञा का पालन करने में मदद करना तुम्हारा धर्म है। गांधीजी जहां भी जाते वहां महिलाओं के साथ बात जरूर करते थे। खेडा सत्याग्रह में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण थी। गांधीजी ने कहा कि खेडा के पुरूष ही नहीं महिलाएं भी इस लड़ाई में शामिल हैं। गांव की सभाओं में अलौकित प्रदर्शन हो रहा है। महिलाएं कहती थी कि सरकार भले ही हमारी भैंस ले जाएं, गहने ले जाएं, फसलों को नष्ट करें पर पति को अपनी प्रतिज्ञा का पालन करना चाहिए। कई मामलों में महिलाओं ने भारी हिम्मत दिखाई।

    70 इंच बरसात में फसलें बह गई, घास-चारा नष्ट हो गया

    1917 में खेडा में भारी बरसात हुई। औसत 30 इंच के बदले 70 इंच बरसात हुई। फसलें बह गई और घास-चारा नष्ट हो गया। दशहरा के बाद भी बरसात होती रही। यानी कि फिर से बुवाई करना संभव नहीं था। नवंबर में यह बात साबित हो गई थी कि फसल चौपट हो गई है। जिले में अकाल की स्थित पैदा हो गई थी। रवि की फसल में चूहे और रोग फैलने लगा। किसानों का पूरा साल खराब हो गया। सरकारी नियम ऐसा था कि फसल छह आने से कम हो तो आधा टैक्स उस साल स्थगित कर दिया जाता था।

    किसानों को एकमत किया: अंग्रेज भले ही तुम्हें तालाब में डुबाेएं या आग में जलाएं, एक भी रुपया मत देना

    गांधीजी ने किसानों से कहा कि अंग्रेज सरकार भले ही तुम्हें तालाब में डुबाेए या आग में जलाए, तुम एक भी रूपए मत देना। हजारों लोगों की प्रतिज्ञा मेरी मौत से पूरी होती हो तो देह जाने पर भी मुझे दु:ख नहीं हाेगा। दु:ख सहन करके दु:ख से बाहर आना ही सत्याग्रह है। सुख को हम मारकर या मरकर ले सकते हैं। पहला उपाय पशुओं का और दूसरा उपाय मनुष्य का है। जनता के खिलाफ होकर कोई भी राजा राज नहीं कर सकता है। गांधीजी ने किसानों को चेतावनी दी कि सरकार तरह-तरह का जुल्म करेगी और हमें कई दु:ख सहने पड़ेंगे। सरकार जुर्माना करेगी, जब्ती करेगी, पशुओं और सामान बेचकर कर वसूल करेगी, जमीन भी नीलाम करेगी। इन सबको को सहने की तैयारी करने के बाद ही सत्याग्रह के प्रतिज्ञा पत्र पर दस्तखत करें। प्रतिज्ञा पत्र पर 200 किसानों ने तत्काल हस्ताक्षर किया। समय बीतने के साथ-साथ सत्याग्रहियों का आंकड़ा 2000 हो गया।

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    अहिंसा का नारा खेड़ा में दिया : गांधीजी ने अहिंसा को हथियार बनाने का ऐलान किया। उन्होंने किसानों से कहा कि अंग्रेज सरकार लाठियां बरसाए या गोली चलाए वे हिंसा नहीं करेंगे। किसानों से यह भी कहा था कि यदि वे हाथ उठाएंगे तो आंदोलन छोड़ देंगे। अहिंसा की परिभाषा समझाते हुए गांधीजी ने कहा था कि अहिंसा कायरता नहीं है। इसके बाद गांधीजी अहिंसा की बात हर सभा में करने लगे। यहां हाथ से बना खादी का कपड़ा पहना: १९१८ में गांधीजी ने खादी पर जोर दिया। उन्होंने संकल्प लिया कि जब तक वे जीवित रहेंगे तब तक हाथ से बुना खादी ही पहनेंगे। इस प्रतिज्ञा के पीछे का मुख्य कारण किसान थे। वे नहीं चाहते थे कि कपास की खेती के लिए किसानों को मजबूर किया जाए। मेनचेस्टर की मिल में कपास पहुंचाने के लिए किसानों को खेती करने पर मजबूर किया जाता था। .
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    ‘वल्लभभाई अभी भट्‌ठी में हैं, इसमें से हम कुंदन निकालेंगे’

    इस सत्याग्रह के लिए वल्लभभाई वकालत छोड़कर आए। इसके बाद वे वकालत नहीं कर सके। सत्याग्रह में उनकी असली भूमिका यहीं से शुरू हुई। गांधीजी के न होने पर सत्याग्रह की कमान वल्लभभाई के हाथ में होती थी।


    वकालत को छोड़कर वल्लभभाई खेडा सत्याग्रह से आंदोलन में शामिल हुए। शुरूआत में गांधीजी ने कहा था कि वल्लभभाई अभी भट्‌ठी में हैं, उन्हें अच्छी तरह से तपना है। हम इसमें से कुंदन निकालेंगे। पूर्णाहुति के वक्त गांधीजी ने कहा कि वल्लभभाई न मिले होते तो जो काम हुआ वह नहीं होता। खेड़ा की लड़ाई गांधीजी की लड़ाई है। यह गांधीजी की पद्धति का गुजरात में हुआ पहला प्रयोग था। इस लड़ाई में गांधीजी गुरु थे और वल्लभाई चेला। वल्लभभाई ने अपनी वकालत बंद करके सत्याग्रह में शामिल होने की उत्सुकता दिखाई। वल्लभभाई के इस निर्णय से गांधीजी खूब प्रभावित हुए। गांधीजी जब नहीं होते तो वल्लभभाई पूरा काम संभालते थे। खेड़ा की लड़ाई के बीच में करमसद की एक सभा में गांधीजी ने कहा था कि वल्लभभाई अभी भट्‌ठी में हैं, उन्हें अच्छी तरह से तपना है, मुझे लगता है कि इसमें से हम कुंदन निकालेंगे।


    पूर्णाहुति की सभा में गांधीजी ने वल्लभभाई के बारे में कुछ बातें कही। उन्होंने कहा कि सेनापति की चतुराई अपने कार्यकारी मंडल को चुनने में है। अनेक लोग मेरी सलाह मानने को तैयार थे पर मेरा विचार था कि उपसेनापति कौन हाेगा? वहीं मेरी नजर वल्लभभाई पर पड़ी। पहली बार जब वल्लभभाई से मेरी मुलाकात हुई तो मेरे मन में विचार अाया कि यह अकड़ पुरूष कौन है? यह काम करेगा? पर जैसे-जैसे मैं उसके संपर्क में आया तो मुझे ऐसा लगा कि वल्लभभाई तो मुझे चाहिए ही। वल्लभभाई ने स्वीकार किया कि वकालत अच्छी चल रही है। म्युनिसिपैलिटी में ज्यादा काम करता हूं। इससे भी भारी काम यह है। धंधा तो आज है कल नहीं होगा। पैसा कल उड़ जाएगा। वारसदार उसे उड़ा देंगे। पैसे ज्यादा सम्मान मैं उन्हें दूं, ऐसे विचारों के साथ वे सत्याग्रह में कूद पड़े। वल्लभभाई मुझे न मिले होते तो जो काम हुअा वह नहीं होता। इतना शुभ अनुभव मुझे इस भाई से हुआ।

    कैसी चल रही थी वकालत?
    वल्लभभाई नबाबी में रहते थे उनके शर्ट का कालर धोने के लिए मुंबई जाता था। अहमदाबाद के मिल मालिक उनके अाफिस का फर्नीचर देखकर दंग रह जाते थे।

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